जब Manoj Bajpayee को लगा करियर हो रहा है खत्म, तब कैंची धाम ने बदल दी 'द फैमिली मैन' की किस्मत
क्या आप यकीन कर पाएंगे कि द फैमिली मैन जैसे सुपरहिट शो और दर्जनों बेहतरीन फिल्में करने के बाद भी अभिनेता मनोज बाजपेयी कभी अपने करियर को खत्म मान बैठे थे? जी हां, एक समय ऐसा भी आया जब काम की कमी और लगातार बढ़ती बेचैनी उन्हें तोड़ने लगी थी। यही वह मोड़ था, जब किस्मत ने उन्हें उत्तराखंड के कैंची धाम तक ले गई। इस यात्रा ने न सिर्फ उनके करियर की दिशा बदल दी, बल्कि उनके भीतर छिपी शक्ति को फिर से जगा दिया।

नीम करौली बाबा के कैंची धाम में मिली मनोज बाजपेयी को जिंदगी की नई दिशा (Image Source: X & Freepik)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बॉलीवुड के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) आज जितने सक्सेसफुल और कॉन्फिडेंट दिखाई देते हैं, उनकी यात्रा उतनी ही संघर्षों और आत्ममंथन से होकर गुजरी है। हाल ही में, एक यूट्यूब इंटरव्यू में उन्होंने अपनी जिंदगी के उस दौर के बारे में खुलकर बात की, जब उन्होंने लगभग एक्टिंग छोड़ देने का मन बना लिया था। काम न मिलने की बेचैनी, भविष्य को लेकर असमंजस और भीतर छिपी निराशा ने उन्हें उस राह पर पहुंचा दिया, जहां एक आध्यात्मिक अनुभव ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

करियर छोड़ने की कगार पर थे मनोज बाजपेयी
एक यूट्यूब इंटरव्यू में मनोज बाजपेयी ने बताया कि वे अपने करियर के एक बेहद मुश्किल चरण से गुजर रहे थे। इस दौरान उन्हें लगा कि शायद अब इंडस्ट्री में उनका समय पूरा हो चुका है। लगभग एक साल तक उन्हें कोई काम नहीं मिला। यह लगातार ठहराव इतना भारी पड़ने लगा कि वे सोचने लगे- क्या अब उन्हें फिल्म इंडस्ट्री छोड़ देनी चाहिए?
उन्होंने साझा किया कि जुगनुमा, द फैबल शुरू होने से ठीक पहले वे पूरे एक साल काम से दूर रहे। यह वही बेचैनी भरा दौर था, जिसमें वे अपने करियर और भविष्य के बारे में गंभीर सवालों से जूझ रहे थे।
दिलचस्प बात यह है कि उनके साथ ऐसा एक बार पहले भी हो चुका था- द फैमिली मैन सीजन 1 शुरू होने से ठीक पहले। उस समय भी वे लगभग एक साल काम के बिना रहे, परेशान थे और दिशा ढूंढ़ रहे थे, लेकिन फिर वही शो उनके करियर का एक निर्णायक मोड़ बना।
कैंची धाम में उतर गया मन का बोझ

