दुर्गापूजा पर आस्था, कला और संस्कृति के रंगों में सजा कोलकाता, देखिए शानदार तस्वीरें
कोलकाता में दुर्गापूजा आस्था, कला और संस्कृति का अनूठा संगम है, जहां विभिन्न पंडालों ने पर्यावरण संरक्षण, प्राचीन वास्तुकला, आदिवासी कला और सामाजिक संदेशों को जीवंत किया है।

आस्था, कला और संस्कृति के रंगों में सजा कोलकाता (जागरण)
HighLights
राजडांगा पंडाल ने पर्यावरण संरक्षण का गंभीर संदेश दिया।
मोहम्मद अली पार्क में प्राचीन राम मंदिर की भव्य वास्तुकला।
सिंघी पार्क में छत्तीसगढ़ की बस्तर आदिवासी कला की झलक।
इंद्रजीत सिंह, कोलकाता। बंगाल में दुर्गापूजा सिर्फ उत्सव नहीं, एक जीवंत परंपरा है। कोलकाता में तो दुर्गापूजा पर कला, शिल्प, कल्पनाशीलता और सामूहिक सृजन का महाकुंभ लगता है। कहीं सदियों पुरानी परंपराएं भव्यता के साथ जीवंत होती हैं, तो कहीं समकालीन विचारों और अनूठी थीम के जरिये समाज, इतिहास और संस्कृति की विविध तस्वीरें उभरती हैं।
मिट्टी, बांस, कपड़े और रंगों से आकार लेते पंडाल हों या शिल्पकारों के हुनर से सजीं देवी दुर्गा की प्रतिमाएं, हर रचना अपने भीतर एक कहानी समेटे है। यही वह शहर है, जहां छोटी गलियों से लेकर बड़ी सड़कों तक उत्सवधर्मिता का विस्तार होता है और स्थानीय कला-संस्कृति वैश्विक आकर्षण बन जाती है।
कोलकाता की दुर्गापूजा की भव्यता उसके विशाल पंडालों में ही नहीं, बल्कि उन पारंपरिक मूल्यों, लोककलाओं, सामुदायिक सहभागिता और रचनात्मक ऊर्जा में भी बसती है, जो पीढ़ियों से इस उत्सव को विशिष्ट पहचान देते आए हैं।
आइए, देखते हैं कोलकाता की दुर्गापूजा के विविध रंग, अनूठी थीम, कलात्मक पंडाल और आस्था से जुड़ी वे परंपराएं, जो इसे दुनिया के सबसे विशिष्ट सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल करती हैं। कोलकाता से विशाल श्रेष्ठ व मिलन कुमार शुक्ला की रिपोर्ट।
मशीनों की दुनिया में प्रकृति के विनाश की चेतावनी देता राजडांगा का पंडाल
राजडांगा नबो उदय संघ ने इस बार पर्यावरण संरक्षण का गंभीर संदेश दिया है। ‘शोधन’ थीम पर आधारित पंडाल में ऐसी भविष्य की दुनिया की कल्पना की गई है, जहां मनुष्य की बढ़ती मशीनों पर निर्भरता और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने जीवन का संतुलन बिगाड़ दिया है।
कलाकार देबाशीष बारुई की परिकल्पना पर आधारित यह प्रस्तुति दिखाती है कि विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की अनदेखी का परिणाम कितना भयावह हो सकता है। प्राकृतिक संसाधनों के खत्म होने और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने के बाद मनुष्य आक्सीजन जैसी बुनियादी जरूरत के लिए भी कृत्रिम विकल्प तलाशने को मजबूर हो जाता है।
