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    Maalik Review: गन्स एंड गुलाब्स के बाद फिर राजकुमार ने हाथ में उठाई बंदूक, इस बार गैंगस्टर बनकर हिट या फ्लॉप?

    Updated: Fri, 11 Jul 2025 04:26 PM (IST)

    Maalika Review गंस एंड गुलाब्स की रिलीज के एक लंबे समय बाद राजकुमार राव एक बार फिर से गैंगस्टर बनकर पर्दे पर छाने की तैयारी में हैं। उनकी फिल्म मालिक शुक्रवार को थिएटर में रिलीज हो चुकी है। क्या है इस फिल्म की कहानी और क्यों बॉक्स ऑफिस का मालिक बनना डिजर्व करते हैं राजकुमार राव नीचे पढ़ें फिल्म का पूरा रिव्यू

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    राजकुमार की मालिक का रिव्यू/ फोटो क्रेडिट- Instagram

    प्रियंका सिंह, मुंबई। पिछले कुछ समय से बाक्स ऑफिस पर मारधाड़ और हिंसा से भरपूर फिल्मों की संख्या बढ़ी है। आगामी दिनों में भी कई ऐसी फिल्में आएंगे। इसी में शामिल पुलकित निर्देशित फिल्म मालिक रिलीज हो गई है।

    कैसे एक खेत जोतने वाला बनता है फिल्म में मालिक?

    कहानी पिछली सदी के आठवें दशक के इलाहाबाद में रखी गई है। किसान बिंदेश्वर (राजेंद्र गुप्ता) जब अपने बेटे दीपक (राजकुमार राव) को मालिक के पैर छूने के लिए कहता है, जिसके खेत को जोतकर वह फसल उगाता है, दीपक मनाकर देता है। वह मालिक पैदा नहीं हुआ, लेकिन बनना चाहता है। उसके पिता की फसल को जब शंकर सिंह उर्फ दद्दा (शंकर सिंह) के आदमी खराब करने के बाद उसे मारते है, तो दीपक दद्दा के पास पहुंचकर मदद मांगता है। दद्दा उसे अपनी मदद खुद करने के लिए कहता है।

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    वह दद्दा के आदमी को मार देता है। यहां से दीपक बन जाता है मालिक और अपराध की दुनिया में उतर जाता है। विधायक बल्हार सिंह (स्वानंद किरकिरे) से लेकर व्यापारी चंद्रशेखर (सौरभ सचदेवा) तक हर किसी की नाक में मालिक ने दम किया कर रखा है। 

    Photo Credit- Youtube

    मालिक को खत्म करने के लिए बल्हार तीन साल से सस्पेंडेड एसपी प्रभु दास (प्रोसेनजीत) की पोस्टिंग इलाहाबाद में करवाता है। जबकि मालिक तो विधानसभा का टिकट लेकर राजनीति में उतरने की तैयारी में है। आगे क्या-क्या होता है उसके लिए फिल्म देखनी होगी।

    शहंशाह के पोस्टर से लेकर मेकर्स ने इन चीजों पर दिया ध्यान

    फिल्म की कहानी, पटकथा और संवाद ज्योत्सना नाथ और पुलकित ने मिलकर लिखी है। कमजोर पिता के बेटे का बाहुबली बनना, इस पर कई फिल्में पहले भी बन चुकी हैं। ऐसे में कहानी के लिहाज से इसमें नयापन नहीं है, लेकिन पुलकित और ज्योत्सना ने दमदार सवांदों और चुस्त स्क्रीनप्ले से इसे मनोरंजक बनाया है। अस्सी का दशक एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन की फिल्मों के लिए जाना जाता है।

    Photo Credit- Youtube

    उस दौर को मालिक के अंदाज में दिखाने में पुलकित कामयाब होते हैं। राजकुमार और मानुषी के बीच रोमांटिक गाने को छोड़ दें, तो उनकी पकड़ निर्देशन पर फ्रेम की बारीकियों पर बनी रहती है। बीच-बीच में सिनेमाघरों का बाहर चिपके शहंशाह के पोस्टर और दीवारों पर उनकी फिल्मों के लिखे डायलॉग की मूंछें हो तो... उस दौर का सुर बनाए रखते हैं। हालांकि पुलकित दीपक के पात्र में गहराई से नहीं जाते हैं कि कमजोर परिवार से होने के बावजूद वह इतना निडर कैसे है।

    फुटबॉल खेलने वाला एक झटके में अपराधी बन जाता है और अपराध की दुनिया से बाहर आने की सोचता भी नहीं। पुलिस का पक्ष भी बेहद कमजोर है, जो केवल बाहुबली और विधायक के अनुसार चलती है। अनुज राकेश धवन का कैमरा वर्क कमाल है, खासकर एक्शन के दृश्यों में। अक्सर इस तरह की फिल्मों में हीरो की बार-बार हीरोइक एंट्री होती है, जिसमें म्यूजिक बजता है, स्लो मोशन होता है, इन चीजों से पुलकित बचते हैं।

    Photo Credit- Youtube

    यहां सरेंडर नहीं, कांड होते हैं..., मनोरंजन में हिंसा हो रही है... मालिक पैदा नहीं हुए तो क्या हुआ बन तो सकते हैं... जैसे कई सवांद हैं, जो नए और प्रभावशाली हैं। केतन सोढ़ा का बैकग्राउंड स्कोर मालिक को और स्टाइलिश बनाता है।

    गैंगस्टर बनकर छा गए राजकुमार राव

    राजकुमार राव का मालिकाना हक अभिनय पर बनता है। पहली बार वह गैंगस्टर के रोल में दिखे राजकुमार यकीन दिलाते हैं कि वह पानी की तरह है, जिस रंग और आकार में उन्हें ढालो वह ढल जाएंगे। मालिक के दोस्त बदौना के रोल में अंशुमन पुष्कर बेहतरीन काम करते हैं, अंत में चौकाएंगे में भी। अधकच्चे लिखे रोल को भी सौरभ शुक्ला, सौरभ सचदेवा और स्वानंद किरकिरे सीमित दायरे में शिद्दत से परफॉर्म करते हैं। प्रोसेनजीत हमेशा की तरह प्रभावित करते हैं।

    उन्हें और हिंदी फिल्में करनी चाहिए। मानुषी छिल्लर को देखकर लगता है कि उन्होंने अपने अभिनय पर वाकई काम किया है। कम स्क्रीनस्पेस में भी वह याद रह जाती हैं। राजेंद्र गुप्ता का अनुभव नजर आता है, उन्हें और जगह मिलनी चाहिए थी।

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