'कोरोना से भी इतना डर नहीं लगा', बडाल गांव के लोगों ने बयां किया दहशत का मंजर; अब तक 16 की मौत
राजौरी के बडाल गांव में रहस्यमयी मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। 45 दिनों में तीन परिवारों के 16 लोगों की मौत हो चुकी है। ग्रामीण डरे हुए हैं और उन्हें समझ नहीं आ रहा कि आखिर हो क्या रहा है। प्रशासन ने स्वास्थ्य टीमों को बुलाकर जांच शुरू कर दी है लेकिन अभी तक मौतों का कारण स्पष्ट नहीं हो पाया है।
जागरण संवाददाता, राजौरी। पहाड़ी बडाल गांव में लोग 45 दिनों में एक के बाद एक रहस्यमयी मौतों से पूरा गांव ही डरा हुआ है। लोगों का कहना है कि जिस समय आतंकवाद क्षेत्र में चरम पर था, उस समय हमें मौत का डर नहीं लगा और कोरोना काल में भी नहीं डरे, लेकिन गांव में एक-एक करके तीन परिवारों के 16 लोगों की हुई मौतों से उन्हें डर लगने लगा है।
उन्होंने कहा कि पहले हमें लग रहा था कि यह कोई बीमारी है, लेकिन इसकी संभावना को भी अधिकारियों ने खारिज कर दिया है। राजौरी जिला मुख्यालय से लगभग 55 किलोमीटर दूर स्थित बडाल गांव के लोग डर व सहमे हुए हैं और वो चाहते हैं कि जल्द ही इन मौतों के मामलों से पर्दा उठ सके।
यह हम सभी के लिए बड़ी चुनौती: विधायक
क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक जावेद इकबाल चौधरी ने कहा यह हम सभी के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने लोगों से अपील किया कि अगर किसी के पास कोई सुराग है तो कृपया आगे आएं।
विधायक ने कहा कि सात दिसंबर को गांव में संदिग्ध परिस्थितियों में मरने वाले पहले लोगों में मुहम्मद असलम के बहनोई फजल हुसैन और उनके चार बच्चे थे। शुरू में माना गया कि वे फूड पॉइजनिंग से मरे हैं, क्योंकि परिवार ने कुछ समय पहले ही एक शादी में भाग लिया था।
असलम के चचेरे भाई रफीक की गर्भवती पत्नी और उसके तीन बच्चों की 12 दिसंबर को मौत हो गई। विधायक ने कहा कि सरकार ने स्थिति पर संवेदनशील तरीके से प्रतिक्रिया दी, किसी भी तरह की चूक को मौका नहीं दिया।
जम्मू-कश्मीर के अंदर और बाहर से स्वास्थ्य टीमों को बुलाया गया और सभी ग्रामीणों की कम से कम समय में जांच की गई। उन्होंने उम्मीद जताई कि जांच पूरी होने के बाद सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा।
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क्षेत्र में बने डर के माहौल की जानकारी देते बडाल गांव के निवासी। (फोटो- जागरण)
मामले में गहरी साजिश भी मान रहे हैं लोग
वहीं मुहम्मद असलम भी पूरे मामले को गहरी साजिश से कम नहीं मान रहे हैं। उन्होंने कहा कि शादी में सैकड़ों लोगों ने दावत की, लेकिन पहले फजल हुसैन और उनके बच्चों की मौत हुई। कुछ दिनों बाद मेरे चचेरे भाई की पत्नी और बच्चों की मौत हो गई और फिर मौत मेरे दरवाजे तक आ पहुंची। ऐसा कैसे हो सकता है कि सिर्फ हमारा परिवार ही इस तरह से खत्म हो गया।
उनके परिवार ने फजल हुसैन के घर पर खाना खाया,जहां मौतों के 40वें दिन विशेष प्रार्थना सभा की गई थी। गांव वालों में डर इस हद तक समा गया है कि जब वह शोकाकुल थे, तो कई लोग उनसे मिलने से भी कतराने लगे। बशारत हुसैन, नजम दीन, उमर खान ने कहा कि इस तरह का डर तब भी नहीं था जब आतंकवाद अपने चरम पर था।
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