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    तहजीब और वि‍रासत का ह‍िस्‍सा है "लखनऊ की चि‍कनकारी", बेगम नूरजहां से जुड़ा है इत‍िहास

    Updated: Fri, 13 Dec 2024 06:16 PM (IST)

    भारत ही नहीं दुन‍ियाभर के लोग लखनऊ की च‍िकनकारी (Lucknow Chikankari) के दीवाने हैं। सेल‍िब्र‍िटीज भी इस ट्रेंड को फॉलो करते हैं। ये कढ़ाई अपनी नाजुकता और सुंदरता के लि‍ए जानी जाती है। साथ ही ये अपने बारीकी और सटीक काम के लिए भी मशहूर है। लखनफ और उसके आसपास के कई गांवों की महि‍लाएं कढ़ाई कर अपनी जीव‍िका चला रही हैं।

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    क्‍या है लखनऊ की च‍िकनकारी का इत‍िहास।

    लाइफस्‍टाइल डेस्‍क, नई द‍िल्‍ली। लखनऊ का नाम जब भी लिया जाता है तो सबसे पहले हमारे जहन में नवाब शाही महल, कोठियां और तहजीब का ही ख्याल आता है। इन्हीं में से एक है (Lucknow Chikankari) लखनऊ की चिकनकारी। आज इंडिया में फैशन की बात जब होती है तो चिकनकारी का नाम सबसे ऊपर रहता है। ये कला लखनऊ की पारंपरिक कढ़ाई तकनीक का हिस्सा है। चिकनकारी आज पूरी दुनिया में अपनी सुंदरता, नाजुकता और कढ़ाई के लिए फेमस है। आप ये कह सकते हैं कि चिकनकारी लखनऊ की तहजीब और विरासत का हिस्सा है।

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    इसका इतिहास भले ही पुराना हो लेकिन ये महिलाओं की आज भी पसंदीदा है। Gen Z भी इस कला को खूब पसंद करती है। चिकनकारी (Chikankari History) का नाम अपने बारीकी और सटीक काम के लिए मशहूर है, जिसमें महीन सूती या रेशमी कपड़े पर हाथ से कढ़ाई की जाती है। आज हम आपको लखनऊ के चिकनकारी कढ़ाई का इतिहास बताने जा रहे हैं। तो आइए जानते हैं विस्तार से-

    चिकनकारी शब्द की उत्पत्ति

    कहा जाता है कि चिकनकारी शब्द का उत्पत्ति तुर्किये शब्द "चिकन" से हुई है। तुर्किये में चिकन का अर्थ होता है "नाजुक काम" या "सजावट"। यह शब्द चिकनकारी के बारीक और महीन कढ़ाई के काम को दर्शाता है। बुटी, पेपनी, जाल, फूलकारी, कन्नी, आरा, तंकी और साबरी चिकनकारी के प्रमुख नामों में से एक हैं।

    बेगम नूरजहां से जुड़ा है इत‍िहास

    चिकनकारी का जन्म मुगल काल में हुआ था। फारसी कारीगरों ने इसे भारत में लाकर यहां के कपड़ों पर कढ़ाई करना शुरू किया। हालांकि इसे असली पहचान जहांगीर की पत्नी बेगम नूरजहां की वजह से मिली थी। कहा जाता है कि जहांगीर की पत्नी नूरजहां को हस्तशिल्प कला और विशेष रूप से कढ़ाई का बहुत शौक था। वो खुद भी इसमें काफी रुचि रखती थीं। उनके दरबार में कई कारीगरों को इस कला के लिए प्रशिक्षित किया गया।

    ऐसे लखनऊ पहुंची थी च‍िकनकारी

    हालांकि लखनऊ से पहले चिकनकारी का काम ईरान में हुआ था। ईरान से यह कला हिंदुस्तान पहुंचा था। दिल्ली से मुर्शीदाबाद, मुर्शीदाबाद से ढाका और ढाका से जाकर लखनऊ पहुंचा। लखनऊ और उसके आसपास कई गांवों में आज भी महिलाएं केवल चिकनकारी की कढ़ाई करके अपना घर चलाती हैं। ये अब पूरी दुनिया में मशहूर हो चुकी है। सबसे पहले चिकनकारी कढ़ाई का काम मलमल कपड़ों पर हुआ था लेकिन वक्त बदलता गया और अब ये कढ़ाई सूती कपड़ों के अलावा सिल्क, जॉर्जेट, शिफॉन पर की जाने लगी है।

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    बारीकी से होता है काम

    चिकनकारी कढ़ाई करने के लिए लकड़ी के ब्लॉक से कपड़े पर डिजाइन उकेरा जाता है। इसमें नील और सफेद डाई का इस्तेमाल किया जाता है। ये काम पूरा होने के बाद कपड़े को फ्रेम में सेट किया जाता है और हाथ से कढ़ाई का काम शुरू किया जाता है। पहले सफेद सूती धागे से कढ़ाई की जाती थी। हालांकि अब सभी रंगाें में कढ़ाई की जाने लगी है।

    सेल‍िब्र‍िटीज को भी पसंद है च‍िकनकारी

    अब फैशन डिजाइनर्स ने चिकनकारी को नए और मॉडर्न रूप में पेश किया है। आज युवा वर्ग के लोग इसे बहद पसंद करते हैं। भारत के साथ-साथ विदेशों में भी चिकनकारी काफी फेमस है। इसकी सुंदरता और नाजुकता के कारण लोग इसे खरीदने के लिए तैयार रहते हैं। इतना ही नहीं, सेलिब्रिटीज के बीच भी इसका क्रेज बढ़ गया है। बॉलीवुड की कई प्रमुख हस्तियां चिकनकारी के कपड़े पहनती हुईं नजर आती हैं।

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