'शक करने वाला पति हो तो जीवन नर्क', केरल HC ने जिला अदालत के फैसले में दखल देने से किया इनकार; पति को सुनाई 6 महीने की सजा
केरल हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें एक पति को 498A और दहेज उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराया गया था और छह महीने की जेल की ...और पढ़ें

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। केरल हाई कोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें पति को 498A (पत्नी को परेशान करने) और दहेज के मामले में दोषी पाया गया था और उसे छह महीने जेल की सजा सुनाई गई थी।
27 नवंबर, 2025 को केरल हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 498A मामलों में सिर्फ आजाद गवाहों की कमी से मामला कमजोर नहीं होता। करीबी रिश्तेदारों के सबूतों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वे पत्नी के रिश्तेदार हैं।
केरल हाई कोर्ट ने क्या कहा?
केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत आने वाले मामलों में आजाद गवाहों की गैरमौजूदगी, अपने आप में अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर नहीं कर सकती। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि करीबी रिश्तेदारों के सबूतों को सिर्फ पीड़ित के साथ उनके रिश्ते की वजह से नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अभियोजन पक्ष ने क्या तर्क दिया?
अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी, जो असल शिकायतकर्ता (पत्नी) का पति है, उसने उसे क्रूरता का शिकार बनाया और लगातार दहेज की मांग करते हुए उसे मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान किया, इस प्रकार उसने आईपीसी की धारा 498A के तहत अपराध किया।
अपने केस का समर्थन करने के लिए अभियोजन पक्ष ने 10 गवाहों (PW-1 से 10) को बुलाया और Exts.P1 से P5 सबमिट किए। अभियोजन पक्ष के सबूत पेश होने के बाद, आरोपी पति से सेक्शन 313(1)(b) Cr.P.C. के तहत पूछताछ की गई। आरोपी पति ने कहा कि वह बेगुनाह है, लेकिन अपने बचाव में कोई सबूत नहीं दे पाया।

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