‘शोधन’ का अर्थ शुद्धिकरण और नवीनीकरण है। इसी विचार के माध्यम से पंडाल लोगों को सोचने पर मजबूर करता है कि यदि प्रकृति का लगातार दोहन होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कैसा होगा। यह थीम केवल कलात्मक सजावट तक सीमित नहीं है, बल्कि तेजी से बढ़ते शहरीकरण, मशीनों पर बढ़ती निर्भरता और पर्यावरण के प्रति मानवीय जिम्मेदारी पर भी सवाल उठाती है।
राजडांगा का पंडाल दुर्गोत्सव के उत्सवी माहौल में प्रकृति को बचाने और विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है।
प्राचीन राम मंदिर की थीम पर सजा मोहम्मद अली पार्क का पंडाल
मोहम्मद अली पार्क यूथ एसोसिएशन ने अपने 58वें वर्ष में ‘प्राचीन राम मंदिर’ की थीम पर भव्य पंडाल तैयार किया है। यहां प्राचीन मंदिरों की वास्तुकला, रामायण की प्रमुख घटनाओं और पारंपरिक मूर्तिकला को दर्शाया गया है। कलाकार चिरंजीब की देखरेख में बांस और प्लाईवुड से बने पंडाल में भगवान श्रीराम के जीवन प्रसंगों को कलात्मक रूप दिया गया है।
मूर्तिकार कुश बेरा ने मां दुर्गा की प्रतिमा पारंपरिक शैली में तैयार की है। पत्थर जैसी रंगत और संगमरमर जैसी फिनिश प्रतिमा को प्राचीन मंदिरों की मूर्तियों जैसा स्वरूप देती है। गणेश मंडल की विशेष रोशनी पंडाल की सजावट को और आकर्षक बनाती है।
एसोसिएशन के महासचिव सुरेंद्र कुमार शर्मा के अनुसार, इस थीम के जरिए भारतीय वास्तुकला, सांस्कृतिक परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।
तेलीपुकुर युवा संघ के पंडाल में तालाबों का संसार
तेलीपुकुर युवा संघ ने ‘एक तालाब, ढेर सारा प्यार’ की अवधारणा के जरिए लोगों का ध्यान बंगाल के पारंपरिक जलस्रोतों की ओर खींचा है। यह थीम तालाब को केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि स्थानीय समुदाय की यादों, जीवनशैली और भावनात्मक संबंधों के केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है।
एक समय था, जब बंगाल के गांवों और बस्तियों में तालाब केवल प्राकृतिक जलस्रोत नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी, सामाजिक मेलजोल और स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा थे।
तालाबों के आसपास लोगों की दिनचर्या चलती थी और कई पीढ़ियों की यादें उनसे जुड़ी रहती थीं, लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, जमीन की बढ़ती मांग और निर्माण गतिविधियों के बीच अनेक जलाशयों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। जिन जगहों पर कभी पानी और हरियाली दिखाई देती थी, वहां अब कंक्रीट की इमारतें नजर आती हैं।
थीम इसी बदलाव पर सवाल उठाती है। क्या विकास की दौड़ में शहर अपने उन प्राकृतिक संसाधनों को खोता जा रहा है, जिनके बिना उसका पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना मुश्किल होगा?
