Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck

    शुद्ध पानी न मिलने से हर साल 4 लाख मौतें; कागजों पर मिशन; हकीकत में 'जहर' उगल रहे नल

    By Arvind PandeyEdited By: Deepti Mishra
    Updated: Mon, 05 Jan 2026 06:39 PM (IST)

    देश में अशुद्ध पेयजल के कारण प्रति वर्ष चार लाख लोगों की मौत डायरिया से हो रही है, जबकि एक करोड़ लोग दिव्यांगता या अन्य बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। ...और पढ़ें

    News Article Hero Image

    स्मार्ट व्यू- पूरी खबर, कम शब्दों में

    अरविंद पांडेय,नई दिल्ली। देश में शुद्ध पेयजल न मुहैया होने से हर साल चार लाख लोगों की मौत डायरिया से हो रही है, साथ ही करीब एक करोड़ लोग दिव्यांगता या दूसरी संक्रमित बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। इसके बावजूद राज्य सरकारों की तंद्रा नहीं टूट रही।

    लगातार देश के सबसे स्वच्छ शहर का खिताब जीत रहे इंदौर में अशुद्ध पेयजल से हुई मौतों ने थोड़ा झकझोरा तो है, लेकिन हकीकत यह है कि पेयजल आपूर्ति अभी तक राज्य सरकारों की प्राथमिकता में आ नहीं पाई है। केवल आंकड़े देख लीजिए तो पता चल जाएगा।

    शुद्ध पेयजल की आपूर्ति व सीवर लाइन के लिए स्वीकृत 1.93 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं में से केवल 44 हजार करोड़ के काम पूरे हो पाए हैं जबकि अमृत (अटल नवीनीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन) की अवधि इसी साल मार्च में खत्म हो रही है।

    इंदौर तो एक झांकी है। सच्चाई यह है कि सीवर और पेयजल लाइन की खराब प्लानिंग व डिजायन, जल संचयन के अपर्याप्त प्रबंधन और शुद्धीकरण के लिए इंतजाम व निगरानी के अभाव ने ऐसी स्थिति खड़ी कर दी है कि कोई भी शहर ऐसा नहीं जहां कुछ आबादी तक अशुद्ध जल न पहुंचता हो। शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के कान में घंटी तब बजती है, जब मौतें होती हैं। इंदौर में भी यही हुआ है।

    सरकार! यह कैसा विरोधाभास?

    इंदौर का विरोधाभास देखिए- इंदौर शहर के पास के एक गांव रालामंडल में ग्रामीण जल जीवन मिशन के तहत सभी काम पूरे दिखाए जा रहे हैं। इंटरनेट पर आंकड़ा बताता है कि इस गांव में पेयजल की शुद्धता की आखिरी जांच 17 दिसंबर 2025 को हुई और सब कुछ दुरुस्त पाया गया, लेकिन शहर में मौत से पहले की जो अनदेखी हुई और मंत्री स्तर से संवेदनहीनता दिखी, वह कुछ और बयां कर रहा है।

    बहुत संभव है कि कागजी घोड़े ज्यादा दौड़ लगा रहे हैं। इस मिशन के तहत आबादी के हिसाब से फंडिंग पैटर्न है, जिसमें केंद्र और राज्यों की भागीदारी होती है। संभवत: कई राज्यों में फंड की कमी भी आड़े आ रही हो, लेकिन यह सच है रेवड़ी संस्‍कृति में कोई राज्य पीछे नहीं है।

    DS Rai

    शुद्ध जल के लिए सरकार ने क्या किया?

    शुद्ध जल की समस्या को दूर करने के लिए पहली बार केंद्र की ओर से दो मिशन शुरू किए गए, इनमें एक शहरी क्षेत्रों में शुद्ध पेजयल और सीवरेज प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए अमृत मिशन है, जबकि दूसरा ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक घर तक शुद्ध नल जल मुहैया कराने के लिए जल जीवन मिशन है। पर इस मूलभूत जरूरत के लिए राज्य सरकारों में सक्रियता की कमी रही।

    शुद्ध पेयजल मुहैया कराने से जुड़ी परियोजनाओं पर राज्यों के इस सुस्त रवैये और केंद्र की कमजोर निगरानी पर हाल ही में संसदीय समिति ने भी सवाल खड़े किए हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र से तत्काल हस्तक्षेप करने को कहा है।

    132 में से सिर्फ चार परियोजनाएं पर ही हुआ काम

    अमृत मिशन 1.0 में जहां 32 पुराने जल शोधन संयंत्रों के उन्नयन से जुड़ी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, वहीं अमृत मिशन 2.0 में 132 नए जल शोधन संयंत्रों को लगाने की परियोजना स्वीकृत की गईं, लेकिन राज्यों का सुस्त रवैया कुछ इस तरह है कि इनमें से सिर्फ चार परियोजनाएं ही अब तक पूरी हो पाई हैं।

    इनमें सबसे अधिक 43 जल शोधन संयंत्रों को लगाने के प्रस्ताव मध्य प्रदेश में स्वीकृत किए गए हैं, जबकि अभी तक एक भी इनमें से पूरा नहीं हो पाया है।

    इन मिशनों के तहत नगरीय निकायों और गांव पंचायतों को भी हर घर शुद्ध जल मुहैया कराने के लिए एक तंत्र विकसित करने के लिए कहा गया था ताकि इन परियोजनाओं को आगे भी बेहतर ढंग से संचालित और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए विस्तार दिया जा सके।

    इनमें पानी पर कर लगाने व उसे वसूलने और पानी की 24 घंटे उपलब्धता सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाने के लिए कहा गया था, लेकिन इन पर भी कुछ नगरीय निकायों को छोड़ दें तो कहीं कोई काम नहीं हुआ।

    Hitesh vaidhya

    क्‍या जल संकट के मुहाने पर है?

