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    जब बांग्लादेश की दो धुरविरोधी बेगमों को भारत की R&AW ने कर दिया था एकजुट, क्या है कहानी?

    Updated: Sat, 03 Jan 2026 04:46 PM (IST)

    भारत की खुफिया एजेंसी रॉ ने 1980 के दशक के अंत में बांग्लादेश की प्रतिद्वंद्वी नेता खालिदा जिया और शेख हसीना को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ...और पढ़ें

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    खालिदा जिया और शेख हसीना।

    डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का पिछले साल 30 दिसंबर को निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय खत्म हो गया। वह इस देश की सियासत की धुरी रहीं और अपनी कट्टर विरोधी शेख हसीना के साथ दुश्मनी हमेशा चर्चा में रही। लेकिन उनके राजनीतिक सफर में एक वक्त ऐसा भी आया था जब अपने मतभेदों को भुला दिया था।

    दरअसल, उन्होंने जनरल एचएम इरशाद के तानाशाही शासन को खत्म करने में मदद करने के लिए शेख हसीना के साथ अपने निजी और राजनीतिक मदभेदों को भुला दिया था और इसमें भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने अहम भूमिका निभाई थी।

    जब खालिदा जिया और शेख हसीना को मिलाने में रॉ ने की थी मदद

    यह बात है 1988 की। विवादित चुनावों के बाद जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद ने बांग्लादेश की सत्ता हथिया ली थी। शेख हसीना की आवामी लीग और खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच राजनीतिक फूट पड़ी हुई थी और इसे देखते हुए भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ थोड़ी चिंतित रहने लगी। यह फूट तब भी बनी रही जब अवामी लीग, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी सहित सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने चुनावों का बहिष्कार किया था।

    उस समय भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) के ढाका स्टेशन प्रमुख ने कथित तौर पर दोनों विपक्षी नेताओं को कोड में मैसेज भेजे, उनसे जनरल इरशाद को एक आम दुश्मन मानने का आग्रह किया और सुझाव दिया कि यह उनके लिए अपने मतभेदों को भुलाकर सत्तावादी शासन के खिलाफ एकजुट होने का सही समय है। यह रणनीति सफल रही, जिससे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए और आखिरकार दिसंबर 1990 में इरशाद को सत्ता से हटा दिया गया।

    एकता की छोटी सी कहानी बनी राजनीतिक इतिहास का सुनहरा अध्याय

    यही वो समय था जब खालिदा जिया ने शेख हसीना के साथ अपनी कड़ी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद जनरल इरशाद के सैन्य शासन को गिराने में मदद करने के लिए एक बार व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों तरह के मतभेदों को भुला दिया था। यतीश यादव की किताब RAW: A History of India’s Covert Operations में बताई गई एकता की यह छोटी लेकिन अहम कहानी, बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास में एक सुनहरा अध्याय बना हुआ है।

    रॉ ने क्यों दिया था दखल?

    अगस्त 1975 में हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद ढाका लगभग पूरब का बर्लिन बन गया था, क्योंकि अमेरिकी, सोवियत और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को राजनीतिक रूप से अस्थिर माहौल में अपने एजेंट बनाने का भरपूर मौका मिल गया था।

    1980 के दशक में बांग्लादेश पर राज करने वाले जनरल एच एम इरशाद को शुरू में भारत समर्थक माना जाता था। हालांकि, समय के साथ पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) और अमेरिकी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) से उनकी बढ़ती नजदीकी नई दिल्ली के लिए एक गंभीर चिंता बन गई।

    जवाब में रॉ ने अपने ढाका स्टेशन पर एक नए चीफ की नियुक्ति की। नवंबर 1988 में बांग्लादेश की राजधानी पहुंचने के तुरंत बाद इस अधिकारी (जिसका कोडनेम कृष्णा पटवर्धन था) को एहसास हुआ कि उसके जूनियर अंडरकवर एजेंट इरशाद सरकार की गहरी निगरानी में काम कर रहे थे।

    रॉ ने संभाला मोर्चा

    यतीश यादव की किताब RAW: A History of India’s Covert Operations के मुताबिक, इंडिया के डिप्लोमैटिक मिशन में काम करने वाले लोकल स्टाफ सरकार के लिए मुखबिर का काम कर रहे थे। पटवर्धन ने रॉ के ऑपरेशन्स को तेजी से टाइट किया, एजेंसी के इन्फॉर्मेशन-शेयरिंग सिस्टम में कमियों को दूर करने के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर शुरू किया।

