स्मार्टफोन के दौर में बढ़ा एकाग्रता का संकट, 'फोकस एप्स' बन रहे समाधान
ये एप टाइमर, ब्लॉकिंग और गेमिफिकेशन का उपयोग करके ध्यान केंद्रित करने में मदद करते हैं। हालांकि इनकी दीर्घकालिक प्रभावशीलता पर शोध सीमित है, ये आदतें ...और पढ़ें

तस्वीर का इस्तेमाल प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। अगर स्मार्टफोन हमारी एकाग्रता भंग कर रही है तो इसका निदान भी वहीं मौजूद है। इसके लिए कुछ इनोवेटर ऐसे एप लेकर आए हैं, जो एकाग्रता बढ़ा सकते हैं। ये 'फोकस और प्रोडक्टिविटी एप्स' टाइमर, एप-ब्लॉकिंग, गेमिफिकेशन और इनाम के जरिए ध्यान केंद्रित रखने का दावा करते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ कैंटरबरी के ड्वेन एलन ने इन एप का अध्ययन किया कि ये कितने कारगर हैं। निष्कर्ष में उन्होंने पाया कि सीमित समय के लिए इन एप्स का इस्तेमाल अपनी आदत विकसित करने में किया जा सकता है।
क्यों भटकता है ध्यान
विशेषज्ञ बताते हैं कि ध्यान भटकने की जड़ तकनीक नहीं, बल्कि हमारी भावनाएं और आदतें हैं। जब कोई काम उबाऊ, कठिन या तनावपूर्ण लगता है, तो मन उससे बचने का रास्ता खोजता है। स्मार्टफोन इस बचाव का सबसे आसान जरिया बन चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि शोध यह नहीं कहते कि इंसान की फोकस करने की क्षमता कम हो गई है, बल्कि यह जरूर बताते हैं कि आज का माहौल हमारे ध्यान पर पहले से कहीं ज्यादा दबाव डालता है। लगातार डिजिटल व्यवधान और मल्टीटास्किंग से कुछ लोगों में ध्यान भटकने की प्रवृत्ति बढ़ी है
एकाग्रता बढ़ाने वाले एप
इसी पृष्ठभूमि में 'फोकस फ्रेंड' जैसे एप सामने आए हैं। यह एप एक वर्चुअल कैरेक्टर के जरिए यूजर को तय समय तक फोन से दूर रहकर काम करने के लिए प्रेरित करता है। फोकस सत्र पूरा होने पर डिजिटल इनाम मिलते हैं, जबकि नियम तोड़ने पर नुकसान होता है। इसमें प्रोत्साहन, प्रतिबद्धता और 'आइकिआ इफेक्ट' जैसे मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का इस्तेमाल किया गया है। आइकिया इफेक्ट में हम खुद की बनाई या जोड़ी गई वस्तुओं को ज्यादा महत्व देने लगते हैं। फोकस फ्रेंड एप पिछले साल अगस्त में लांच हुआ और पहले ही महीने में सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जाने के मामले में इसने चैटजीपीटी को पीछे छोड़ दिया।
आदत बनाने में कारगर हो सकते हैं फोकस एप
हालांकि, फोकस एप्स की प्रभावशीलता पर शोध अभी सीमित हैं। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि गेमिफाइड एप्स यूजर्स को पसंद तो आते हैं, लेकिन लंबे समय तक उनका उपयोग कम होता है और वे सरल उपायों- जैसे फोन को ग्रेस्केल मोड में डालना- से भी कम प्रभावी साबित होते हैं।
केवल मनोरंजन या आनंद मिलना उत्पादकता बढ़ने की गारंटी नहीं है। एलन ने बताया कि यदि किसी को काम के दौरान बार-बार फोन देखने की आदत है, तो सीमित समय के लिए फोकस एप आजमाए जा सकते हैं।
साथ ही यह भी जरूरी है कि यूजर अपने अनुभव की समीक्षा करें और समझें कि एप उनकी मदद कर रहा है या वे एप के गुलाम बनते जा रहे हैं।अंत में, फोकस एप्स एक सहारा हो सकते हैं, लेकिन असली लड़ाई भीतर की है।
ध्यान भटकने के कारणों को समझना, असहजता को स्वीकार करना और जरूरी काम पर टिके रहने का फैसला ही लंबे समय में फोकस वापस ला सकता है।
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