आदि बालीगंज करा रहा गुफाओं से महलों तक मानव सभ्यता का सफर
कोलकाता की दुर्गापूजा केवल आदिशक्ति की आराधना नहीं, बल्कि इतिहास, कला और सामूहिक स्मृतियों को सहेजने का भी अवसर है। आदि बालीगंज सार्वजनिन दुर्गापूजा परिषद इसी विरासत को खास अंदाज में सामने ला रहा है। करीब 100 वर्षों की परंपरा को समेटे इस पूजा की इस बार की थीम‘भीत’ (नींव) है।
इस अवधारणा के जरिए पंडाल में मानव सभ्यता के विकास की कहानी प्रस्तुत की गई है। आदिम गुफाओं में रहने वाले मनुष्य से लेकर आलीशान महलों तक के सफर को कलात्मक रूप में उकेरने की कोशिश की गई है।
आज ऊंची इमारतें, विलासती भवन और आधुनिक स्थापत्य मानव विकास की पहचान हैं, लेकिन इस यात्रा की शुरुआत बेहद साधारण आवासों से हुई थी। कभी मनुष्य खानाबदोश जीवन जीता था। बाद में उसने गुफाओं को अपना आश्रय बनाया।
गुफाओं की दीवारें केवल सुरक्षा का माध्यम नहीं थीं, बल्कि उन पर उकेरी गई आकृतियां आदिम मनुष्य की कलात्मक अभिव्यक्ति की गवाही भी देती हैं।
‘भीत’ की अवधारणा इसी शुरुआती दौर को आधुनिक सभ्यता से जोड़ती है। यह याद दिलाती है कि आज की भव्य संरचनाओं के पीछे मानव अनुभव, जरूरतों और रचनात्मकता का लंबा इतिहास है। इस वर्ष यहां देवी दुर्गा की प्रतिमा 25 फुट ऊंची है, जो आकर्षण का एक और प्रमुख केंद्र है।
सिंघी पार्क में झलक रही छत्तीसगढ़ की आदिवासी कला-संस्कृति
सिंघी पार्क सार्वजनीन दुर्गापूजा समिति के पंडाल में इस बार छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की समृद्ध कला-संस्कृति की अभिनव झलक देखने को मिल रही है। 85वें वर्ष की प्रस्तुति को ‘बस्तरीय’ नाम दिया गया है। पंडाल में बस्तर की आदिवासी कला व हस्तशिल्प के साथ वहां की पारंपरिक जीवनशैली व प्रकृति के गहरे संबंध को रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
सिंघी पार्क की पूजा को-आर्डिनेटर सौमा मजूमदार ने बताया-कला केवल सुंदरता की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि किसी समाज के इतिहास, संस्कृति, विश्वास और जीवनदर्शन का प्रतिबिंब भी होती है। इसी सोच के साथ बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को मूल विषय वस्तु बनाया गया है।
बस्तर के आदिवासी समुदायों ने अपनी विशिष्ट कला शैलियों, हस्तशिल्प और प्रकृति आधारित जीवनशैली के माध्यम से अनूठी सांस्कृतिक पहचान कायम की है। हमने अपने पंडाल के माध्यम से उसी विरासत को सम्मान देने की कोशिश की है। प्रवेश द्वार से लेकर मुख्य पंडाल, रोशनी, शिल्प और सजावट तक हर स्तर पर ऐसे डिजाइन और प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है, जो बस्तर की विशिष्ट कला भाषा को जीवंत करेंगे।
धातु की मूर्तिकला जैसी आकृतियों और अलंकरणों के माध्यम से पारंपरिक कला को आधुनिक प्रस्तुति से जोड़ा गया है। पंडाल में मिट्टी की प्राकृतिक आभा बनाए रखने के लिए प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया गया है।
पर्यावरण अनुकूल सामग्री के जरिए बस्तर के प्राकृतिक परिवेश का प्रभाव पैदा करने की कोशिश की गई है। पंडाल के ऊपरी हिस्से में बस्तर के एक गांव की बाहरी रूपरेखा उकेरी गई है।
टाला प्रत्यय बता रहा मां तक पहुंचने का मार्ग
टाला प्रत्यय ने ‘बियोजन’ को थीम चुना है। बांग्ला शब्द ‘बियोजन’ का सामान्य अर्थ अलगाव या पृथक्करण है। इस आयोजन में यह शब्द सांसारिक मोह-माया से अलग होकर आध्यात्मिक अनुभूति की ओर बढ़ने के विचार से जुड़ता है।
टाला प्रत्यय की इस वर्ष की आध्यात्मिक अवधारणा में देवी दुर्गा तक पहुंचने से पहले सांसारिक मोह-माया को त्यागने का विचार केंद्रीय है। यह भाव दुर्गा पूजा के धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ में विशेष अर्थ रखता है।
पर्यावरण से खिलवाड़ रोकने का संदेश देता बोसपुकुर का पंडाल
बोसपुकुर शीतला मंदिर दुर्गोत्सव कमेटी ने अपने 77वें वर्ष में पर्यावरण से हो रहे खिलवाड़ को दिखाते हुए इसे रोकने का संदेश दिया है। पूजा कमेटी के सचिव काजल सरकार ने बताया-‘हमारी इस वर्ष की प्रस्तुति मानव सभ्यता के सामने खड़ा एक गंभीर सवाल है-क्या विकास की कीमत प्रकृति का विनाश हो सकती है?
