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    हिमाचल: गाद में गुम होने लगा बीएसएल प्रोजेक्ट, बिजली उत्पादन भी प्रभावित, 50 प्रतिशत तक कम हुई दो बांधों की भंडारण क्षमता

    By Jagran News Edited By: Rajesh Sharma
    Updated: Sun, 30 Nov 2025 01:20 PM (IST)

    हिमाचल प्रदेश में बीएसएल परियोजना गाद की समस्या से जूझ रही है, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित हो रहा है। दो बांधों की भंडारण क्षमता 50% तक कम हो गई है। गाद जमा होने से पानी का बहाव कम हुआ है, जिससे टर्बाइनों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। अगर इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो परियोजना पर खतरा मंडरा सकता है।

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    जिला मंडी में बीएसएल प्रोजेक्ट के जलाशय में भरी गाद। जागरण

    हंसराज सैनी, मंडी। ब्यास-सतलुज लिंक (बीएसएल) परियोजना, जिसने 1977 से बिजली और सिंचाई का बड़ा स्तंभ बनकर उत्तर भारत की ऊर्जा रीढ़ को मजबूती दी थी, आज गाद की समस्या से जूझ रही है। पंडोह बांध से लेकर सुंदरनगर संतुलन जलाशय तक भंडारण क्षमता 50 प्रतिशत तक रह गई है। 

    स्थिति यह है कि कभी सुंदरनगर जलाशय से एक ड्रेजर से होने वाली गाद निकासी अब तीन ड्रेजर के बावजूद भी नहीं हो रही। 80 करोड़ रुपये का कैचमेंट ट्रीटमेंट प्लान वर्षों से फाइलों में दफन है। वन विभाग को अब तक बीबीएमबी ने पैसा नहीं दिया है। 

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    डैहर पावर हाउस की टरबाइन व उपकरण तक असुरक्षित हुए

    कैचमेंट क्षेत्र में भूमि कटाव रोकने के लिए पौधारोपण प्रस्तावित था। नतीजा 990 मेगावाट क्षमता के डैहर पावर हाउस की टरबाइन और उपकरण तक असुरक्षित हो गए हैं। ब्यास सतलुज लिंक देश की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में गिनी जाती है। 

    4716 मिलियन घन मीटर ब्यास का पानी मिलता है सतलुज में

    मंडी जिले के पंडोह में मिट्टी, रोड़ी, चट्टान से बने डाइवर्ट बांध से होकर 40 किलोमीटर लंबी जल वाहक प्रणाली के जरिये ब्यास नदी का पानी सतलुज से मिलता है। दो सुरंगों और एक ऊंची खुली नहर के बाद डैहर पावर हाउस में 320 मीटर हेड से 990 मेगावाट बिजली उत्पादन होता है। हर वर्ष 4716 मिलियन घन मीटर ब्यास का पानी सतलुज में मिलने से भाखड़ा, गंगुवाल और कोटला प्रोजेक्ट की क्षमता भी बढ़ती है। यही पानी पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की विशाल सिंचाई व्यवस्था को भी संभालता है। 

    पंडोह बांध में पहुंचती है गाद

    जून से अक्टूबर तक ब्यास नदी अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर पंडोह बांध तक पहुंचती है। 5,278 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र में वन, ढलानदार जमीन, टूटने वाला ग्रेनाइट व अन्य प्रकार की चट्टानें बड़े पैमाने पर अवसाद पैदा करती हैं।

    जम जाते हैं मोटे कण और पत्थर 

    पंडोह तक नदी की ढलान कम होने से मोटे कण और पत्थर यहां जम जाते हैं। बांध में सिल्ट एक्सक्लूडर न होने के कारण शुरू के केवल नौ वर्षों में ही डेड स्टोरेज क्षेत्र गाद से पूरा भर गया था। आज स्थिति उससे बदतर है। 

    395 हेक्टेयर क्यूबिक मीटर गाद करती है जलाशय में प्रवेश

    परियोजना के शुरुआती वर्षों में हुए अध्ययन के अनुसार सालाना करीब 395 हेक्टेयर क्यूबिक मीटर गाद जलाशय में प्रवेश करती है, जिसमें 15 प्रतिशत तल गाद भी शामिल है। इसमें कोर्स सिल्ट 18 प्रतिशत, मीडियम सिल्ट 13 प्रतिशत और फाइन सिल्ट एवं मिट्टी 69 प्रतिशत बारीक गाद का अधिकांश हिस्सा स्पिलवे से निकल जाता है, जबकि मोटी-मध्यम गाद का करीब 33 प्रतिशत पंडोह बाईपास सुरंग से बहकर आगे निकलता है। बाकी गाद जलाशय में जमा होती है, जो स्टोरेज क्षमता लगातार कम कर रही है।

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