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बंगाली दुर्गा पूजा पंडालों में इस्तेमाल होने वाला शोलापीठ क्या है? भगवान शंकर की जटा से जन्मे पौधे से है नाता

Published: Fri, 16 Oct 2026 12:54 PM (IST)

बंगाली दुर्गा पूजा पंडालों में शोलापीठ की सजावट एक पारंपरिक लोककला है, जिसे हर्बल आइवरी भी कहते हैं।

दुर्गा पूजा पंडालों में डाकेर साज के लिए इस्तेमाल होता है शोलापीठ (AI Generated Image)

दुर्गा पूजा पंडालों में डाकेर साज के लिए इस्तेमाल होता है शोलापीठ (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बंगाली दुर्गा पूजा पंडालों में ढाक की आवाज, मंत्रों की गूंज के साथ एक और चीज सभी का ध्यान खींचती है। वो है इन पंडालों में इस्तेमाल होने वाली शोलापीठ की सजावट। शोलापीठ बंगाल की पारंपरिक लोककला है, जिसे हर्बल आइवरी या हर्बल हाथीदांत भी कहा जाता है। 

शोलापीठ से बनी ये सजावट सिर्फ पंडालों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं की जाती। इसके पीछे आस्था और परंपरा भी जुड़ी है। आइए जानें बंगाल की लोककला शोलापीठ होती क्या है और इसका इस्तेमाल दुर्गा पूजा पंडालों में क्यों किया जाता है। 

क्या होता है शोलापीठ?

शोला एक एक्वेटिक पौधा है, जो बंगाल, ओडिशा, असम और दक्कन के पठारों के दलदली इलाकों में उगता है। इस पौधे के तने के स्पंज जैसा दूधिया सफेद हिस्सा शोलापीठ कहलाता है। इसी से शिल्पकार शोलापीठ से बनी चीजें बनाते हैं। 

शोलापीठ वजन में बिल्कुल हल्का होता है और अंदर से पोरस होता है। इसलिए पानी पड़ने पर भी ये खराब नहीं होता। दुर्गा पूजा के पंडालों में या शादी जैसे शुभ अवसरों पर इसका इस्तेमाल होता है, क्योंकि माना जाता है कि इसका सफेद रंग इसकी शुद्धता का प्रतिक है। इसी वजह से धार्मिक और शुभ अवसरों पर इसका इस्तेमाल किया जाता है। 

शिव-पार्वती विवाह से जुड़ी है पौराणिक कहानी

शोलापीठ बंगाल की काफी पुरानी लोककला है, जिससे एक पौराणिक कथा भी जुड़ी है। लोक मान्यताओं के मुताबिक, जब भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह होने वाला था, तब विश्वकर्मा जी को एक मुकुट और जयमाला बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। 

हालांकि, विश्वकर्मा जी को धरती पर ऐसी कोई चीज नहीं मिली, जो इतनी पवित्र हो कि जिससे भगवान शिव और माता पार्वती के लिए माला बनाई जा सके। तब भगवान शिव ने अपनी जटा से एक बाल तालाब में गिराया, जिससे शोला का पौधा बना और शिव जी के दूसरे बाल से एक मालाकार बना। 

इस तरह धरती पर शोला का पौधा बना और मालाकार समुदाय का जन्म हुआ। मालाकार पारंपरिक रूप से देवी-देवताओं की मूर्तियों और राजघरानों के लिए शोला के गहने और सजावट की चीजें बनाते आए हैं। 

दुर्गा पूजा का डाकेर साज

दुर्गा पूजा के पंडालों को शोलापीठ से सजाया जाता है और मां की मूर्ति के गहने और मुकुट बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है। शोला से बने इन गहनों और सजावट को डाकेर साज कहा जाता है। शोलापीठ धार्मिक रूप से तो पवित्र माना ही जाता है। साथ ही, ये एनवायरनमेंट फ्रेंडली भी होता है। इसलिए दुर्गा पूजा पंडालों में इनका इस्तेमाल आस्था के साथ-साथ पर्यावरण के भी अनुकूल होता है।