इस थीम के जरिए यह बताने का प्रयास किया गया है कि प्रकृति पर अत्याचार की एक सीमा है। जब वह सीमा पार होती है तो प्रकृति अपने तरीके से जवाब देती है। मनुष्य ने सभ्यता के विकास के साथ प्रकृति से बहुत कुछ लिया। भोजन, पानी, हवा, जमीन और खनिज-हर जरूरत के लिए प्रकृति पर निर्भर रहा लेकिन जरुरतें धीरे-धीरे लालच में बदल गईं।
विकास की गति बढ़ाने के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ किया गया। प्रकृति लंबे समय तक इसे सहती रही। इंसान को लगने लगा कि वह प्रकृति को अपने नियंत्रण में ले चुका है। हमारी थीम इस भ्रम को तोड़ेगी।
दमदम तरुण दल बता रहा जुड़ाव की ताकत
दमदम तरुण दल ने अपने 49 वर्ष में जुड़ाव की ताकत को दर्शाया है। इस वर्ष की थीम ‘जोट’ (जुड़ाव) है, जिसे आर्टिस्ट पुर्णेंदु दे ने मूर्त रूप दिया है। पूजा कमेटी के सहायक सचिव लोकनाथ साहा ने बताया कि कार्बन, फास्फोरस और नाइट्रोजन जैसे तत्वों के मेल से डीएनए बना, डीएनए से कोशिकाएं बनीं और कोशिकाओं के एक साथ आने से मानव शरीर का निर्माण हुआ।
प्रकृति की यह प्रक्रिया बताती है कि अलग-अलग अस्तित्व जब एक सूत्र में बंधते हैं, तभी बड़ी रचना आकार लेती है। इसी तरह व्यक्ति परिवार से जुड़ा, परिवार समुदाय से और समुदाय समाज से। जो काम अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता, उसे सामूहिक प्रयास संभव बना देता है। हमारी थीम इसी विचार को रेखांकित करती है कि साथ होने में केवल संख्या की ताकत नहीं, बल्कि सृजन की क्षमता भी छिपी है।
ध्वनियां मिलकर शब्द बनाती हैं और शब्द भाषा का रूप लेते हैं। रेखाएं जुड़कर चित्र बनाती हैं, सुर मिलकर राग रचते हैं और अलग-अलग रंग मिलकर दुनिया को रंगीन बनाते हैं यानी सृजन की पहली शर्त ही जुड़ाव है।
चोरबगान सार्वजनीन के पंडाल में मिलेगा सुकून
अपने 91वें वर्ष में चोरबगान सार्वजनीन दुर्गोत्सव समिति ने बाहरी तड़क-भड़क को नहीं, बल्कि अंदर के सुकून को अपना विषय बनाया है। इस साल उनकी थीम है-बीयोंड साउंड (आवाज से आगे)।
पंडाल का ढांचा और उसमें इस्तेमाल किया गया मटीरियल इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे ध्वनि तरंगों को सोख लेते हैं। जैसे-जैसे आप पंडाल के भीतर बढ़ते हैं, बैकग्राउंड में चल रहा सूक्ष्म संगीत और प्रकाश की धीमी किरणें मिलकर एक अलौकिक दुनिया का निर्माण करती हैं। यहां 'मौन' का मतलब सन्नाटा नहीं, बल्कि वह गहरा संवाद है जो एक भक्त का सीधे देवी दुर्गा की दिव्य चेतना से होता है।
चोरबगान ने एक खूबसूरत संतुलन साधा है। पंडाल भले ही समकालीन कला का बेजोड़ नमूना हो, लेकिन देवी दुर्गा की प्रतिमा अत्यंत सौम्य, पारंपरिक और वात्सल्य से भरी हुई है।
चलताबगान के पंडाल में दिख रही 'गोदना' की कहानी
मानिकतल्ला चलताबगान लोहापट्टी दुर्गापूजा कमेटी के पंडाल में इस बार शरीर पर बने एक छोटे से निशान के पीछे छिपी सदियों पुरानी कहानी दिख रही है। पूजा कमेटी से जुड़े अशोक जायसवाल ने बताया कि इस बार हमारी पूजा की थीम निशान है। इसके जरिए हमने गोदना (टैटू) की बहुरंगी परंपरा को पेश किया है।
