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गणेशोत्सव में कैसे शुरू हुई ढोल-ताशा बजाने की परंपरा? 1965 में हुए एक विरोध से जुड़ा है नाता

Published: Fri, 18 Sep 2026 05:40 PM (IST)

गणेशोत्सव में ढोल-ताशा बजाने की परंपरा महाराष्ट्र की पहचान बन चुकी है, जिसकी शुरुआत 1965 में पुणे में हुए एक विरोध प्रदर्शन से हुई थी।

गणेशोत्सव में ढोल-ताशा बजाने की परंपरा (AI Generated Image)

गणेशोत्सव में ढोल-ताशा बजाने की परंपरा (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गणेशोत्सव आज पूरे देश में मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र में इस त्योहार की बात ही कुछ और होती है। यहां बप्पा की विदाई ढोल-ताशे की गूंज के साथ होती है। सैकड़ों युवा जब एक साथ ढोल और ताशा बजाते हैं, तो पूरा माहौल उत्साह और ऊर्जा से भर जाता है।

गणेशोत्सव में ढोल-ताशा बजाने की परंपरा कई साल पुरानी है। आज से प्रथा महाराष्ट्र की पहचान बन चुकी है, लेकिन असल में इस परंपरा का नाता एक विद्रोह से जुड़ा हुआ है। आइए गणेशोत्सव में जानें ढोल-ताशा बजाने की परंपरा कैसे शुरू हुई। 

1965 में पुलिस ने लगाई रोक

ढोल-ताशा बजाने की परंपरा 1965 के पुणे से जड़ी है। दरअसल, 1965 में पुणे में दंगे हुए थे, जिसके बाद पुलिस ने गणेशोत्सव पर गाने बजाने पर रोक लगा दी थी। इसके विरोध में ज्ञान प्रबोधिनी के संस्थापक डॉ. अप्पासाहेब पेंडसे ने पुणे की सड़क पर अकेले खड़े होकर ताशा बजाकर अपना विरोध प्रदर्शन किया था। उनका ये विरोध गणेशोत्सव की संस्कृति और गौरव को वापस लौटाने के लिए था। 

अप्पासाहेब के इस विरोध ने पुणे के युवाओं को काफी प्रभावित किया और इसके बाद ज्ञान प्रबोधिनी के छात्रों ने मिलकर पहला ढोल ताशा पथक तैयार किया, जिसमें बहुत ही अनुशासित तरीके से ढोल और ताशा बजाकर गणेशोत्सव मनाया गया। 

महाराष्ट्र का ढोल-ताशा पथक

ढोल-ताशा बजाने से पहले मराठा साम्राज्य की वीरता को याद किया जाता है और छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम के जयकारा लगाया जाता है। ढोल-ताशा बजाना बहुत ही अनुशासित कला है, जिसमें एक पथक में 50 से लेकर 500 तक सदस्य हो सकते हैं। बिना किसी स्वार्थ के महीनों पहले से युवा और महिलाएं इसकी प्रैक्टिस में जुट जाते हैं। 

कॉलेज के छात्र, डॉक्टर, इंजीनियर और हर क्षेत्र के वर्किंग प्रोफेशनल्स हर साल इसमें हिस्सा लेने के लिए महीनों पहले से इसकी प्रैक्टिस में जुट जाते हैं और अपनी पढ़ाई और काम के साथ ढोल-ताशा बजाने की प्रैक्टिस के लिए समय निकालते हैं। 

ढोल और ताशा की आवाज से पूरा माहौल ऊर्जा से भर जाता है और सुनने वाले बप्पा की भक्ति में रम जाते हैं। पारंपरिक कुर्ता-पायजामा पहनकर कमर पर ढोल और ताशा बांधकर आज युवा हर साल गणेशोत्सव पर ढोल-ताशा बजाते हैं और दशकों पुरानी इस परंपरा को निभाते हैं।