बाढ़ से त्रासदी... जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रही जिदंगी; छतों पर गुजर रही रात, गलियों में बन रहा खाना
जम्मू में तवी नदी के किनारे बसे पीरखोह गुज्जर नगर और प्रेम नगर जैसे इलाकों में बाढ़ से भारी तबाही हुई है। घरों में मलबा भरा है गलियां दब गई हैं और लोग छतों पर रहने को मजबूर हैं। खाने-पीने और शौच जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। महामारी फैलने का खतरा भी बढ़ रहा है क्योंकि चारों ओर गंदगी और मलबा पसरा हुआ है।

ललित कुमार, जागरण, जम्मू। वीरवार तवी नदी इस कदर शांत थी कि मानो कुछ हुआ ही न हो। नदी में पानी सामान्य था लेकिन उसके किनारों पर हर तरफ तबाही के मंजर बता रहे थे कि मंगलवार को तवी नदी किस रौद्र रूप में थे।
अब तवी नदी तो शांत हो गई है लेकिन इसके किनारे पर बसे लोगों की जिंदगी में इतनी उथल-पुथल ला गई है जिसे सामान्य होने में शायद महीनों-साल लग जाएंगे। तवी नदी से सटे पीरखोह की कहानी हो, गुज्जर नगर या प्रेम नगर, हर तरफ आज जिंदा रहने के लिए जिंदगी संघर्ष कर रही है।
इन कालोनियों में गलियां मलबे में दब चुकी है, घरों की दो-दो मंजिले कीचड़ से भरी है और परिवार के सदस्य छतों पर दिन-रात गुजारने को मजबूर है। खाना बनाने के लिए कोई साधन नहीं, इसलिए गली के किसी हिस्से में मलबे के ऊपर गैस जलाकर किसी तरह समय काटा जा रहा है।
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घर की महिलाओं के लिए शौच जाने की कोई जगह नहीं बची है। ऐसे में आसपास के घरों में जाकर किसी तरह इज्जत बचाने की कोशिशें हो रही है।
गुज्जर नगर निवासी शिव कुमार के परिवार में पांच सदस्य है। पत्नी के अलावा तीन बेटे और एक बेटी है। दो दिन से ये लोग बेघर है। यहां इनका तीन कमरें का मकान था जो आज पूरी तरह से मलबे से भरा हुआ है।
परिवार के सदस्य रात छत पर गुजारते हैं और दिन में मलबे से भरी गली में बैठे रहते हैं। दो दिन से घर का मलबा निकालने का काम चल रहा है लेकिन अभी आधा घर भी खाली नहीं हुआ। सारा सामान बर्बाद हो चुका है।
लोगों की मेहरबानियों पर ही निर्भर रह गए है
शिव कुमार बताते हैं कि पूरे मोहल्ले का यहीं हाल है। आखिर महिलाएं कहां जाए, कहां नहाय, कहां कपड़े बदले और कहां शौच जाए। कहीं कुछ नहीं बचा। छोटे-छोटे बच्चे है, जिन्हें समय-समय पर दूध चाहिए। दूध तो बाजार से ले आए लेकिन चूल्हा-चौका कहां से लाए। इसलिए अब आसपास के लोगों की मेहरबानियों पर ही निर्भर रह गए है।
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दिन भर मलबा निकालने में लगे रहते हैं और रात को सब छत पर सो रहे है, बस ऐसे ही दिन काट रहे हैं। शहर के पीरखोह, गुज्जर नगर, प्रेम नगर व साथ लगते मोहल्लों में सैंकड़ों परिवार है जो कुछ इसी तरह की जद्दोजहद से गुजर रहे हैं।
महामारी फैलने का भी बना खतरा
तवी में बाढ़ से प्रभावित इलाकों में अब महामारी फैलने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। पिछले 36 घंटों से ये इलाके मलबे व कूड़े से पटे पड़े है। कई इलाकों में जहरीले सांप और बिच्छू भी पानी में बह कर आए है जो अब जगह-जगह नजर आ रहे हैं।
अपने घर से मलबा निकालने में जुटे गुज्जर नगर निवासी लक्की बताते है कि आज सुबह तक उनके घर से मलबा निकालते समय तीन सांप निकल चुके हैं। मलबा निकालने के लिए मजदूर लाए थे और जब सांप निकले तो उन्हें देखकर वो भी भाग गए। अब डर के मारे कोई भीतर घुसने को तैयार नहीं। प्रशासन को कौस रहे क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि पिछले दो दिनों से उनकी सुध लेने कोई नहीं आया।
घरों व गलियों में चारों ओर गंदगी फैली है। ऐसे में कोई बीमारी फैल गई तो कौन जिम्मेदार होगा? प्रशासन कम से कम मलबा निकालने का ही बंदोबस्त कर देता तो वे लोग आने वाली आपदा से तो बच जाते।
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इस तबाही के लिए आखिरकार जिम्मेदार कौन?
पीरखोह से लेकर गुज्जर नगर तक जिन इलाकों में तवी की बाढ़ से सबसे अधिक नुकसान हुआ है, उनमें से अधिकांश क्षेत्रों में लोग सिंचाई विभाग की जमीन पर निर्माण करके बैठे हैं। शमशान घाट के साथ लगते गुज्जर नगर इलाके में भी सबसे अधिक नुकसान झेलने वाले मोहल्ले सिंचाई विभाग की जमीन पर बसें है।
वर्ष 1992 में जब तवी नदी पर गुज्जर नगर पुल का निर्माण कार्य शुरू हुआ था तो शमशान घाट के साथ लगते इलाके में कुछ दर्जन झोंपड़ियां व कच्चे निर्माण थे जो पुल निर्माण में बाधा बन रहे थे। उस समय की सरकार ने इन लोगों का पुनर्वास करते हुए सबको कासिम नगर में पांच-पांच मरले के प्लाट दिए।
कुछ ने तो वहां जाकर घर बना लिए लेकिन कुछ यहीं डटे रहे और प्लाट बेच दिए। धीरे-धीरे फिर से झोंपड़ियां बढ़ती गई और झोंपड़ियां पक्के निर्माण में बदलती गई।
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