दुर्गा पूजा में ढोल-नगाड़े नहीं, सिर्फ 'ढाक' की आवाज ही क्यों मानी जाती है सबसे खास? जान लें वजह
दुर्गा पूजा में 'ढाक' की गूंज का विशेष महत्व है, जो इसे अन्य वाद्ययंत्रों से अलग बनाता है।

ढाक की थाप बिना सूनी है दुर्गा पूजा (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का जिक्र आते ही मन में भव्य पंडाल, मां दुर्गा की मनमोहक प्रतिमा और एक खास वाद्ययंत्र की गूंज उभर आती है। भारत में यूं तो हर त्योहार और जश्न ढोल-नगाड़ों के बिना अधूरा माना जाता है, लेकिन दुर्गा पूजा की बात बिल्कुल अलग है।
जी हां, इस साल यह महापर्व 16 से 21 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। क्या आप जानते हैं कि इसमें ढोल की थाप नहीं, बल्कि 'ढाक' की गूंज ही क्यों सबसे खास मानी जाती है? यह एक ऐसी ध्वनि है, जिसे सुनते ही भक्तों को यह अहसास हो जाता है कि मां दुर्गा उनके बीच पधार चुकी हैं। आइए, इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं इसके बारे में।

(Image Source: AI-Generated)
मां दुर्गा के आह्वान का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ढाक की गूंज सिर्फ संगीत नहीं है, बल्कि यह देवी को धरती पर बुलाने का एक पवित्र माध्यम है। दुर्गा पूजा की शुरुआत 'बोधन' यानी देवी को जगाने की रस्म से होती है और यह रस्म ढाक की तेज और ऊर्जावान थाप के बिना पूरी नहीं हो सकती। ऐसा माना जाता है कि ढाक की गूंज से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और यह आवाज सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। इसकी तेज गूंज से पंडाल और आसपास के माहौल से नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।
धुनुची नाच और ढाक का अटूट रिश्ता
दुर्गा पूजा में महाष्टमी और महानवमी की शाम को होने वाली आरती और धुनुची नाच पूरी तरह ढाक की लय पर ही टिका होता है। हाथ में जलती हुई मिट्टी की धुनुची और कानों में ढाक की गूंज, यह माहौल किसी को भी भक्ति में झूमने पर मजबूर कर देता है। जैसे-जैसे ढाक बजाने वाले ढाकी अपनी लय तेज करते हैं, वैसे-वैसे धुनुची नाचने वालों का उत्साह और फुर्ती भी बढ़ती जाती है। यह धुन भक्तों को सीधे ईश्वर से जोड़ने का काम करती है।
ढोल से कैसे अलग है ढाक?
ढाक दिखने में ढोल जैसा जरूर लग सकता है, लेकिन इसका आकार ढोल से काफी बड़ा होता है। इसे हाथों की बजाय दो पतली लकड़ियों से बजाया जाता है, जिससे इसकी आवाज बहुत तीखी, गहरी और मीलों दूर तक जाने वाली होती है। ढाक को अक्सर सुंदर सफेद पंखों से सजाया जाता है और इसे बजाने वाले खास तरह के पारंपरिक कपड़े पहनकर एक खास अंदाज में नाचते हुए इसे बजाते हैं।
भावनाओं और परंपरा की है धड़कन
ढाक केवल चमड़े और लकड़ी से बना एक वाद्ययंत्र नहीं है, यह दुर्गा पूजा की असली धड़कन है। यह बंगाल की सदियों पुरानी संस्कृति का वह हिस्सा है जो अब पूरे देश के दुर्गा पूजा पंडालों की पहचान बन चुका है। जब ढाकी पूरी शिद्दत से अपनी छड़ियां ढाक पर मारते हैं, तो वह आवाज सीधे भक्तों के दिल में उतर जाती है और यह संदेश देती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत का महापर्व शुरू हो चुका है।
