दुर्गा पूजा में पंडाल लगाने का चलन कहां से आया? 12 दोस्तों के चंदे से जुड़ा है इसका दिलचस्प इतिहास
1790 में गुप्तिपारा में 12 दोस्तों ने चंदा जुटाकर पहली 'बारोवारी' पूजा आयोजित की, जिसने इसे जन-जन तक पहुंचाया।

जमींदार की हवेली के आंगन से शुरू हुई पंडाल की परंपरा (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। आज दुर्गा पूजा में नई-नई थीम पर आधारित पंडाल देखने के लिए परिवार और दोस्तों के साथ निकलना त्योहारों में एक ट्रेंड बन गया है। पर एक समय ऐसा था जब दुर्गा पूजा का मतलब बड़े-बड़े पंडाल नहीं, घरों में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान थे।
ऐसे में सवाल है कि आखिर कैसे कोलकाता में दुर्गा पूजा में पंडाल लगने की यह अनोखी परंपरा शुरू हुई? ऐसा क्या बदला जो दुर्गा पूजा में पंडाल घूमना ही उत्सव का एक तरीका बन गया? आइए कोलकाता की गलियों से निकली इसकी दिलचस्प कहानी पर नजर डालते हैं।
जमींदार की हवेली के आंगन से शुरू हुई पंडाल की परंपरा
आपको ऐसा लगता होगा कि दुर्गा पूजा में पंडाल लगने की शुरुआत कोलकाता में किसी मंदिर से हुई होगी, लेकिन इसका इतिहास जमींदार की हवेली में बने आंगन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि कोलकाता में पहली बार बड़े स्तर पर दुर्गा पूजा का आयोजन कराने का श्रेय ताहेरपुर के जमींदार राजा कांगसानारायण को जाता है। यह बात साल 1606 की है, जब जमींदार ने करोड़ों रुपए खर्च करके अपने महल के आंगन में भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन किया था।
पहले दुर्गा पूजा रईसों और कुलीन परिवारों तक थी सीमित
कहते हैं कि इसके बाद 17वीं और 18वीं शताब्दी में समृद्ध बंगाली कुलीन वर्गों- जैसे पाथुरियाघाट के मल्लिक परिवार और जोरासांको के टैगोर परिवार ने ही अपने शाही महलों में दुर्गा पूजा का आयोजन करना शुरू कर दिया था। इसमें केवल आमंत्रित लोगों को ही आने की अनुमति होती थी।
सार्बोजनिन दुर्गा पूजा बंगाल के इतिहास का महवपूर्ण पहलू
दुर्गा पूजा के निजी से सावर्जनिक यानी सार्बोजनिन होने का बंगाल के औपनिवेशिक इतिहास से गहरा नाता है। इसकी उत्पत्ति साल 1790 में देखी जाती है, जब हुगली जिले में स्थित गुप्तिपारा में पहली बार सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया था।
उस दौर में 12 ब्राह्मण दोस्तों ने चन्दा जुटाकर इसकी भव्य तैयारी की थी, क्योंकि अकेले किसी एक का इसका सारा खर्चा उठाना संभव नहीं था। यही वजह है कि इसे ‘बारोवारी’ दुर्गा पूजा यानी 12 लोगों द्वारा आयोजित पूजा नाम भी दिया गया। फिर देखते ही देखते 20वीं सदी तक बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में दुर्गा पूजा के लिए समितियां बननी शुरू हो गईं।
बंगाल विभाजन के बाद कोलकाता बना दुर्गा पूजा का केंद्र
स्वतंत्रता आंदोलन के समय मां दुर्गा धार्मिक श्रद्धा तक सीमित नहीं रह गई थीं। अब देवी मांआजादी के आंदोलन में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक बन गईं थीं। फिर साल 1947 में देश की आजादी के समय एक नया मोड़ आया, दुर्गा मां को पंडालों में भारत माता की तरह दिखाया जाने लगा। रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम जैसे कवियों ने भी शक्ति को आजादी संघर्ष से जोड़कर अनेकों कविताएं लिखीं।
कहा जाता है कि पूर्वी बंगाल के विभाजन के बाद लाखों हिंदू शरणार्थी ढाका, सिलहट, बारीसाल और चटगांव से पश्चिम बंगाल आ गए। वो यहां अपने साथ संगीत, खानपान और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी परंपरा भी साथ लेकर आए थे। इस तरह कोलकाता शहर एक नए रंग में ढल गया और सामूहिक दुर्गा पूजा पंडाल लगाने का चलन एक परंपरा ही बन गई।
