देश में बहस का मुद्दा बन गया है बाघ संरक्षण का सवाल, आखिर क्या है हकीकत
सबसे पहले 2006 में हुई गणना में देश में बाघों की तादाद 1411 बताई गई थी जो 2010 में 1706 जा पहुंची और 2014 में यह बढ़कर 2226 हो गई।
नई दिल्ली [ज्ञानेंद्र रावत]। देश में इन दिनों बाघ संरक्षण का सवाल बहस का मुद्दा बन गया है। कहा जा रहा है कि अब बाघों की गिनती सौ फीसद हाईटेक तकनीक के जरिये की जाएगी। इससे बाघों की तादाद बीस फीसद तक बढ़ने की उम्मीद केंद्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी एनटीसीए और राष्ट्रीय वन्य जीव संस्थान देहरादून कर रहा है। इनका दावा है कि अभी तक बाघों की गणना केवल सात फीसद क्षेत्र तक ही होती थी, लेकिन अब सौ फीसद होगी। अभी तक देश में तीन बार बाघों की गणना हो चुकी है।
देश में बाघों की तादाद
सबसे पहले 2006 में हुई गणना में देश में बाघों की तादाद 1411 बताई गई थी जो 2010 में 1706 जा पहुंची और 2014 में यह बढ़कर 2226 हो गई। सरकारी दावों पर तो वन्य जीव मामलों के जानकार आज भी शंका जाहिर कर रहे हैं। वन्य जीव संरक्षण के कार्य में लगी संस्था वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया की मानें तो पता चलता है कि बीते 10 सालों में देश के विभिन्न राज्यों में 314 बाघ शिकारियों द्वारा मारे गए। 2016 में सबसे ज्यादा 50 बाघ मारे गए। असल में बाघों के शिकार की घटनाओं में आए-दिन बढ़ोतरी ही हो रही है।
प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त
बाघों की नौ में से तीन प्रजातियां पूरी तरह विलुप्त हो चुकी हैं। जहां तक रॉयल बंगाल टाइगर का सवाल है, समूची दुनिया में 70 फीसद बाघ भारत में ही हैं। ये उत्तर-पूर्वी इलाकों के अलावा पूरे देश और नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में भी पाए जाते हैं। हमारे देश में बाघों की घटती तादाद के मद्देनजर 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर चलाया गया। इस प्रोजेक्ट के तहत पूरे देश में अभी तक कुल मिलाकर 37,761 वर्ग किलोमीटर के इलाके में 50 टाइगर रिजर्व स्थापित किए गए हैं। आज बाघों की तादाद के बारे में सरकार की मानें तो 2014 की गणना के मुताबिक केवल 2226 है।
मानव जीवन के लिए समस्या
इनके शिकार पर अंकुश न लग पाना, इनके आवास स्थल जंगलों में अतिक्रमण, प्रशासनिक कुप्रबंधन, चारागाह का सिमटते जाना, जंगलों में स्थित प्राकृतिक जलस्नोतों के खत्म होते जाने से इनका मानव आबादी की ओर आना उनके लिए तो घातक हो ही रहा, मानव जीवन के लिए भी समस्या बन गई है। वन्य जीव-मानव संघर्ष इसका सबूत है। साथ ही पर्यटन ने भी इनके लिए कम दुश्वारियां पैदा नहीं की है। जंगलों और खेतों के बीच का अंतर कम होता जा रहा है। जंगलों में मानवीय दखलंदाजी के चलते ये चिड़चिड़े हो रहे हैं। जंगलों में इनके भोजन की भी कमी हो रही है। इनका प्रिय भोजन जंगली सुअर है, जिसका दिनोंदिन अभाव होता जा रहा है। इसके कारण ये शिकार नहीं कर पाते और शहरी बस्तियों की ओर रुख करते हैं।
वन्य जीव उत्पादों की बरामदगी
बीते महीनों में सुरक्षा बलों द्वारा तकरीबन दो सौ करोड़ रुपये के वन्य जीव उत्पादों की बरामदगी यह साबित करती है कि बाघों के शिकार पर लाख कोशिशों के बावजूद सरकार अंकुश लगा पाने में नाकाम रही है, जबकि साल 2016 में करीब 77 करोड़ रुपये के वन्यजीव उत्पाद जब्त किए गए थे। बीते साल यानी 2017 में वन्य जीव उत्पाद 2016 के मुकाबले ढाई गुना अधिक जब्त हुए हैं। यह चिंतनीय है। इस बारे में बीते दिनों उत्तराखंड वन विभाग का निर्णय सराहनीय है। उसने निर्णय लिया है कि यदि किसी के आवासीय परिसर, कार्यालय या संस्थान-प्रतिष्ठान में वन्य जीवों के अंग पाए जाते हैं तो जेल जाना होगा। इस हेतु राज्यभर में जांच अभियान चलाया जाएगा।
बाघों की तादाद में बढ़ोतरी
निष्कर्ष यह कि ऐसे हालात में बाघों की तादाद में बढ़ोतरी की उम्मीद बेमानी सी प्रतीत होती है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण उप महानिरीक्षक निशांत वर्मा का इस बारे में कहना है कि बाघों का शिकार सबसे बड़ा संकट है। शिकारियों से निपटने के लिए सभी राज्यों के साथ मिलकर प्रभावी रणनीति बनाई जा रही है, लेकिन हालात गवाह हैं कि आज बाघ न जंगल और न अभयारण्य कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। यदि इनका समय रहते उचित और प्रभावी संरक्षण कर पाने में हम नाकाम रहे तो वह दिन दूर नहीं जब ये इतिहास की वस्तु बन जाएंगे।
(लेखक राष्ट्रीय पर्यावरण सुरक्षा समिति के अध्यक्ष हैं)
पहली बार नहीं गई मासूमों की जान, अमेरिका में 80 साल से ज्यादा पुराना है गन कल्चर का इतिहास
पाकिस्तान से परमाणु हमले के खतरे को पूरी तरह नहीं किया जा सकता है खारिज
चाबहार के बाद अब ओमान के जरिए चीन के बढ़ते कदमों पर ब्रेक लगाएगा 'भारत'
सूखने की कगार पर गंगा ब्रह्मपुत्र समेत हिमालय से निकलने वाली 60 फीसद जलधाराएं
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।