शिमला, जेएनएन। किसी भी सरकार का प्राथमिक दायित्व है कि लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों और उन्हें इसके लिए भटकना न पड़े। सड़क, बिजली, पानी एवं स्वास्थ्य ऐसे क्षेत्र हैं, जिनसे हर वर्ग जुड़ा रहता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश की गिनती अग्रणी राज्यों में की जाती है। राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश को इसके लिए पुरस्कार भी मिल चुके हैं। प्रदेश में सरकार चाहे किसी भी दल की रही हो, लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवाने के लिए प्रयासरत रही है, लेकिन जब अव्यवस्था हावी हो जाती है तो सभी प्रयास धरे के धरे रह जाते हैं और लोगों के हिस्से परेशानी के सिवा कुछ नहीं आता। बिलासपुर के जिला अस्पताल में सोमवार को कार्यरत 16 चिकित्सकों में से 11 चिकित्सक एक साथ छुट्टी पर चले गए।

एक साथ इतने चिकित्सकों के छुट्टी पर जाने से मरीजों को परेशान होना पड़ा। इस अव्यवस्था के लिए सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। स्थानीय प्रबंधन को अवकाश देने से पहले यह देखना चाहिए था कि एक साथ इतने डॉक्टरों के न होने का परिणाम क्या होगा। नतीजतन लोग इलाज के लिए भटकते रहे, पर उनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं था। ऐसी ही स्थिति का सामना बुधवार को चंबा मेडिकल कॉलेज में करना पड़ा, जहां सिर्फ एक डॉक्टर के सहारे मरीजों को छोड़ा गया। अस्पताल में 17 विशेषज्ञ कार्यरत हैं, लेकिन एक को छोड़कर सभी छुट्टी पर थे।

सरकारी प्रयास के बावजूद एक सच यह स्थिति अकेले बिलासपुर जिला अस्पताल की नहीं है, बल्कि प्रदेश का हर अस्पताल चिकित्सकों की कमी से जूझ रहा है। अधिकतर चिकित्सा संस्थानों में चिकित्सकों एवं अन्य स्टाफ के पद पूरे नहीं भरे गए हैं। शायद ही ऐसा कोई अस्पताल हो जहां पर सभी चिकित्सक उपलब्ध हों, लेकिन व्यवस्था बनाने का जिम्मा संस्थान प्रबंधन का है, जिससे लोगों को परेशान न होना पड़े।

प्रदेश में सरकारी क्षेत्र में छह मेडिकल कॉलेज हैं। यहां से निकलने वाले डॉक्टर पढ़ाई करने के बाद अच्छे पैकेज के लालच में पलायन कर रहे हैं। जुर्माने का प्रावधान होने के बावजूद वे प्रदेश में नहीं रहना चाहते। डॉक्टर प्रदेश में ही रुकें, इसके लिए सशर्त दाखिले के साथ बेहतर पैकेज देने चाहिए। इससे प्रदेश से चिकित्सकों का पलायन भी रुकेगा और संस्थानों में इनकी कमी का सामना भी नहीं करना पड़ेगा। चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए त्वरित कदम उठाने होंगे, ताकि बिलासपुर एवं चंबा जैसी स्थिति का सामना न करना पड़े।

डॉक्टरों की कमी की समस्या पूरे देश में है। विश्व स्वास्थ संगठन के मुताबिक देश में एक हजार मरीजों पर एक डॉक्टर की जरूरत है। अभी यह अनुपात 1:1499 है। देश में हर साल करीब 80 हजार डॉक्टर मेडिकल कॉलेज से निकल रहे हैं। इसके बावजूद यह अनुपात हासिल करना आसान नहीं है। आंकड़ों की मानें तो अभी देश को 4.3 लाख डॉक्टरों की और जरूरत है।

शिमला आने वाले पर्यटकों के लिए खुशखबरी, 31 दिसंबर को खुलेंगे प्रतिबंधित मार्ग

डॉक्टरों की कमी हर भौगोलिक क्षेत्र में बराबर नहीं है। जहां महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब में एक हजार मरीजों पर एक से ज्यादा डॉक्टर उपलब्ध हैं, वहीं बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्थिति बेहद खराब है। अभी जिस रेट से मेडिकल कॉलेज से डॉक्टर निकल रहे हैं उसके हिसाब से विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य तक पहुंचने में बिहार जैसे राज्य को 56 साल और लगेंगे। वहीं झारखंड को इस बेंचमार्क तक पहुंचने में 87 साल का वक्त लगेगा। केद्र व राज्य सरकारों को डॉक्टरों की इस कमी को दूर करने के लिए तत्काल उपाय करने चाहिए, ताकि लोगों को स्वास्थ्य के मोर्चे पर मुश्किलों का सामना न करना पड़े।

हिमाचल में बनाया गया दामाद संघ जिसका नाम भी अनोखा है और काम भी

 

Posted By: Babita kashyap

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस