नई दिल्‍ली। Coronavirus पूरी दुनिया इस समय कोरोना वायरस के खौफ में है। दो दिन पहले ही विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने इसको महामारी घोषित किया है। इतना ही नहीं डब्‍ल्‍यूएचओ ने इसको देखते हुए सभी देशों से अपील भीकी है कि वह इसको लेकर सभी जरूरी इंतजाम करें। डब्‍ल्‍यूएचओ ने कुछ दिन पहले ही स्‍वास्‍थ्‍यकर्मियों के इस्‍तेमाल की जाने वाली जरूरी चीजों की कमी को लेकर भी चिंता जताई थी। संगठन का कहना था कि पूरी दुनिया को इनके निर्माण में करीब 40 फीसद तेजी लानी होगी। इस बीच पूरी दुनिया में इसकी दवा की खोज को लेकर वै‍ज्ञानिक शोधकार्य में जुटे है। इस बीच ब्‍लूमबर्ग डॉटइन ने आशंका जताई है कि इसकी दवा को विकसित करने में चूहों की कमी आड़े आ रही है। 

आपको बता दें कि किसी भी दवा के विकसित करने में जानवर बड़ी भूमिका निभाते हैं। इन पर वैज्ञानिक शुरुआती परीक्षण करते हैं। कोरोना को लेकर वैज्ञानिक चूहों पर दवा का परीक्षण करने में लगे हैं। आगे बढ़ने से पहले आपको ये भी बता दें कि अब तक इसकी दवा बनाने में वैज्ञानिक नाकाम रहे हैं। हालांकि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक इसपर काम कर रहे हैं। ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक इंसान पर दवा का प्रयोग करने से पहले चूहों पर इसका प्रयोग ये देखने के लिए किया जाता है कि ये कितनी सुरक्षित है।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि इंसान और चूहों के अंदर कुछ जीन्‍स एक ही किस्‍म के होते हैं। कई बार जिस वायरस से इंसान की मौत तक हो सकती है उनका असर इन पर नहीं होता है। कोलरेडो स्‍टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिकार्ड बोवेन के मुताबिक कुछ वायरस हमें नुकसान पहुंचा सकते हैं लेकिन इन्‍हें नहीं।

इसलिए वैज्ञानिक अक्सर ऐसे चूहों की तलाश करते हैं जिन्‍हें एसीई 2 नामक मानव जीन के साथ आनुवंशिक रूप से संशोधित किया गया हो। पूरी दुनिया में कोरोना वायरस फैलने की वजह से यह काफी हद तक संभव है कि इस तरह के चूहे मिल जाएं। हालांकि पूरी दुनिया में इस तरह के चूहों की मौजूदगी को लेकर कोई आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है। कुछ इनकी उपलब्‍धता में कमी की बात कर रहे हैं तो कुछ शोधकर्ताओं को उम्‍मीद है कि आने वाले कुछ सप्‍ताह के अंदर इनकी उपलब्‍धता सुनिश्चित हो जाएगी।

हर संभावित बीमारी के लिए चूहों को संभाल कर रखना संभव नहीं है। ऐसा इसलिए भी है क्‍योंकि शोधकर्ता अक्‍सर कोरोना वायरस की दवा तलाशने की जगह सार्स, कैंसर, हेपेटाइटिस और दूसरी बीमारियों की दवा तलाशना ज्‍यादा आकर्षक मानते हैं। इनके शोध में कई तरह के जानवरों की जरूरत होती है जिनपर इन दवाओं का शोध करना होता है। फ्रांस के लियोन में लैब एनिमल डेवेलपर कादर थियम कहते हैं, 'रिसर्च ट्रेंड को फॉलो करती है और फिलहाल लोग ऑन्‍कोलॉजी और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर पर ध्यान दे रहे हैं।

जैक्सन प्रयोगशाला, मेन में एक गैर-लाभकारी संस्‍था है जो चिकित्सा शोधकर्ताओं को जानवरों की आपूर्ति करती है। इसके मुताबिक वह 11,000 से अधिक प्रकार के चूहों को विभिन्‍न प्रयोगशालाओं को उपलब्‍ध कराती है। लेकिन जब जनवरी में कोरोनो वायरस का प्रकोप बढ़ने के बाद इसके पास जरूरी जीन नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे इस वायरस ने पूरी दुनिया में पांव फैलाना शुरू किया तो इस तरह के जीन्‍स की मांग भी काफी बढ़ गई। इसके बाद इन्‍होंने उन लोगों के लिए मेडिकल लिटरेचर को परिमार्जित करना शुरू किया जिन्होंने चूहों के साथ काम किया है।

इन्‍होंने इस पर भी काम किया कि क्‍या वे इनमें से कुछ को प्रजनन के लिए कुछ दान कर सकते हैं। लैब के प्रमुख के मुताबिक वह पहले उन जानवरों को ले रहे हैं जो फिलहाल अतिरिक्त प्रजनन करने की प्रक्रिया में हैं। इनके मुताबिक किसी चूहे के जन्‍म और उसको परिपक्‍व होने में करीब छह सप्‍ताह का समय लगता है। इनकी कमी होने की वजह से वैज्ञानिक दवाओं का परीक्षण नहीं कर सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया की फ्लिंडर्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर निकोलाई पेत्रोव्स्की दवाओं के विकसित करने में इसको बड़ी अड़चन मान रहे हैं।

उनका कहना है कि कुछ लोग इस तरह की बात भी कर रहे हैं कि चूहों की गैर मौजूदगी में इन दवाओं का परीक्षण इंसानों पर किया जाना चाहिए, जो बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। हालांकि इस बीच कुछ वैज्ञानिक दूसरे विकल्‍पों पर भी विचार कर रहे हैं। एक वैज्ञानिक के मुताबिक इन संभावित दवाओं का परीक्षण दूसरे जानवरों पर किया जा सकता है।

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