उथल-पुथल से भरे इस समय में उन्होंने डायरेक्टर राम रेड्डी के साथ मिलकर एक अनोखा फैसला लिया। सेट पर पहुंचने से पहले दोनों ने उत्तराखंड स्थित नीम करौली बाबा के कैंची धाम आश्रम (Neem Karoli Baba Kainchi Dham) जाने का मन बनाया।
उन्होंने बताया कि वे वहां पहुंचे, फिर ऊपर स्थित बाबाजी की गुफा तक चढ़ाई की, ध्यान लगाया और वहीं उन्हें ऐसा “जादुई अनुभव” हुआ जिसने उनके मन की दुविधा को एकदम साफ कर दिया। उन्होंने कहा कि ध्यान के दौरान कुछ ऐसा महसूस हुआ जिसने उन्हें भीतर से झकझोर दिया- जैसे अचानक मन का सारा बोझ उतर चुका हो। गुफा से नीचे लौटते समय दोनों को साफ महसूस हुआ कि उन्हें फिल्म का आइडिया मिल गया है, यानी उसे किस इमोशन और किस नजरिए से बनाना है।
इस यात्रा ने मनोज बाजपेयी को वह स्पष्टता दी जो पिछले एक साल की उलझनों में कहीं खो गई थी। उनके भीतर फिर से विश्वास जागा, और उन्होंने महसूस किया कि शायद अब वे अपनी राह समझ पा रहे हैं।
द फैमिली मैन से जुड़ा दिलचस्प कनेक्शन
मनोज बाजपेयी ने बताया कि एक साल तक काम न मिलने और मानसिक बेचैनी का दौर जुगनुमा से पहले ही नहीं, बल्कि द फैमिली मैन से ठीक पहले भी आया था। उन्होंने इसे एक तरह का चक्र बताया- जब भी वे किसी गहरे मोड़ पर होते हैं, लाइफ उन्हें थोड़े समय के लिए रोक देती है, ताकि वे नई दिशा देख सकें।

परिवार के सपोर्ट से मिली मजबूती
जब वे करियर छोड़ने के विचार से जूझ रहे थे, उनके दोस्त बेहद चिंतित थे। वहीं उनकी पत्नी, अभिनेत्री शबाना रजा, चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी रहीं। उन्होंने मनोज से कहा कि अगर वे चाहें, तो मुंबई छोड़कर कहीं भी नई शुरुआत कर सकते हैं- परिवार हर फैसले में साथ है। इस बिना शर्त समर्थन ने उन्हें भीतर से संभाला और आगे बढ़ने की ताकत दी।
जुगनुमा की कहानी में मिले मन के जवाब
बाजपेयी ने बताया कि वे अपने सवालों का उत्तर खोजते-खोजते थक चुके थे, लेकिन जुगनुमा की कहानी ने उन्हें एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव दिया। जैसे इस कहानी में वे वही पा रहे थे जो वे भीतर से तलाश रहे थे- एक दिशा, एक अर्थ, एक स्पष्टता। राम रेड्डी के निर्देशन में बनी यह फिल्म जादुई यथार्थवाद के साथ भावनात्मक दूरी, मुक्ति की तलाश और आंतरिक शांति जैसे गहरे विषयों को छूती है। मनोज बताते हैं कि कैंची धाम में उन्हें जो स्थिरता मिली, वही फिल्म के पात्र से उनके जुड़ाव का आधार बनी।
आध्यात्मिक शांति से बदला एक्टिंग का नजरिया
मनोज बाजपेयी मानते हैं कि कैंची धाम का अनुभव उनके अभिनय के लिए भी एक नया मोड़ साबित हुआ। वहां मिली 'शांति' और 'स्पष्टता' ने उनका दृष्टिकोण बदल दिया। उन्होंने महसूस किया कि कला तभी खिलती है, जब मन भीतर से स्थिर और आजाद हो। इस एहसास ने उन्हें जुगनुमा के लिए और भी सेंसिटिव, ओपन और इमोशनली स्ट्रॉन्ग बना दिया। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी- यह उनकी आत्मयात्रा की अगली कड़ी थी।
मनोज बाजपेयी की कहानी इस बात की मिसाल है कि कभी-कभी जीवन हमें रोकता है, हिलाता है, उलझाता है- ताकि हम अपनी वास्तविक राह देख सकें। कैंची धाम में मिला अनुभव, परिवार का साथ और भीतर उठती सच्ची पुकार- इन सबने मिलकर उन्हें न सिर्फ एक नई दिशा दी, बल्कि मनोज बाजपेयी को पहले से कहीं ज्यादा पूर्ण बना दिया।

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