बोलने में दोष के कारण प्रवेश देने से इन्कार; सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस, तीन हफ्ते में मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने एक लड़की द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। लड़की को बोलने में दोष के कारण मेडिकल कोर्स में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था।

नई दिल्ली, पीटीआइ। सुप्रीम कोर्ट ने एक लड़की द्वारा दायर याचिका पर केंद्र और अन्य से जवाब मांगा है। इस लड़की को बोलने में दोष के कारण मेडिकल कोर्स में प्रवेश से वंचित कर दिया गया था। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने केंद्र सरकार, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और अन्य को नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत बोलने में दोष से पीडि़त एक लड़की द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने स्नातक चिकित्सा शिक्षा, 1997 पर भारतीय चिकित्सा परिषद के संशोधित नियमों को चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता को परीक्षा से किया गया बाहर
पीठ ने कहा, 'चूंकि याचिकाकर्ता दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 के अर्थ में एक मानक (बेंचमार्क) दिव्यांगता से पीडि़त है, विनियमों के परिणामस्वरूप उसे इस आधार पर अपनी चिकित्सा शिक्षा को हासिल करने से रोका गया है कि उसका बोलने का दोष 40 प्रतिशत से अधिक है। नोटिस जारी कीजिए।' याचिका में स्नातक चिकित्सा शिक्षा, 1997 पर संशोधित विनियमों को चुनौती दी गई है जिसके परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को परीक्षा से बाहर कर दिया गया है।
अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति कोई अधिकार नहीं
इससे इतर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति कोई अधिकार नहीं वरन रियायत है। ऐसी नियुक्ति प्रदान करने का मकसद पीड़ित परिवार को आकस्मिक संकट से उबारने में मदद करना है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को रद कर दिया जिसमें फर्टिलाइजर्स एंड केमिकल्स त्रावणकोर लिमिटेड और अन्य को अनुकंपा के आधार पर एक महिला की नियुक्ति के मामले पर विचार करने का निर्देश दिया गया था।
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