'जो नेता बोते रहे, बांग्लादेश वही काट रहा', तसलीमा नसरीन ने कसा तंज
बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपने देश में धार्मिक कट्टरपंथ के बढ़ते हालात पर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार, बांग्लादेश की स्थिति अब तीन दशक पह ...और पढ़ें

भारत में रह रहीं बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन। (फाइल फोटो)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन ने पड़ोसी देश के मौजूदा हालत पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। उनको लगता है कि देश में हालात समय के साथ और खराब होते जा रहे हैं, यहां तक कि उस दिन से भी ज्यादा जब उन्हें तीन दशक पहले देश छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था।
आईएएनएस के साथ एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में तस्लीमा ने कहा, "मैं कहूंगी कि वह देश में धार्मिक कट्टरपंथ के बढ़ने की शुरुआत का समय था। अब, बांग्लादेश ऐसे तत्वों से भरा हुआ है।"
'मुझे बिना वजह के सजा दी गई'
लेखक ने कहा, "तत्कालीन प्रशासन कट्टरपंथियों के हाथों में खेल गया और मुझे बिना किसी वजह के सजा दी गई। उनकी नाजायज मांग पर चुपचाप सहमति ने कट्टरपंथियों को और मजबूत किया और आज आप जो देख रहे हैं, वह ऐसे ही सरकारी इशारों का नतीजा है, जिससे बड़े पैमाने पर धार्मिक असहिष्णुता फैली है।"
कौन हैं तसलीमा नसरीन?
तसलीमा ने डॉक्टर बनने के लिए मेडिसिन की पढ़ाई की, लेकिन साहित्य के प्रति अपने प्यार के कारण उन्होंने उपन्यास और कविताएं लिखने के लिए कलम उठा ली। 1994 में उनके उपन्यास 'लज्जा' (शर्म) के कारण उन्हें बांग्लादेश से देश निकाला दे दिया गया, क्योंकि इस उपन्यास से इस्लामी समूहों में गुस्सा भड़क गया था और उन्होंने उन पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया था।
1993 में पब्लिश हुई 'लज्जा' में भारत में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को बताया गया था। इस नॉवेल को सरकार ने कथित तौर पर सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने के आरोप में बैन कर दिया था। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं, हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए और गिरफ्तारी का वारंट भी जारी हुआ।
अशांति के बढ़ने के डर से तत्कालीन प्रधानमंत्री खालिदा जिया की सरकार ने उन्हें देश से निकाल दिया। तब से वह निर्वासन में रह रही हैं - पहले स्वीडन में, बाद में भारत में। उसके पास स्वीडिश नागरिकता है, लेकिन वह रिन्यूएबल परमिट पर भारत में रहती है।

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