पानीपत, जेएनएन। सेक्टर 29, पार्ट-2, जहां डाई हाउस लगे है। बेशक, धागे और कपड़े को मनचाहे रंगों में तब्दील कर देने वाली इन फैक्ट्रियों की बदौलत पानीपत का टेक्सटाइल उद्योग दुनियाभर में मशहूर हो रहा है, पर इसके साथ-साथ ही एक काला अध्याय भी जुड़ रहा है। ये अध्याय है जल को जहर बनाने का। सवाल इन उद्योगों से लेकर सरकार तक पर उठ रहे हैं। आज अगर नहीं संभले तो आने वाले पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी। 

दैनिक जागरण इस सेक्टर के पग-पग को नापा। ऐसी तस्वीरें सामने आईं कि दिल अंदर से सिहर उठा। आइये, आप भी आज ही जानिये, किस तरह धरती में जहर घोला जा रहा है। जागरण की ये पहल इसलिए, ताकि आप आवाज उठा सकें। 

रोज 20 हजार लीटर रंगीन पानी नाली में बहा दिया जाता है
नालियों में कहीं हरा और कहीं पीला तो कहीं काला पानी बहता दिखाई दिया। यहां बातचीत में पता चला कि ट्यूबवेल नंबर एक के पास कई डाई हाउसों का पानी एक प्लॉट में जमा होता है।  पास ही में प्लॉट से पाइप के सहारे नालियों में काले रंग का पानी गिर रहा था। बाइक रोक कर एक-एक लीटर की दो बोतलों में भर लिया। उत्तर प्रदेश शाहजहांपुर के वर्कर रामू और पश्चिम बंगाल के आसिफ ने बताया कि एक फैक्ट्री से औसतन 10 से 20 हजार लीटर दूषित पानी नालियों में बहा दिया जाता है। जिस उद्योग में हम रंगाई करते हैं, वहां का पानी पीने लायक नहीं है। 

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डाई हाउस मेंं तेजाब युक्‍त पानी।   

यकीन नहीं होता कि ये ग्रीन बेल्ट है, पेड़ सूखते ही जा रहे
सेक्टर 29 पार्ट-2 की मुख्य सड़क पर वापस लौटे। ग्रीन बेल्ट में गुलाबी रंग का पानी भरा देखा। पेड़ों के नाम पर सूखी टहनियां ही नजर आईं। वहीं नजदीक झोपड़ी दिखाई दी। बरेली का श्यामवीर वहां रहता है। उससे इस बदरंग पानी के बारे में पूछा तो बोला कि डाई हाउस वाले छोड़ देते हैं। आप शायद नए आए हैं यहां पर। ये तो पूरे शहर को पता है। अगर हम नहीं जागे तो दुनिया के लिए छोड़ जाएंगे काला पानी। कभी स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेज अंडमान में काला पानी की सजा पर भेज देते थे। कल आजाद नागरिक काला पानी पीने को मजबूर होंगे।

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सड़क किनारे भरा केमिकल युक्‍त पानी।

अर्जुननगर, काबड़ी रोड 
शाम के पौने चार हो चुके थे। काबड़ी रोड से अर्जुन नगर की तरफ जाने लगे। दादा खेड़ा से आधे किलोमीटर की दूरी पर एक प्लॉट में रंगीन गंदा पानी जमा देखा। उसके किनारे बुजुर्ग बलवंत सिंह, तेजा सिंह, रणजीत सिंह, राजपाल शर्मा व सरदार गुरमेज सिंह ताश की चौकड़ी लगाए बैठे थे। बाइक रोक कर उनसे पूछा, अंकलजी ये गंदा पानी कैसा है। बुजुर्ग कहने लगे, सामने डाई हाउस का है। इससे सभी परेशान हैं। एनजीटी वालों को यहां तक बुलाओ। तभी बात बनेगी। चिमनी के धुएं से कपड़े काले हो जाते हैं। फैक्ट्री मालिक को जब कहने जाता हूं तो कुछ न बिगड़ने की बात कह कर चलता कर देते हैं। दीवारों में जो छेद दिख रहा है, रात के अंधेरे में उससे पानी निकालते हैं। इस वजह से जमीन का पानी भी खराब होता जा रहा है। 

बरसत मोड़ से चंदौली की तरफ, तेजाबी पानी सीधे ड्रेन में डालते हैं
इस रास्ते पर आधे किलोमीटर की दूरी पर फटे पुराने रंगीन कपड़े को ब्लीच करने का काम चल रहा था। एक किशोर हौदी में कपड़े डाल रहा था। पास में नीले रंग के ड्रम में रखे तेजाब की तरफ इशारा कर उस किशोर ने बताया कि एक हौदी में तीन बाल्टी (45 लीटर) यह भी मिला देते हैं। 10 से 15 किलो ब्लीचिंग अलग से डालते हैं। कपड़ा सफेद होने के बाद उसे रुई बनाने के लिए दूसरी फैक्ट्री में ले जाते हैं। इस सब प्रक्रिया के बाद खराब पानी का क्या होता है, इस सवाल पर ड्रेन नंबर दो की तरफ इशारा करते हुए बताया कि वहां बहा देते हैं। 

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ड्रेन में खुलेआम डाल देते हैं दूषित पानी, सात मिनट में टैंकर खाली
ब्लीचिंग हाउस से लौटते समय हमारी नजर एक टैंकर पर पड़ी। पास के अलीपुरा गांव से बेडशीट की रंगाई के बाद दूषित पानी भरकर चालक इसे ड्रेन नंबर-2 में छोड़ने लाता है। चालक ने बतया कि उसे 12 हजार रुपये तनख्वाह मिलती है। ढाई किलोमीटर दूर से एक टैंकर में 16000 लीटर पानी लेकर आता है। महज सात मिनट में टैंक खाली कर चला जाता है। एक दिन में औसतन दो बार आता है। धुलाई के इस दूषित जल से नुकसान के बारे में कुछ पता नहीं है। गांव वाले कहते हैं कि ये जहरीला होता है। सैंपल लेने के बाद हम काबड़ी रोड की तरफ रवाना हो गए।

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Edited By: Anurag Shukla