हाथों में आग लेकर किया जाता है धुनुची नृत्य, दिलचस्प है जमींदारों के घर से निकलकर पंडालों की शान बनने की कहानी
धुनुची नृत्य बंगाल की लोक संस्कृति का हिस्सा है, जिसे दुर्गा पूजा के खास मौके पर किया जाता है।

बंगाल का धुनुची नृत्य क्यों है खास? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बंगाल की लोक संस्कृति में धुनुची नृत्य का काफी महत्व है। इस नृत्य को मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि दुर्गा पूजा पर मां दुर्गा को खुश करने के लिए किया जाता है। ये नृत्य भक्ति, प्रेम और उल्लास का प्रतीक माना जाता है, लेकिन क्या इस नृत्य की शुरुआत कैसे हुई?
महासप्तमी से महानवमी की आरती के समय ढाक की ताल पर किया जाने वाला ये नृत्य एक ऐसा समां बांधता है कि देखने वाले अपनी नजरें नहीं हटा पाते। आइए जानें कैसे हुई धुनुची नृत्य की शुरुआत और ये क्यों इतना खास माना जाता है।
क्यों किया जाता है धुनुची नृत्य?
ये नृत्य मां दुर्गा की आराधान करने के लिए किया जाता है। बंगाली परंपरा में दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और लोग इसी का उत्सव मनाते हैं। अपनी खुशी और मां के लिए श्रद्धा को जाहिर करने के लिए धुनुची नृत्य किया जाता है।
ये नृत्य काफी एनर्जी से भरपूर होता है, जिसमें धुनुची में नारियल के छिलके, कपूर और लोबान को जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता है और इसे हाथ में लेकर नृत्य किया जाता है। माना जाता है कि धुनुची से निकलने वाला ये धुंआ नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करता है और पूरे वातावरण को पवित्र कर देता है।
कैसे हुई धुनुची नृत्य की शुरुआत?
धुनुची नृत्य की परंपरा काफी पुरानी है। इससे जुड़ी लोक मान्यता है कि जब देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच युद्ध हो रहा था, तब देवी की शक्ति बढ़ाने के लिए भक्तों ने धूप जलाकर उनकी पूजा की थी। यही आगे चलकर धुनुची नृत्य बना।
ये भी माना जाता है कि धुनुची की शुरुआत 17वीं या 18वीं शताब्दी में हुई थी, लेकिन उस समय सिर्फ जमींदारों के घर ही धुनुची नृत्य किया जाता था। 19वीं शताब्दी के करीब जमींदार घरानों में दुर्गा पूजा के सार्वजनिक रूप लेने के बाद धुनुची बाकी जनता के बीच भी धीरे-धीरे मशहूर हुआ और दुर्गा पूजा की एक खास परंपरा बन गया।
क्या है धुनुची नृत्य की खासियत?
धुनुची नृत्य की खासियत उसकी लय में है, जिसे देखकर निगाहें हटाना मुश्किल हो जाता है। नर्तक दोनों हाथों में धुनुची लेते हैं, जिसमें नारियल के छिलके, कपूर और लोबान जलाया जाता है। ढाक की थाप के साथ नर्तक हाथों में धुनुची लेकर नृत्य करते हैं। कई लोग तीसरी धुनुची मुंह में दबाकर भी नृत्य करते हैं।
इसमें हाथों के खास मूवमेंट किए जाते हैं और धुनुची से निकलता धुआं इसे देखने में और भी खूबसूरत बना देता है। जैसे-जैसे ढाक की थाप तेज होती है, नर्तकों में और उत्साह भर जाता है। पहले धुनुची नृत्य सिर्फ पुरुष किया करते थे, लेकिन अब महिलाएं भी इस नृत्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं।