गोदना केवल शरीर पर उकेरी गई आकृति नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था, पहचान, सुरक्षा, सामाजिक संघर्ष और लोक संस्कृति का निशान है। आदिवासी व ग्रामीण समुदायों में इसका इतिहास काफी पुराना है। जब श्रृंगार के लिए कपड़े या गहने हर किसी की पहुंच में नहीं थे, तब शरीर पर उकेरा गया निशान ही उनका स्थायी आभूषण बनता था।
झारखंड के लातेहार जिले के चिपाधार गांव की 65 वर्षीया गुहामनी देवी ‘जहर उल्की’ की गोदने की कला को भी दर्शाया गया है। ‘जहर उल्की’ को लेकर मान्यता है कि यह गले के दर्द, माइग्रेन, घुटने के दर्द और दूसरी तकलीफों में राहत देता है।
दक्षिण भारत में प्रचलित कुछ विशेष गोदना आकृतियों और उनसे जुड़ीं जादुई तथा लोक मान्यताओं को भी पंडाल में बयां की गईं कहानियों में जगह दी गई है।
हिंदुस्तान पार्क दिखा रहा माचिस की रोशनी के पीछे छिपा खौफनाक सच
हिंदुस्तान पार्क सार्वजनीन दुर्गोत्सव कमेटी ने अपनी 96वें वर्ष की पूजा प्रस्तुति में माचिस कारखानों में बाल श्रम, जहरीले रसायनों के बीच बच्चों का शोषण, उनके स्वास्थ्य पर पड़ा भयावह असर और फिर उस अमानवीय व्यवस्था से मुक्ति की यात्रा दिखाई है।
पंडाल के जरिए बताया गया है कि जिस छोटी सी माचिस की तीली ने घरों और कारखानों को रोशन किया, उसके पीछे कभी हजारों बच्चों का बचपन, स्वास्थ्य और भविष्य अंधकार में धकेल दिया गया था।
कमेटी की सचिव सुतपा दास ने बताया कि करीब एक शताब्दी पहले माचिस कारखानों में बड़ी संख्या में बच्चे बेहद कठिन परिस्थितियों में काम करते थे। माचिस बनाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले जहरीले फास्फोरस के संपर्क में आने से श्रमिकों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
कारखानों के बंद और प्रदूषित वातावरण में लंबे समय तक काम करने वाले बच्चों के लिए यह खतरा और भी गंभीर था। पंडाल में इन्हीं परिस्थितियों को मानवीय संवेदना के साथ बेहद प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
एकडालिया एवरग्रीन में दिख रहा सोमनाथ मंदिर का वैभव
एकडालिया एवरग्रीन ने इस बार अपने पंडाल के जरिये गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की आस्था और स्थापत्य को कोलकाता के दुर्गोत्सव से जोड़ा है।
पूजा कमेटी के महासचिव स्वपन महापात्र ने बताया कि सोमनाथ मंदिर की प्रतिकृति का निर्माण प्लाईवुड से किया गया है। इस बार यहां आलोक सज्जा में भी नया प्रयोग देखने को मिला है। पहली बार यहां आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआइ) आधारित रोशनी की व्यवस्था की जा रही है।
इसके माध्यम से पंडाल और उसके आसपास अलग-अलग दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। पूजा आयोजकों ने बताया कि सोमनाथ केवल एक प्रसिद्ध मंदिर नहीं, बल्कि हिंदू धार्मिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है।

