NCRB Report: मध्य प्रदेश में 175 नवजातों को यहां-वहां फेंका, देशभर का सबसे खतरनाक आंकड़ा
पूरे देश में बच्चे को सड़क किनारे झाड़ियों या यहां-वहां फेंककने के इस तरह के 818 प्रकरण सामने आए जिनमें 831 नवजातों को मां या अन्य स्वजन ने दिल पर पत्थर रख कर फेंक दिया। इनमें 21 प्रतिशत मध्य प्रदेश के थे। कुछ मामलों में जुड़वां नवजातों को फेंका गया। पिछले चार वर्ष से इस तरह के मामले में मध्य प्रदेश सबसे ऊपर है।

शशिकांत तिवारी, भोपाल। देश में सर्वाधिक शिशु मृत्यु दर का कलंक कई वर्षों से झेल रहे मध्य प्रदेश को वे माताएं भी शर्मसार कर रही हैं, जो अपने नवजात बच्चे को सड़क किनारे झाड़ियों या यहां-वहां फेंककर चली जाती हैं। वर्ष 2022 में ऐसे 174 मामलों में 175 नवजातों को फेंका गया।
पूरे देश में 831 नवजातों को फेंकने का मामला आया सामने
देशभर में यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। पूरे देश में इस तरह के 818 प्रकरण सामने आए, जिनमें 831 नवजातों को मां या अन्य स्वजन ने दिल पर पत्थर रख कर फेंक दिया। इनमें 21 प्रतिशत मध्य प्रदेश के थे। कुछ मामलों में जुड़वां नवजातों को फेंका गया। पिछले चार वर्ष से इस तरह के मामले में मध्य प्रदेश सबसे ऊपर है। यह जानकारी इसी सप्ताह जारी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट में सामने आई है।
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एक मामला ऐसा भी
सतना जिले में नवंबर, 2021 में ममता को झकझोरने वाला मामला सामने आया था। अविवाहित मां ने लोकलाज के डर से जन्म के बाद नवजात को फेंक दिया। अगले दिन बच्चे के पिता को यह जानकारी मिली तो वह गुस्सा हुआ। दोनों ने फिर बच्चे को पाने की कोशिश शुरू कर दी। इस बीच पुलिस ने नवजात को बाल कल्याण समिति को सौंप दिया था। नवजात को फेंकने के चलते दोनों छह माह जेल में रहे। बाद में आठ माह कानूनी लड़ाई लड़ी। डीएनए का मिलान कराया गया। इसके बाद कोर्ट के निर्देश पर इसी वर्ष बच्चे को जैविक माता-पिता को सौंपा गया। इस तरह 14 माह बाद पिता बच्चे को देख पाया।
पिछले चार वर्ष में मध्य प्रदेश और देश के मामले
वर्ष | देश | प्रदेश | कुल में मप्र का प्रतिशत |
2019 | 674 | 187 | 20.9 |
2020 | 747 | 186 | 24.7 |
2021 | 709 | 154 | 24.7 |
2022 | 818 | 174 | 21 |
(स्त्रोत: एनसीआरबी)
कैसे कम होगी इस तरह की घटनाएं?
भोपाल एक्सीलेंस कॉलेज के समाजशास्त्र एवं समाज कार्य विभाग के विभागाध्यक्ष डा. शैलजा दुबे ने कहा कि आधुनिकता और स्वतंत्रता के चलते समाज की संरचना और विवाह संस्था कमजोर पड़ रही है। इस तरह की घटनाएं मानवीय दृष्टि से बेहद गलत हैं। अविवाहित माता को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाए तो इस तरह की घटनाएं कम होंगी। दुनिया में जो भी आता है, उसे जीने का पूरा अधिकार है। ऐसे में माता-पिता को भी यह जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए कि संतान पैदा करने का निर्णय लिया है तो साहस के साथ उसे अपनाएं।
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वहीं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के पूर्व संचालक डा. पंकज शुक्ला ने कहा कि लगभग 15 से 20 वर्ष पहले सरकारी अस्पतालों में ऐसे नवजातों के लिए झूले रखवाए गए थे। झूले अस्पताल में ही ऐसी जगह रखे जाते थे, जहां लोगों की आवाजाही न रहे। धीरे-धीरे यह व्यवस्था बंद हो गई। नवजातों को पालने में रखे जाने से उनका जीवन सुरक्षित रहता है। संक्रमण का खतरा भी कम रहता है। आवश्यकता होने पर तत्काल उपचार शुरू हो जाता है।
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