पूजा-पाठ ही नहीं, भारतीय संस्कृति का असली आधार रही हैं 'व्रत कथाएं'; आज की पीढ़ी को है सबसे ज्यादा जरूरत
भारतीय संस्कृति में व्रत कथाएं जीवन दर्शन और मानवीय मूल्यों का आधार हैं, जो हमारी अद्वितीय परंपराओं को सहेजती हैं।

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माालिनी अवस्थी, लखनऊ। भारत में वर्ष पर्यन्त कोई न कोई व्रत-त्योहार का उत्सव मनाये जाने की समृद्ध परम्परा है। हर व्रत का सबसे रोचक पक्ष होता है व्रत की कथाएं। ये कथाएं ही उनकी आत्मा हैं। भारतीय जीवन दर्शन को, भारतीय जीवन मूल्य को, हमारी अद्वितीय संस्कृति को इन कथाओं ने ही सम्हाल रखा हैं। इन कथाओं में पूरा जीवन दर्शन है और इनको कहने वाली हमारी मां और दादी नानी ही हमारी प्रथम गुरु हैं। सकट हो या भाई दूज, गणेश चतुर्थी हो या हरछठ, दीवाली हो या अहोई अष्टमी, हाथ में अक्षत लेकर मां जब कहती कि अब कथा सुनो तो वास्तव में वे गुरु के समान हमे दीक्षित कर रही होती थीं। लोककथाओं में छुपी शिक्षा से हमे गढ़ रही होती थीं।
इन कथाओं में मानवीय संवेदनाएं थीं। बुद्धि चातुर्य सीखने का संदेश था। जीवन के दुख सुख में घुली मानवीय दुर्बलताओं क्रोध से दूर रहने की नसीहतें थीं।
हम भी हाथ में अक्षत लेकर इन कथाओं को बड़े चाव से सुनते, कथा के प्रवाह में हमे पात्र जीवंत दिखते। हम कथा के ऐसे साक्षी बन जाते मानो सब सामने ही घटित हो रहा हो। वास्तव में कथा कहने का अद्भुत कौशल था हमारी पुरखिनों के पास।
अभी बीती हरितालिका व्रत कथा और और गणेश चतुर्थी के दिन कही जाए कथाओं से पर्व की अनगिनत कथाएं याद आ गई। आइए आज व्रत में कही जाने वाली कथाओं का पुनर्पाठ करें-
सबसे पहले विघ्नविनाशक गणेश जी की कथा कही जाती है। एक बार महादेव और पार्वती जी के बीच संवाद हुआ कि उनके दोनों पुत्रों में कौन अधिक बुद्धिमान है। महादेव ने कहा, अभी दोनों को बुलाकर परीक्षा लेते हैं। कार्तिकेय और गणेश जी दोनों उपस्थित हो गए। भगवान शिव ने कहा, जाओ पृथ्वी की परिक्रमा करके आओ। जो सबसे पहले परिक्रमा कर के आयेगा, वही अधिक बुद्धिमान है। कार्तिकेय अपने मयूर वाहन पर सवार हो चल दिए संसार की परिक्रमा के लिए। गणेश जी ने पार्वती महादेव दोनों को एक साथ खड़ा कर दोनों की सात बार परिक्रमा कर डाली। थोड़ी देर में कार्तिकेय परिक्रमा कर लौट आए और गणेश जी को वहीं खड़ा देखकर हँसे। अपने पिता से बोले, मैंने एक घट में परिक्रमा कर डाली, मैं विजयी हूं। भगवान शिव ने गणेश जी की ओर देखा। गणेश जी ने कहा, संतान के लिए माता पिता ही संसार है इसलिए मैने आप दोनों की परिक्रमा कर आशीर्वाद लिया।
पार्वती और शिव ने एक साथ कहा- गणेश सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि वे सबसे बुद्धिमान हैं इस तरह गणेश जी की महत्ता शिव शक्ति ने स्थापित की। कथा में सार है माता पिता की भक्ति का। संस्कार का और बुद्धि चातुर्य का।
धनतेरस में कही जाने वाली एक कथा में साथ रहनेवाली देवरानी-जेठानी के परस्पर संबंध की कथा है। एक सरल है, निर्धन है और दूसरी धनी और ईर्ष्यालु। कथा में लक्ष्मी जी रात में दरिद्र बुढ़िया का वेश धारण करके दोनों की परीक्षा लेने आती हैं। सरला जेठानी द्वार खोल कर सत्कार करती है जबकि अहंकारी देवरानी द्वार नहीं खोलती। बुढ़िया जेठानी की सेवा से प्रसन्न हो अपने असली रूप में आ जाती है और स्वर्ण मुद्राएं आशीर्वाद के रूप में दे जाती है। यह देख देवरानी पछताती है और स्वर्ण के लोभ में अगले वर्ष की प्रतीक्षा करती है। लक्ष्मी जी पुनः आती हैं, इस बार कोढ़न के भेष में। देवरानी दुत्कार देती है। लक्ष्मी जी क्रोधित होकर उसे दंड देती हैं। तभी जेठानी क्षमा मांगकर देवरानी को श्राप से मुक्त कराती है। लक्ष्मी जी दोनों को आशीष दे अन्तर्धान हो जाती हैं।
