लाल आतंक के गढ़ पर वार, अब विकास की बयार... दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादन केंद्र बनने जा रहा गढ़चिरौली
दशकों से माओवादी हिंसा से त्रस्त गढ़चिरौली अब दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादन केंद्र बनने जा रहा है। यहां 40 मिलियन टन से अधिक इस्पात उत्पादन क्षमत ...और पढ़ें

जिले में 40 लाख मिलियन टन से अधिक इस्पात का उत्पादन हो सकेगा (फोटो: जागरण)
ओमप्रकाश तिवारी, गढ़चिरौली (महाराष्ट्र)। करीब साढ़े चार दशक तक माओवादी हिंसा से त्रस्त रहे गढ़चिरौली जिले के दिन बहुरने की शुरुआत हो गई है। आने वाले कुछ वर्षों में गढ़चिरौली दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादन केंद्र बनने जा रहा है। यहां एक ही जिले में 40 लाख मिलियन टन से अधिक इस्पात का उत्पादन हो सकेगा।
एक तरफ छत्तीसगढ़ तो दूसरी ओर तेलंगाना से सटा गढ़चिरौली जिला न सिर्फ लौह अयस्क बल्कि अन्य खनिजों से भी संपन्न है। 2014 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही देवेंद्र फडणवीस ने यहां औद्योगिक विकास के लिए सोचना शुरू किया था। अब योजनाओं को धरातल पर उतारने की तैयारी शुरू हो गई है। सिर्फ इस्पात क्षेत्र में ही लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का निवेश आ रहा है।

उत्पादन क्षमता 10 मिलियन टन
लायड्स मेटल्स एंड एनर्जी लि. (एलएमईएल) पहले से ही कोनसारी में कार्यरत है। इसकी उत्पादन क्षमता 10 मिलियन टन है। जिंदल समूह की जेएसडब्ल्यू स्टील अगले कुछ वर्षों में 25 मिलियन टन और सुरजागढ़ इस्पात प्रा. लि. पांच मिलियन टन क्षमता की इस्पात उत्पादन इकाई शुरू करने जा रही है।
इस्पात उद्योग का केंद्र बनने के बाद गढ़चिरौली में 40,000 से 50,000 तक नौकरियां सृजित होंगी। इसके अलावा कई और उद्योग भी इस क्षेत्र में आएंगे। इनसे भी बहुत बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होगा।
अविश्यंत पांडा, कलेक्टर, गढ़चिरौली

गढ़चिरौली में इस्पात उत्पादन की बेहतर संभावनाएं देखते हुए टाटा स्टील्स ने भी लायड्स मेटल्स के साथ भागीदारी की घोषणा कर दी है। इस प्रकार गढ़चिरौली में अगले कुछ वर्षों में ही 40 मिलियन टन इस्पात उत्पादन के संयंत्र गढ़चिरौली जिले में लगने जा रहे हैं। ये सारी इकाइयां शुरू होने के बाद गढ़चिरौली दुनिया का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादन केंद्र बन जाएगा।
...ताकि जल, जंगल, जमीन के बहाने ग्रामीणों को न भड़का सकें
जहां एक ओर औद्योगिकीकरण से गढ़चिरौली जिले का कायापलट हो रहा है, वहीं खनिज दोहन से जिले की वनसंपदा पर खतरा भी मंडरा रहा है। वह भी उस क्षेत्र में, जहां लोग जल-जंगल-जमीन के लिए ही हथियार उठाने पर बाध्य हुए थे। इसका विशेष ध्यान रखते हुए जिला प्रशासन द्वारा वनक्षेत्र में खनिज दोहन से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए एक करोड़ वृक्ष रोपने की योजना तैयार की गई है। इस योजना के तहत अब तक चार लाख पौधे लगाए भी जा चुके हैं।
विस्तार योजना
- मुंबई से नागपुर तक बनाए गए समृद्धि महामार्ग को गढ़चिरौली तक विस्तार देने की घोषणा पहले ही हो चुकी है
- जिले को रेलमार्ग से जोड़ने के लिए शुरू गढ़चिरौली-वाडसा-गढ़चिरौली रेल परियोजना भी जल्दी ही पूरी होने के आसार
- हवाई अड्डे के लिए भी तीन स्थानों का सर्वे पूरा
- जिले में करीब 550 मोबाइल टावर भी लगाए गए
- इस्पात उद्योगों को कुशल मानव संसाधन उपलब्ध कराने के लिए लायड्स मेटल्स एंड एनर्जी लि. का गोंडवाना विश्वविद्यालय के साथ समझौता, स्थापित किया जाएगा विश्वविद्यालय प्रौद्योगिकी संस्थान
- गढ़चिरौली में पढ़ने वाले छात्रों को आइटी की शिक्षा दी जाएगी, जिससे स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिले
जमशेदपुर जाने से पहले गढ़चिरौली आए थे जमशेदजी टाटा
वर्ष 1902 में जमशेदजी के पुत्र दोराबजी टाटा को इस क्षेत्र में खनिज खोज के लिए पहला लाइसेंस मिला था। गढ़चिरौली में उत्तम किस्म के लौह अयस्क मिलने के प्रमाण मिले, लेकिन उद्योग के लिहाज से चंद्रपुर जिले (तब गढ़चिरौली चंद्रपुर का ही एक भाग था) तक आवागमन के साधन नहीं थे।
वर्ष 1907 में जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना करने से पहले जमशेदजी टाटा फिर गढ़चिरौली आए थे, लेकिन समस्या हल नहीं हो सकी। यही वजह रही कि जमशेदजी टाटा ने कलकत्ता (अब कोलकाता) के नजदीक झारखंड में इस्पात कारखाने की नींव रखी और जमशेदपुर की स्थापना हुई। अच्छी सड़कें होने के बावजूद आज भी गढ़चिरौली जिला मुख्यालय से लौह अयस्क खदानों के क्षेत्र सुरजागढ़ पहुंचने में करीब चार घंटे लग जाते हैं।

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