    वैश्विक मानक को देखे तो यदि प्रति व्यक्ति 1,700 घन मीटर से कम वार्षिक जल उपलब्धता है तो उसे जल संकट माना जाएगा। वर्तमान में देश में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता 1,341 घन मीटर हो गई है, जबकि 2021 में यह आंकड़ा 1,487 घन मीटर था। यानी देश में जल संकट बढ़ रहा है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के 20 सबसे अधिक जल संकटग्रस्त शहरों में पांच भारत से हैं। इनमें दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद शामिल हैं। मंत्रालय की घर-घर जल पहुंचाने की पहल को इस संकट से निपटने की कोशिश माना जा रहा है।

    मौजूदा समय में देश में पीने के पानी का ठीक से प्रबंधन न होने से बड़ी संख्या में पानी खराब हो रहा है। यह स्थिति तब है, जब दुनिया की करीब 17 प्रतिशत जनसंख्या भारत में रहती है, वहीं मीठे पानी की उपलब्धता यानी उसके स्रोत सिर्फ चार प्रतिशत ही मौजूद हैं।

    अमृत मिशन 1.0: का पूरा लेखा-जोखा

    • अवधि- 2015-16 से 2020-21 तक।
    • कुल स्वीकृत परियोजनाएं- 6008 । 
    • कुल लागत- 83,463 करोड़ रुपये।

    79 हजार करोड़ के काम पूरे हो चुके हैं। करीब चार हजार करोड़ के काम अभी लंबित हैं। केंद्र अब तक राज्यों को 34,900 करोड़ की वित्तीय सहायता दे चुका है।

    इन परियोजनाओं में 43 हजार करोड़ की 1403 जलापूर्ति परियोजनाएं थीं, जबकि 34 हजार करोड़ की 890 सीवरेज और सेप्टेज परियोजनाएं शामिल थीं।

    Amrat Mission 1

    अमृत मिशन-2.0: का पूरा लेखा-जोखा

    • अवधि- 2021-22 से 2025-26
    • कुल अनुमानित लागत 2.77 लाख करोड़ रुपये
    • स्वीकृत परियोजनाएं- कुल 8791
    • लागत 1.93 लाख करोड़ रुपये


    अब तक 44 हजार करोड़ का काम ही पूरा हो पाया, जबकि 35 हजार करोड़ रुपये अब तक खर्च हुए हैं।

    Jal Jeewan Project

    अमृत मिशन का फंडिंग पैटर्न

    10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को कुल परियोजना लागत का एक-तिहाई केंद्र सरकार देती है, जबकि एक लाख से 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों में परियोजना लागत की 50 प्रतिशत केन्द्रीय सहायता दी जाती है।

    जल जीवन मिशन का फंडिंग पैटर्न

    हिमालयी और उत्तर पूर्वी राज्यों को परियोजना लागत का 90 प्रतिशत केंद्र देता है, जबकि 10 प्रतिशत राज्य देते हैं, वहीं बाकी राज्यों में परियोजनाओं का आधा-आधा पैसा केंद्र और राज्य दोनों वहन करते हैं।

    Administraion challange

    स्थानीय निकायों में बड़े बदलाव की जरूरत

    नगर निगमों को गंभीर वित्तीय और शासन से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। वे राज्य और केंद्र सरकार की ग्रांट पर बहुत अधिक निर्भर हैं। सीमित राजस्व, कर्मचारियों की कमी और चुनाव में देरी के कारण, वे बुनियादी सेवाएं मुहैया कराने में संघर्ष कर रहे हैं। स्थानीय सरकारों को मजबूत बनाने और सर्विस डिलीवरी में सुधार के लिए एक बड़े बदलाव की जरूरत है।

    शहरों की रीढ़ हैं नगर निगम

    देश के बड़े शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) अपने 25 प्रतिशत वित्तीय संसाधनों के लिए राज्य और केंद्र सरकार पर निर्भर हैं। नगर निगम भारत में शहरी शासन की रीढ़ हैं, जिन्हें पानी की सप्लाई, कचरा प्रबंधन और बुनियादी संरचनाओं के विकास जैसी जरूरी सेवाओं का प्रबंधन करने का काम सौंपा गया है। उनकी वित्तीय स्थिति नाजुक है।

    Nagar Nigam Jal Jeevan

    यह भी पढ़ें- फरीदाबाद में प्रदूषित पानी ने मचाया कोहराम, झाड़सेतली गांव के 30 लोगों की चली गई जान; कैंसर का बढ़ा खतरा