Chandigarh News: आरएलडी के बाद शिअद पर टिकी BJP की नजर, दिल्ली पहुंचे सुखबीर बादल; हो सकती गठबंधन की घोषणा
शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल दिल्ली पहुंच चुके हैं इसके बाद राष्ट्रीय लोक दल के बाद अब बीजेपी की नजर शिअद पर टिकी हुई है। वहीं अगर बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक के बाद बीजेपी और अकाली दल के गठबंधन की घोषणा हो सकती है। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ सुखबीर बादल सीट शेयरिंग और बंदी सिंहों जैसे मामलों पर चर्चा कर सकते हैं।

कैलाश नाथ, चंडीगढ़। शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल एनडीए का हिस्सा बनेंगे या नहीं। यह तस्वीर अगले दो से तीन दिनों में स्पष्ट हो जाएगी। बादल दिल्ली पहुंच गए है और माना जा रहा है कि मंगलवार को उनकी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक होगी। जिसमें सीट शेयरिंग और बंदी सिंहों जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी। दोनों दलों में सहमती बनी तो 16 फरवरी तक भाजपा-अकाली दल के गठबंधन की घोषणा हो सकती है।
भाजपा के लिए अच्छी खबर यह है कि राष्ट्रीय लोक दल के प्रमुख जयंत चौधरी ने एनडीएन का हिस्सा बनने की घोषणा कर दी है। जिसके बाद अब भाजपा की नजर एनडीए के सबसे पुराने घटक दल शिरोमणि अकाली दल पर है, जोकि 2020 में अलग हो गए थे।
BJP 6 लोकसभा सीट पर जबकि अकाली दल को 4 सीटें देने को तैयार
जानकारी के अनुसार, भाजपा 6 लोकसभा सीटों पर दावा ठोक रही है जबकि अकाली दल 4 सीटें भाजपा को देने के लिए तैयार है। क्योंकि भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भाजपा पंजाब की 13 में से 3 लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़ती थी। भाजपा पटियाला और लुधियाना समेत एक अन्य सीट पर दावा कर रही है। पटियाला सीट पर पिछले 5 वर्षों से कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर सांसद का चुनाव जीतती आ रही हैं। 1998 के बाद अकाली दल कभी भी इस सीट पर जीत नहीं की।
शिअद के सामने सीट शेयरिंग के अलावा बंदी सिंहों का भी हैं मुद्दा
कैप्टन अमरिंदर सिंह अब भाजपा के सदस्य हैं। वहीं, पंजाब के मेनचेस्टर कहे जाने वाले लुधियाना पर भी भाजपा दावा कर रही है। सूत्र बताते हैं कि सीट शेयरिंग की गुत्थी सुलझने के बाद भी बंदी सिंहों का मुद्दा अकाली दल के लिए बड़ा है। क्योंकि अपनी सजा पूरी कर चुके बंदी सिंहों की रिहाई को लेकर अकाली दल पिछले डेढ़ वर्षों से संघर्ष कर रहा है। अकाली दल इस मुद्दे पर इतना आगे निकल चुका है कि अगर वह इस मुद्दे को छोड़ता हैं तो पंथक राजनीति में उसे झटका लग सकता है। इसीलिए गठबंधन से पहले अकाली दल इस मुद्दे पर भी भाजपा से कोई ठोस भरोसा चाहेगा।
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वहीं, सीट शेयरिंग में सबसे बड़ा पेंच लुधियाना में फंस सकता है। क्योंकि कोई भी राजनीतिक पार्टी लुधियाना को छोड़ने के हक में नहीं रहती है। जिसका प्रमुख कारण है कि लुधियाना में ही प्रमुख इंडस्ट्रियां है और पंजाब का सबसे बड़ा व्यापारिक हब है। वहीं, भाजपा अगर इस सीट को लेकर शिअद को मनाने में कामयाब हो जाती है तो वह राज्य के चारों बड़े शहर जालंधर, अमृतसर, पटियाला और लुधियाना उसके हिस्से में आ जाएंगे।
दो-तीन दिनों में स्पष्ट हो जाएगी तस्वीर
वहीं, भाजपा इसलिए भी लुधियाना पर ज्यादा दावा ठोक रही हैं क्योंकि यहां पर न सिर्फ मिश्रित आबादी है। बल्कि लुधियाना में दूसरे राज्यों से आए श्रमिकों की संख्या खासी अधिक जिसमें भाजपा की लोकप्रियता खासी है। सूत्र बताते हैं कि पटियाला सीट को छोड़ने में शिअद को कोई परेशानी नहीं होगी। क्योंकि कैप्टन परिवार का हमेशा से ही इस सीट पर दबदबा रहा है। भाजपा और शिअद का गठबंधन होगा यह नहीं इसको लेकर तस्वीर अगले दो-तीन दिनों में स्पष्ट हो जाएगी। वहीं, भाजपा भी पूरे देश में यह संदेश देने में सफल रहेगी कि एनडीए के सबसे पुराने घटक दल को वह वापस गठबंधन में शामिल करवाने में कामयाब रहे।
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