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क्यों 'धुनुची नृत्य' के बिना अधूरी मानी जाती है दुर्गा पूजा? महिषासुर के वध से जुड़ी है अलौकिक कहानी

Published: Wed, 23 Sep 2026 03:21 PM (IST)Updated: Mon, 19 Oct 2026 02:17 PM (IST)

धुनुची नृत्य बंगाल की दुर्गा पूजा का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जो मां दुर्गा के प्रति अगाध श्रद्धा और उल्लास को दर्शाता है।

दुर्गा पूजा में क्यों रोंगटे खड़े कर देता है 'धुनुची नृत्य'? (AI Generated Image)

 दुर्गा पूजा में क्यों रोंगटे खड़े कर देता है 'धुनुची नृत्य'? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गूंजती ढाक की थाप, सुलगते नारियल के रेशे और धूप-कपूर के महकते धुएं के बीच जब हाथों में धुनुची थामे कदम थिरकते हैं, तो पूरा पंडाल एक अलौकिक ऊर्जा से भर उठता है। बंगाल की दुर्गा पूजा में धुनुची नृत्य महज कोई लोक-कला या मनोरंजन नहीं, बल्कि मां भवानी के प्रति अगाध समर्पण, प्रेम और उल्लास का जीवंत आह्वान है।

महासप्तमी से लेकर महानवमी की संध्या आरती के समय बंधने वाला यह तिलिस्म हर देखने वाले को सम्मोहित कर लेता है। आखिर अग्नि और आस्था के इस अद्भुत संगम की शुरुआत कैसे हुई और क्यों यह अनुष्ठान इतना खास है? आइए, इस आर्टिकल में धुनुची नृत्य की जड़ों और इसके आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझते हैं।

क्यों किया जाता है धुनुची नृत्य?

ये नृत्य मां दुर्गा की आराधान करने के लिए किया जाता है। बंगाली परंपरा में दुर्गा पूजा के दौरान मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और लोग इसी का उत्सव मनाते हैं। अपनी खुशी और मां के लिए श्रद्धा को जाहिर करने के लिए धुनुची नृत्य किया जाता है। 

ये नृत्य काफी एनर्जी से भरपूर होता है, जिसमें धुनुची में नारियल के छिलके, कपूर और लोबान को जलाकर वातावरण को शुद्ध किया जाता है और इसे हाथ में लेकर नृत्य किया जाता है। माना जाता है कि धुनुची से निकलने वाला ये धुंआ नकारात्मक ऊर्जा को खत्म करता है और पूरे वातावरण को पवित्र कर देता है। 

कैसे हुई धुनुची नृत्य की शुरुआत?

धुनुची नृत्य की परंपरा काफी पुरानी है। इससे जुड़ी लोक मान्यता है कि जब देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच युद्ध हो रहा था, तब देवी की शक्ति बढ़ाने के लिए भक्तों ने धूप जलाकर उनकी पूजा की थी। यही आगे चलकर धुनुची नृत्य बना। 

ये भी माना जाता है कि धुनुची की शुरुआत 17वीं या 18वीं शताब्दी में हुई थी, लेकिन उस समय सिर्फ जमींदारों के घर ही धुनुची नृत्य किया जाता था। 19वीं शताब्दी के करीब जमींदार घरानों में दुर्गा पूजा के सार्वजनिक रूप लेने के बाद धुनुची बाकी जनता के बीच भी धीरे-धीरे मशहूर हुआ और दुर्गा पूजा की एक खास परंपरा बन गया। 

क्या है धुनुची नृत्य की खासियत?

 धुनुची नृत्य की खासियत उसकी लय में है, जिसे देखकर निगाहें हटाना मुश्किल हो जाता है। नर्तक दोनों हाथों में धुनुची लेते हैं, जिसमें नारियल के छिलके, कपूर और लोबान जलाया जाता है। ढाक की थाप के साथ नर्तक हाथों में धुनुची लेकर नृत्य करते हैं। कई लोग तीसरी धुनुची मुंह में दबाकर भी नृत्य करते हैं। 

इसमें हाथों के खास मूवमेंट किए जाते हैं और धुनुची से निकलता धुआं इसे देखने में और भी खूबसूरत बना देता है। जैसे-जैसे ढाक की थाप तेज होती है, नर्तकों में और उत्साह भर जाता है। पहले धुनुची नृत्य सिर्फ पुरुष किया करते थे, लेकिन अब महिलाएं भी इस नृत्य में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। 


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