    उन्होंने इरशाद के राजनीतिक विरोधियों से भी बातचीत शुरू की, लेकिन पार्टियों के बीच बढ़ती दरार से परेशान थे। खासकर शेख हसीना और खालिदा जिया के बीच। दोनों नेताओं को कोडेड मैसेज भेजने के बाद, वह उन्हें इस बात पर राजी करने में कामयाब रहे कि इरशाद को हटाना उनकी सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके बाद जनरल पर दबाव बढ़ गया।

    वहीं, दूसरी तरफ रॉ ने छात्र नेता तैयार किए, बांग्लादेश के भीतर मुखबिरों का नेटवर्क बनाया और सिस्टम के अंदर भारत विरोधी तत्वों का मुकाबला करने के लिए काम किया। इस पूरे समय में इरशाद का इंटेलिजेंस सिस्टम भारत की खुफिया कोशिशों से अनजान रहा। हालांकि, सार्वजनिक रूप से नई दिल्ली ने ढाका के साथ अच्छे डिप्लोमेटिक रिश्ते बनाए रखे।

    दो विरोधियों ने की एक ही आवाज में बात

    फिर 27 फरवरी, 1988 को कुछ ऐसा हुआ जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की थी और लोग कह रहे थे कि ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। हसीना और खालिदा जिया ने राष्ट्रपति इरशाद की मिलिट्री समर्थित सरकार के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन करने की अपील कर दी।

    उन्होंने लोगों से 3 मार्च को होने वाले मिडटर्म संसदीय चुनावों का बहिष्कार करने का आग्रह किया और चेतावनी दी कि इसमें हिस्सा लेने से केवल तानाशाही शासन ही कायम रहेगा। यह पहली बार था जब दोनों नेताओं ने देश के राजनीतिक संकट पर एक ही आवाज में बात की।

    इस बयान से विपक्ष में जोश भर गया, छात्रों और प्रोफेशनल्स में नई जान आ गई और यह साफ संकेत मिला कि इरशाद की सत्ता पर पकड़ कमजोर हो रही है।

    ऑपरेशन फेयरवेल, इरशाद का पतन

    जून 1988 में राष्ट्रपति इरशाद ने इस्लाम को राज्य धर्म घोषित करके विपक्ष को बांटने की कोशिश की, इस कदम से अवामी लीग और बीएनपी के बीच वैचारिक मतभेद और गहरे हो गए। हालांकि खालिदा जिया की पार्टी ने सैद्धांतिक रूप से इस फैसले का विरोध नहीं किया, लेकिन शेख हसीना की अवामी लीग ने 1975 में शेख मुजीबुर रहमान और अन्य लोगों की हत्याओं के लिए 1972 के संविधान के तहत न्याय की मांग की।

    जैसे-जैसे राजनीतिक अशांति बढ़ी और इरशाद की वैधता लगातार कमजोर होती गई, हसीना और खालिदा जिया ने एक बार फिर अपने मतभेद भुला दिए और मिलकर कार्रवाई करने पर सहमत हो गईं।

    इसी समय ढाका में रॉ के ऑपरेटिव्स ने एक डिटेल्ड प्लान तैयार किया, जिसका कोडनेम 'ऑपरेशन फेयरवेल' रखा गया। चार अधिकारियों को इस ऑपरेशन को पूरा करने का काम सौंपा गया और उन्हें जरूरी संसाधन दिए गए। अगस्त 1990 तक डॉक्टरों, वकीलों और दूसरे प्रोफेशनल्स ने इरशाद के इस्तीफे की मांग करते हुए हड़तालें शुरू कर दीं।

    छात्रों का विरोध प्रदर्शन जल्द ही तेज हो गया और पूरे देश में फैल गया। यह सभी काम रॉ की प्लानिंग के हिसाब से हो रहे थे। 27 नवंबर को ढाका के यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन शुरू हो गए और हसीना और खालिदा दोनों को एक बार फिर गिरफ्तार कर लिया गया।

    जब आंदोलन धीमे पड़े या एकता थोड़ी कमजोर हुई तो उनमें से किसी ने भी अपना रुख नरम नहीं किया। देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों, बार-बार होने वाली पेशेवर हड़तालों और लगातार छात्र लामबंदी ने शासन को पस्त कर दिया। गिरफ्तारियों, दमन और धमकियों से भी यह लहर नहीं रुकी। 4 दिसंबर, 1990 को इरशाद ने इस्तीफा दे दिया, जिससे करीब नौ साल के मिलिट्री समर्थित शासन का अंत हो गया।

    ऐसा करके उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इरशाद के शासन को खत्म करने में उनकी भूमिका देश के लोकतंत्र के संघर्ष में एक "सुनहरे अध्याय" के रूप में याद रखी जाएगी।

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