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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 04, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

कश्मीर में केसर उत्पादकों के लिए अच्छी खबर, बारिश से लहला रहे खेत, इस साल बेहतर उपज की उम्मीद

Published: Sat, 04 Oct 2025 02:34 PM (GMT+05:30)

कश्मीर के केसर उत्पादकों के लिए इस वर्ष अच्छी खबर है क्योंकि सितंबर में हुई बारिश से फसल में सुधार ...और पढ़ें

बारिश से केसर की खेती में सुधार, कश्मीर के किसानों में जगी उम्मीद।
बारिश से केसर की खेती में सुधार, कश्मीर के किसानों में जगी उम्मीद।

HighLights

  1. कई खराब मौसमों के बाद इस बार हमें कुछ राहत मिलेगी।
  2. घाटी में केसर की खेती लगातार कम होती जा रही।
  3. कंद की तस्करी जारी रही, तो हमारी विरासत खतरे में पड़ जाएगी।

जागरण संवाददाता, जागरण, श्रीनगर। कश्मीर के केसर उत्पादकों के लिए यह साल बहुत ही शुभ साबित हो रहा है। सितंबर में हुई पर्याप्त बारिश ने पंपोर और उसके आसपास के केसर बेल्ट में केसर की खेतियों को जीवित कर दिया है। किसानों ने कहा कि फसल में सुधार के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं, स्वस्थ बल्ब और मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी हुई है।

कश्मीर केसर उत्पादक संघ के अध्यक्ष अब्दुल मजीद वानी ने कहा, "पिछला साल विनाशकारी था; फूल मुश्किल से खिले थे। लेकिन यह मौसम आशाजनक लग रहा है। अगर हमें एक और बारिश मिलती है, तो उपज 80 प्रतिशत तक पहुंच सकती है, जो हमारे लिए एक वरदान होगा।"

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फूल ज्यादा खिलने की संभावना

कश्मीर के केसर नगर" के नाम से मशहूर पंपोर के केसर उत्पादक भी इसी तरह की आशा व्यक्त करते हैं। उनका कहना है कि इस साल पौधे ज़्यादा स्वस्थ दिख रहे हैं और फूल भी ज़्यादा खिलने की संभावना है। चंदहरा के एक अन्य किसान बिलाल अहमद ने कहा, अगर उत्पादन 70-80 प्रतिशत तक भी पहुंच जाता है, तो भी कई खराब मौसमों के बाद हमें कुछ राहत मिलेगी।

घाटी में लगातार कम हो रही केसर की खेती

इस आशावाद के साथ कुछ चिंताएं भी जुड़ी हैं। घाटी में केसर की खेती लगातार कम होती जा रही है, किसान जलवायु परिवर्तन, कम सिंचाई और सबसे चिंताजनक रूप से, फसल की नींव माने जाने वाले केसर के कंदों की तस्करी से जूझ रहे हैं। अभी दो महीने पहले, अवंतीपोरा में पुलिस और कृषि अधिकारियों ने घाटी के बाहर 1.5 क्विंटल केसर के कंद की तस्करी की एक बड़ी कोशिश को नाकाम किया था।

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हमारी संस्कृति की पहचान है केसर

विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की प्रथाएं बुवाई के मौसम में कमी पैदा करके स्थानीय खेती को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा, "केसर न केवल एक आर्थिक फसल है, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा है। अगर कंद की तस्करी जारी रही, तो हमारी विरासत खतरे में पड़ जाएगी।"

चुनौतियों को दर्शाते हैं सरकारी आंकड़े

सरकारी आंकड़े चुनौतियों को दर्शाते हैं। उत्पादन 2021 में 17.33 मीट्रिक टन से घटकर 2022 में 14.87 मीट्रिक टन हो गया, और 2023 में मामूली सुधार के साथ 14.94 मीट्रिक टन हो गया और 2024 में यह सामान्य उत्पादन का लगभग 30 प्रतिशत ही था।

राष्ट्रीय केसर मिशन के तहत की गई पहलों से कुछ खेतों को पुनर्जीवित करने में मदद मिली है, लेकिन विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि जब कंदों को अवैध रूप से काट लिया जाता है, तो ये लाभ कम हो जाते हैं।

उन्होंने सिंचाई सुविधाओं को चालू करने और इस परियोजना के पुनरुद्धार के लिए कदम उठाने हेतु सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की।

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