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निमिया के डाढ़ मईया... सिर्फ गीत नहीं, देवी और भक्त का संवाद है 'पचरा'; बिहार की संस्कृति से है गहरा नाता

Published: Tue, 08 Sep 2026 02:31 PM (IST)Updated: Wed, 09 Sep 2026 01:31 PM (IST)

बिहार के लोकगीतों में पचरा भी शामिल है। ये गीत मां भगवती की आराधना के लिए गाए जाते हैं।

बिहार का मशहूर लोकगीत है पचरा (AI Generated Image)

बिहार का मशहूर लोकगीत है पचरा (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बिहार के लोकगीतों में पचरा की खास जगह है। ये गीत सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं गाए जाते। इनके पीछे गहरी आस्था छिपी है, जो देवी भगवती और उनके स्वरूपों के लिए गाए जाते हैं। 

पचरा गीतों में 'निमिया के डाढ़ मईया' काफी मशहूर है, जिसे कई बड़े कलाकारों ने अपनी आवाज देकर घर-घर तक पहुंचाया है। माना जाता है कि पचरा गीत भक्त और देवी के बीच बातचीत का जरिया होते हैं। आइए जानें पचरा गीत होते क्या हैं और इन्हें कैसे गाया जाता है।  

क्या होते हैं पचरा गीत?

पचरा गीत भक्त और मां दुर्गा के बीच बातचीत का जरिया माने जाते हैं। माना जाता है कि पचरा गीत सुनकर देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों के घर आती हैं। इसलिए नवरात्र में मंदिरों या नीम के पेड़ के नीचे बैठकर महिलाएं पचरा गाती हैं। 

इन गीतों में कोई मुश्किल मंत्र या श्लोक नहीं होते हैं। ये गीत भक्त और माता के बीच बातचीत के रूप में गाए जाते हैं, जिनमें बेहद आसान भोजपुरी शब्दों का इस्तेमाल होता है। भक्त मां दुर्गा को अपनी माता या बेटी समझकर गीत गाते हैं और उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। 

कैसे गाया जाता है पचरा? 

पचरा गीत बहुत भावुक करने वाले होते हैं और इन्हें लय में गाया जाता है। आमतौर पर इसे महिलाएं समूह में गाती हैं। एक मुख्य गायिका पंक्ति की शुरुआत करती हैं और बाकी महिलाएं उसमें टेक लगाकर यानी उसे दोहराकर साथ देती हैं। 

इन गीतों की शुरुआत बहुत धीमी लय के साथ होती है और धीरे-धीरे ये तेज होता जाता है। ये गांव-देहात का पारंपरिक गीत है, इसलिए इन्हें ढोलक और मंजीरे जैसे वाद्य यंत्रों पर ही गाया जाता है। कई बार सिर्फ तालियां बजाकर भी पचरा गाया जाता है। 

साथ ही, पचरा हमेशा संवाद की शैली में गाया जाता है, जैसे मां भगवती और भक्त आपस में बात कर रहे हैं। जैसे-

मां दुर्गा कहती हैं-

सुतल बाडु के जागल ए मलिनिया

के बूंद एक ना

मालिन पनिया पियवतु

हो के बूंद एक न 

इस पर मालिन कहती है-

कईसे के पनिया पियाई ऐ सितली मईया 

के मोरे गोदिया न 

बाड़े बलका नादान 

मईया मोरे गोदिया

इसी तरह बातचीत के लहजे में पचरा गाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इन गीतों को सुनकर देवी प्रसन्न होती हैं और भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। 

क्यों इतने खास हैं पचरा गीत?

पचरा गीत बहुत आसान और देसी शब्दों से बने होते हैं। इसलिए हर किसी के लिए ये गीत गाना काफी आसान होता है। इसके अलावा, पचरा गीतों में नीम के पेड़ और माता के अलग-अलग रूपों का जिक्र मिलता है। नीम के पेड़ का इन गीतों में खास महत्व है, क्योंकि माना जाता है कि नीम मां दुर्गा को काफी प्रिय है।  

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, चेचक के समय भी शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पचरा गाया जाता है और नीम के पत्तों से मरीज को सहलाया जाता है। इन गीतों की सबसे बड़ी खासियत है कि ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से ही आगे बढ़ते हैं। आज कई बड़े-बड़े कलाकारों ने पचरा गाकर इन्हें और भी मशहूर कर दिया है।