इस्लामिक क्रांति के जश्न के बीच ईरान ने किया होविज क्रूज मिसाइल टेस्ट, ये हैं इसकी खासियत
इस्लामिक क्रांति के जश्न के बीच ईरान ने क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण कर सभी को चौंका दिया है। यह मिसाइल कई खासियतों से लैस है।
नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति को चार दशक पूरे हो रहे हैं। इसके कारण ईरान में जश्न का माहौल है। इस क्रांति का सफल होने में करीब डेढ दशक का समय लगा था। इस जश्न के मौके पर ईरान ने 1,350 किलोमीटर से अधिक दूरी तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल का सफल परीक्षण करने की घोषणा की है। यह परीक्षण शनिवार को किया गया। हालांकि इस परीक्षण को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यहां पर अमेरिका की कही गई बात काफी हद तक सही साबित हुई है। आपको बता दें कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात को कई दफा कह चुके हैं कि ईरान चोरी छिपे अपने मिसाइल प्रोग्राम को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है। ईरान द्वारा किए गए ताजे परीक्षण ने इस बात को कहीं न कहीं सही साबित कर दिया है।
बहरहाल, जहां तक इस मिसाइल परीक्षण का सवाल है तो सरकारी टीवी चैनल पर परीक्षण के दिखाए जा रहे फुटेज का हवाला देते हुए रक्षा मंत्री आमिर हतामी ने इसको पूरी तरह से सफल बताया है। उनके मुताबिक इसका नाम होविज क्रूज मिसाइल है। इस मिसाइल ने 1200 किमी से अधिक की दूरी तय की। हतामी के मुताबिक मिसाइल ने निर्धारित लक्ष्य को सटीक तरह से भेदा। इसे लड़ाई के लिए जहां कम से कम समय में तैयार किया जा सकता है वहीं यह बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भर सकती है। हतामी ने कहा कि यह क्रूज मिसाइल सोमार समूह का हिस्सा है, जिसे 2015 में शुरू किया गया था। उस समय मिसाइल की मारक क्षमता 700 किलोमीटर थी। रक्षा मंत्री ने इस क्रूज मिसाइल को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की सुरक्षा का प्रमुख हथियार बताया है।
दरअसल, ईरान ने इजरायल और मध्य-पूर्व स्थित पश्चिमी ठिकानों से होने वाले हमलों के मद्देनजर अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता को 2,000 किलोमीटर तक सीमित किया है, लेकिन वाशिंगटन और उसके सहयोगियों ने तेहरान पर हथियारों की होड़ में शामिल होने का आरोप लगाया है, जिससे यूरोप को भी खतरा है। बता दें कि मंगलवार को देश के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव एडमिरल अली शमखानी ने मंगलवार को कहा था कि ईरान का अपनी मिसाइलों की मारक क्षमता बढ़ाने का कोई इरादा नहीं है।
ईरान की इस्लामी क्रांति की यदि बात की जाए तो इसकी शुरुआत सही मायनों में 1963 में हुई थी। इसकी वजह ईरान के तत्कालीन शाह, मोहम्मद रजा शाह पहलवी द्वारा किया गया श्वेत क्रांति का एलान था। ये ऐसे आर्थिक और सामाजिक सुधार थे, जो ईरान के परंपरागत समाज को पश्चिमी मूल्यों की तरफ ले जाते थे। यही वजह थी कि इनका विरोध लागू होने के साथ ही शुरू हो गया था। इस क्रांति के पीछे उस वक्त फ्रांस में निर्वासित जीवन जी रहे अयातुल्लाह खमेनी थे, जो वहां रहकर ईरान में क्रांति को लेकर दिशा-निर्देश दे रहे थे। 1973 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों में भारी गिरावट आई। इससे ईरान की आमदनी चरमरा गई।
यह ऐसा समय था जब लोगों को खाने के लाले पड़े थे और शाह अपनी श्वते क्रांति के सफल होने की उम्मीद लगाए बैठे थे। इसी दौरान मौलवियों के एक धड़े ने श्वेत क्रांति को गैरइस्लािमिक करार दिया था। सितंबर 1978 में ईरान में मोहम्मद रजा शाह पहलवी के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हो रहे थे। इसका नेतृत्व धीरे-धीरे उन मौलवियों के हाथों में जा रहा था, जिन्हे अयातुल्लाह खमेनी निर्देश दे रहे थे। लोगों में मोहम्मद रजा शाह की नीतियों के प्रति जबरदस्त आक्रोश था। प्रदर्शनकारियों की निगाह में शाह अमेरिका की कठपुतली बन चुके थे जो उनके इशारे पर नाच रहे थे। शाह ने आक्रोश को शांत करने के बजाए प्रदर्शकारियों को दबाने के लिए मार्शल लॉ लागू कर दिया।
जनवरी 1979 तक ईरान में हालात बिल्कुल गृहयुद्ध जैसे हो गए थे। लोग लगातार अयातुल्लाह खमेनी की वापसी की मांग कर रहे थे। देश के हालात इस कदर बेकाबू हो गए थे कि शाह उनसे घबराकर परिवार समेत ईरान से भाग खड़े हुए। लेकिन जाते-जाते वह विपक्षी नेता शापोर बख्तियार को अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त कर गए बख्तियार ने खमेनी के ईरान वापसी को लेकर शर्त रखी कि वह देश के प्रधानमंत्री बने रहेंगे। उनकी शर्त
पर अमल की बदौलत खमेनी 14 साल बाद अपने वतन लौटे। 12 फरवरी 1979 को खमेनी जब स्वदेश पहुंचे तो उनका वहां पर जोरदार स्वागत किया गया। इसके बाद एक रैली में खमेनी ने तत्काल अपने पक्ष में माहौल को देखते हुए सरकार के गठन करने की भी घोषणा कर दी। उन्होंने लोगों से सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी रखने की अपील की । 16 फरवरी को उन्होंने मेहदी बाजारगान को अंतरिम सरकार का नया प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। इस वक्त ईरान में दो प्रधानमंत्री थे। एक बख्तियार और दूसरे बाजारगान। बाजारगान के पीछे खोमैनी के साथ साथ बड़ा जन समर्थन था। धीरे धीरे खोमैनी ने प्रदर्शन को धार्मिक रंग दे दिया।
इसी बीच ईरान की वायुसेना खमेनी के पक्ष में हो गई। 20 फरवरी को तेहरान में एक निर्णायक घटना हुई। शाह के प्रति वफादारी दिखाने वाले इंपीरियल गार्ड के सैनिकों ने एयरफोर्स डिफेंस ट्रूप्स पर हमला कर दिया। इस घटना के बाद जहां हिंसक झड़पें बढ़ गईं वहीं धीरे-धीरे सेना भी हथियारबंद विद्रोहियों के साथ खमेनी के समर्थन में आ गई। अप्रैल 1979 में एक जनमत संग्रह के बाद इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का एलान किया गया। सरकार चुनी गई और खोमैनी को देश का सर्वोच्च धार्मिक नेता घोषित किया गया।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।