मुंबई। मेरी जिंदगी में भी कई उतार-चढ़ाव आए। कई मौकों पर अकेलापन भी महसूस किया और उदास भी हुआ। लेकिन जब अकेलेपन या फिर अच्छा फील नहीं करता हूं तो मैं सड़कों पर निकल जाता हूं और लोगों को देखता हूं। फिर सोचा करता हूं मर्सीडीज़ जैसी कार में बैठकर भी क्या मायूस होना क्योंकि जब रेलवे स्टेशन पर सोया करता था तब मायूस नहीं हुआ तो अब क्यों। यह जीना भी क्या जीवन से हार कर। इसलिए लाइफ को डील करना आना चाहिए जिसके लिए एटीट्यूड जरूरी है। यह कहना है 500 से ज्यादा फिल्मों में अपने अभिनय कौशल से दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाले देश के प्रसिद्ध अभिनेता अनुपम खेर का। वे लाइट्स कैमरा एक्शन शो में जागरण डॉट कॉम के एंटरटेनमेंट एडिटर पराग छापेकर से बातचीत में अपने फिल्मी सफर और जीवन के बारे में बात कर रहे थे। 

अनुपम ने आगे बताया कि 35 साल हो गए हैं इंडस्ट्री में और कई उतार-चढ़ाव आए। कुछ जगहों पर कामयाब रहा कुछ में नहीं। हर सिच्वेशन के दो पहलू होते हैं 50 फीसदी सक्सेस और 50 फीसदी फेल्योर। लोग फेल्योर के डर से सक्सेस की तरफ नहीं जाते। इसलिए मैं 50 फीसदी सक्सेस के बारे में सोचता हूं और आगे बढ़ता हूं। यह समझना जरूरी है कि फेल्योर एक इवेंट है न कि कोई व्यक्ति।

अपनी फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर को लेकर अनुपम ने कहा कि, जब मेरे पास यह स्क्रिप्ट डायरेक्टर ने सुनाई थी तब मेरा पहला रिएक्शन था कि नहीं करना है। क्योंकि किताब कंट्रोवर्सी में रही और मैं एक अलग फेज से गुजर रहा था। लेकिन टीवी पर एक दिन डॉ. मनमोहन सिंह जी को चलते हुए देखा। तो कोशिश की। मैं इतना कह सकता हूं कि अभी तक कि जितनी भी फिल्में की हैं उनसे से सबसे ज्यादा मेहनत इस फिल्म के लिए की है। 

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Posted By: Rahul soni

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