इसमें सन्देश है अतिथि देवो भव! अतिथि किसी भी रूप में आए वह भगवान का ही रूप है। दूसरा, सेवा निर्मल मन से करनी चाहिए, कुछ पाने की लालसा से नहीं और तीसरी, घर में एकता के लिए प्रेम और क्षमा भाव होना चाहिए, यहां अहंकार का स्थान नहीं।
भाईदूज में एक कथा कही जाती है जिसमें तीन पात्र हैं भाई बहन और बहनोई। किसी कारण से जीजा साले में झगड़ा हो जाता है। भाई दूज का दिन आता है। बहनोई घर के द्वार पर बैठ जाता है कि अब भाई घर में प्रवेश नहीं कर सकेगा। इधर बहन भाई का रास्ता देख रही है, और भाई बहन से तिलक लगाने के लिए आतुर है और दरवाजे पर बहनोई को देख कुत्तों का रूप धर घर के भीतर पहुंच जाता है। दुखी बहन पूजा की चौक के लिए हल्दी चावल यानि अईपन (ऐपण) पीस रही है तभी कुत्ता सिल के पास आकर बैठ जाता है। दुखी बहन उसे भगाने के लिए जैसे ही हाथ उठाती है, हाथ में लगा अईपन सीधे कुत्ते के सिर पर लगता है, टीका लगते ही भाई अपने मूल रूप में आ जाता है। बहनोई जब यह चमत्कार देखते हैं तो उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है, भाई बहन का प्रेम समझ में आता है, वो आगे बढ़कर साले को गले लगा लेते हैं।
कथा के अंत में मां कहती थी जैसे उन भाई बहन का प्रेम बना रहा वैसे ही सभी भाई बहन का बना रहे। जैसे उनके दिन बहुरे वैसे सबके दिन बहुरें।
हर कथा में रिश्तों का ताना-बाना है। सास-बहू, देवरानी-जेठानी, भाई-बहन के झगड़े और फिर मेल - ये सभी कथाओं में आता है। और अंत में हमेशा यही सीख मिलती है - क्षमा और धीरज से बड़ा कोई व्रत नहीं। इन कथाओं में स्त्री सशक्तिकरण के अद्भुत प्रसंग हैं। हरतालिका तीज में पार्वती ने घोर तप करके शिव जी को पाया। सीख - अपने प्रेम और लक्ष्य के लिए अडिग तपस्या करनी पड़ती है। कोई पिता, कोई समाज तुम्हें रोक नहीं सकता, यदि तुम्हारा संकल्प सच्चा है। वट सावित्री में सावित्री ने यमराज से पति के प्राण वापस छीन लिए। यह कथा कहती है कि प्रेम में इतनी शक्ति है कि वो काल को भी हरा दे।करवा चौथ की वीरवती की कथा सिखाती है कि किसी के छल में मत आओ, अपने विवेक से काम लो। ये कथाएँ हमें बताती हैं कि भारतीय संस्कृति में स्त्री संकल्प की प्रतिमूर्ति है।
इन कथाओं में प्रकृति से जुड़ने की सीख है। हर व्रत में किसी न किसी पेड़, नदी या जीव की पूजा है।
बरगद पीपल तुलसी नीम आम जैसे वृक्षों का कथाओं में आने का सन्देश है। पेड़ ही हमारे प्राणों का रक्षक है, उसे पूजो, काटो मत। नाग पंचमी में नाग की कथाएं सुनाई जाती हैं जिनसे सीख मिलती है कि सबसे विषैले जीव में भी देवता देखो, प्रकृति का संतुलन मत बिगाड़ो। छठ पर्व में में सूर्य और जल की आराधना का सन्देश है। जो बात किताब नहीं सिखा पाती, वो एक कथा सिखा देती है। व्रत की कथाएँ असल में मन का विज्ञान हैं।
जब परिवार पूरे दिन भूखा-प्यासा रहकर कथा सुनता है, तो उसका मन एक जगह केंद्रित होता है। दूसरे, हर कथा सुखांत को प्राप्त होती है , इन्हें सुनकर मन में धीरज और विश्वास जागता है कि सब ठीक हो जायेगा।
ये कथाएं जीवन के विश्वविद्यालय की तरह हैं। पहले के जमाने में जब टीवी सिनेमा फोन नहीं थे तो पूरा गांव एक साथ इन कथाओं को सुन कर प्रसन्न भी होता और सीखता भी था। इस बार इन कथाओं को सुने, बच्चों को सुनाएं और इनके श्रवन से भारतीय जीवन दर्शन को आत्मसात करें।
