पश्चिम बंगाल में CBI पर रार, पुलिस कमिश्नर ही नहीं ममता पर भी बनता है आपराधिक मामला!
पश्चिम बंगाल में पहली बार ऐसा देखने को मिला है कोई पुलिस कमिश्नर सीएम के साथ मिलकर धरने पर बैठा हो। इस पूरे मामले पर जानते हैं क्या कहते हैं जानकार।
नई दिल्ली जागरण स्पेशल। सीबीआई को लेकर हमेशा से ही विपक्ष सवाल उठाता रहा है। सरकार चाहे कोई भी रही हो लेकिन विपक्षी दल हमेशा से ही इसको केंद्र की कठपुतली बताते रहे हैं। विपक्षी पार्टियों का ये आरोप भी कोई नया नहीं है कि सीबीआई केंद्र के इशारे पर उसके हितों के लिए काम करती है। बहरहाल, पश्चिम बंगाल में भी यही सब कुछ देखने को मिल रहा है। यहां पर कुछ नई चीजें भी निकलकर सामने आई है। पश्चिम बंगाल में पहली बार ऐसा देखने को मिला है कोई पुलिस कमिश्नर सीएम के साथ मिलकर धरने पर बैठा हो। यह अपने आप में पहला मामला है। इसको लेकर राजनीतिक स्तर पर जहां हो-हल्ला है वहीं संवैघानिक स्तर पर भी इसको लेकर सवाल किए जा रहे हैं।
क्या कहते हैं संविधान विशेषज्ञ
सीबीआई को जांच से नहीं रोक सकती ममता
इस पूरे मामले पर दैनिक जागरण ने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप और यूपी के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह से बात की। उनका सीधेतौर पर कहना था कि देश की कोई भी राज्य सरकार सीबीआई को अपने यहां पर आने से नहीं रोक सकती है। उनके मुताबिक किसी भी राज्य सरकार को ऐसा कोई हक नहीं है। यह संविधान की यूनियन लिस्ट में वह साफतौर पर दर्ज है। उसको संविधान के सातवें शडयूल में दर्ज है और यह की धारा 256, 257 की स्टेट लिस्ट में होने के नाते उसको सभी पुलिस की शक्तियां मिली हुई हैं। कश्यप मानते हैं कि जांच से रोकना या फिर सीबीआई की एंट्री को ही प्रतिबंधित करना संविधान का खुला उल्लंघन है। उनके मुताबिक यह लोकतंत्र के नाम पर सीधेतौर पर अराजकता फैलाने की कोशिश है। यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है।
सीबीआई जांच को लेकर ली है सहमति
कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के राज्य की मुख्यमंत्री के साथ धरने पर बैठने के मसले पर भी कश्यप ने हैरानी जताई है। उनका कहना है कि ऐसा कभी पहले नहीं हुआ है और ये भी पहली बार सामने आया है कि एक राज्य की मुख्यमंत्री पुलिस कमिश्नर के घर पर जाती हैं और उनका बचाव करती हुई दिखाई देती हैं। उनका ये भी कहना है कि सीबीआई की जांच से पूर्व राज्य सरकार से इसकी सहमति ली जाती है। इस मामले में भी यह सहमति ली गई थी। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के बाद इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई है। इसके बाद में राज्य सरकार की तरफ से उठाए गए इस तरह के कदम पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के आदेश का खुला उल्लंघन है। जहां तक पुलिस कमिश्नर का सवाल है तो उन्हें इस मामले में सीबीआई की तरफ से कई नोटिस भेजे गए थे लेकिन इसके बाद भी उन्होंने जांच में सहयोग नहीं दिया, जिसके बाद सीबीआई की तरफ से कार्रवाई की गई।
पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह की राय
कमिश्नर को किया जाना चाहिए निलंबित
हालांकि पुलिस कमिश्नर पर कार्रवाई को लेकर उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह का कहना है कि उन्हें मामले की जांच को रोकने और उसको बाधित करने के लिए तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि सीबीआई एक संवैधानिक संगठन है। इसको जांच से रोकना आईपीसी की धारा 332 के तहत अपराध है। उनकी निगाह में यह गंभीर अपराध इसलिए भी है क्योंकि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के बाद की जा रही है। जहां तक कोलकाता के पुलिस कमिश्नर के के धरने पर बैठने की बात है तो उन्हें जांच में सहयोग करने का आदेश दिया गया था, लेकिन उन्होंने इसके उलट कार्य किया और जांच में रोड़ा अटकाया। उनका कहना है कि धरने पर बैठे पुलिस के आला अधिकारी के खिलाफ उसी तरह से कार्रवाई होनी चाहिए जो निचले दर्जे के पुलिस अधिकारियों पर होती है। किसी भी वर्दीधारी को इस तरह के आंदोलन में शामिल नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होता है तो यह बेहद शर्मनाक बात है।
मुख्यमंत्री का कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है
पूर्व डीजीपी का कहना है कि पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार वहां की सरकार के नुमाइंदे नहीं है बल्कि भारतीय पुलिस सेवा से जुड़े हुए हैं। इसको लेकर केंद्र सरकार को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। कमिश्नर राजीव कुमार के ऊपर अनुच्छेद 311 की उपधारा 3 के अंतर्गत पुलिस कमिश्नर को तुरंत सस्पेंड किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक राज्य सरकार की मुख्यमंत्री द्वारा वर्दीधारियों को केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद होने की कहना भी अपराध की ही श्रेणी में आता है। कोई भी संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह का आह्वान नहीं कर सकता है। उनका यह कृत्य पूरी तरह से संविधान को तार-तार करने के बराबर है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हो रही जांच
सीबीआई पर हुई राज्य सरकार की कार्रवाई को लेकर उनका कहना था कि यदि केंद्र सरकार सीधेतौर पर इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपती तो राज्य सरकार को यह अधिकार था कि वह उसको जांच से रोक सके। इस तरह के मामलों में वह अपनी एजेंसी से जांच कराने का भरोसा दे सकती है। लेकिन यह मामला अलग है। यहां पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच कर रही है। लिहाजा राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हुए सीबीआई को जांच करने से नहीं रोक सकती है। इस तरह के मामलों में केंद्र भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसमें सीबीआई, केंद्र सरकार और राज्य सरकार के पास में कोई अन्य विकल्प नहीं है। उन्हें कोर्ट के आदेश का पालन करना ही होगा। दिल्ली पुलिस एक्ट की धारा छह और सात में इसको लेकर बेहद साफ कर दिया गया है। इसमें केंद्र सरकार द्वारा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सीबीआई जांच को बेहद स्पष्ट तौर पर समझाया गया है। इसमें कोई उलझन नहीं है।
क्या है मामला
आगे बढ़ने से पहले एक बार इस पूरे मामले को भी समझ लेते हैं। सारधा घोटाले पर राज्य सरकार ने विशेष जांच दल (एसआइटी) बनाया था। इसके प्रमुख राजीव कुमार थे। सारधा समूह के मुखिया सुदीप्त सेन और उनकी सहयोगी देवजानी मुखर्जी को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जांच सीबीआइ को दी गई। पूछताछ में देवजानी ने बताया था कि एसआइटी ने उनके पास से एक लाल डायरी, पेन ड्राइव समेत कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए थे। तब से ही सीबीआइ उक्त पेन ड्राइव और डायरी को तलाश कर रही है। इसी वजह से इस मामले में राजीव कुमार के बयान को अहम माना जा रहा है।
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