टिहरी, जेएनएन। टिहरी गढ़वाल संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव में भाजपा की माला राज्य लक्ष्मी शाह जीत नेे तीसरी बार जीत दर्ज की है। उन्होंने कांग्रेस के प्रीतम सिंह को  300586 वोटों से हराया। 

टिहरी गढ़वाल संसदीय सीट पर हुए लोकसभा चुनाव में एकबार फिर से राजशाही परिवार का दबदबा देखने को मिला है। इस सीट पर भाजपा की माला राज्य लक्ष्मी शाह जीत की हैट्रिक लगाने जा रही हैं। आपको बता दें रात दस बजे तक उन्हें 554431 वोट मिले, जबकि प्रीतम सिंह जो वर्तमान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हैं उन्हें 261041 वोट पड़े हैं।  

पारिवारिक पृष्ठभूमि 

माला राज्य लक्ष्मी शाह का जन्म 23 अगस्त 1950 में नेपाल के काठमांडू में हुआ। उनके पिता का नाम स्वर्गीय अर्जुन एसजेबी राणा और मां का नाम रानी बिंदु देवी राणा है। शाह ने इंटरमीडिएट तक की शिक्षा ग्रहण की है। सात फरवरी 1973 को उनका विवाह टिहरी नरेश मनुजेंद्र शाह के साथ हुआ। जिसके बाद से ही वे टिहरी में बस गईं।     

राजनीतिक सफर 

भाजपा की माला राज्य लक्ष्मी शाह ने साल 2012 में टिहरी सीट पर हुए उपचुनाव में जीत हासिल की थी। इसके बाद उन्होंने साल 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साकेत बहुगुणा को हराकर जीत दर्ज की थी। वहीं, 1 सितंबर, 2014 के बाद से सदस्य वे महिला सशक्तिकरण समिति की सदस्य रहीं। इसके साथ ही उन्होंने रक्षा संबंधी स्थायी समिति के सदस्य का जिम्मा भी उठाया। शाह परामर्शदात्री समिति, पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश के शासी निकाय की सदस्य भी रही हैं। उन्हें उत्तराखंड निर्माण के बाद संसद की पहली महिला सदस्य बनने का गौरव भी हासिल है।

लोकशाही में राज परिवार की धमक 

उत्तरकाशी की नेलांग घाटी (ट्रांस हिमालय) से लेकर देहरादून के तराई तक के 14 विस क्षेत्रों को खुद में समेटे टिहरी सीट की सियासत का इतिहास भी कम रोचक नहीं है। टिहरी रियासत के भारत में विलय के बाद यहां की सियासत की धुरी में राजशाही का ही वर्चस्व रहा है। साफ है कि राजशाही खत्म होने के बाद टिहरी राजघराने ने लोकशाही में भी रुतबा कायम किया। यही नहीं, सियासी दलों के लिए भी राज परिवार एक प्रकार से खेवनहार की तरह रहा है। यही कारण भी है कि टिहरी सीट की सियासत हमेशा ही राज परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। 

राजशाही परिवार का हमेशा ही रहा खास प्रभाव 

टिहरी राजपरिवार का हमेशा से ही टिहरी संसदीय क्षेत्र में खासा प्रभाव देखा गया है। चाहे वह सदस्य कांग्रेस में रहे हों या भाजपा में, अधिकांश बार जीत इसी राजपरिवार की झोली में गिरी है। आजादी के बाद से 1971 से पूर्व हुए चार चुनावों में इस संसदीय सीट पर इसी परिवार राजपरिवार के सदस्य काबिज रहे। 1971 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े परिपूर्णानंद पैन्यूली ने लगातार तीन बार कांग्रेस के टिकट से चुनाव जीत चुके निर्दलीय महाराजा मानवेंद्र शाह को शिकस्त दी थी। 

इन चुनावों के बाद 1991 तक हुए चार चुनावों में राज परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ा। 1991 में मानवेंद्र शाह ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद वह 2004 तक लगातार पांच बार सीट पर काबिज रहे। उनकी मृत्यु के बाद 2007 में हुए चुनाव में कांग्रेस के विजय बहुगुणा ने शाही परिवार के मनुजयेंद्र शाह को हरा कर इस सीट पर कब्जा किया। 2009 में राजपरिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ा। 2012 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने राजपरिवार की महारानी राज्यलक्ष्मी शाह को चुनाव में उतारा और उन्होंने इस सीट पर जीत हासिल की है। वे इस सीट पर जीतने वाले दूसरी महिला प्रत्याशी बनीं।

यह रहे शाही सांसद

1951- कमलेंदुमति शाह, निर्दलीय

1957- मानवेंद्र शाह, कांग्रेस

1962 - मानवेंद्र शाह, कांग्रेस

1967 - मानवेंद्र शाह, कांग्रेस

1991 - मानवेंद्र शाह, भाजपा

1996 - मानवेंद्र शाह, भाजपा

1998 - मानवेंद्र शाह, भाजपा

1999 - मानवेंद्र शाह, भाजपा

2004 - मानवेंद्र शाह, भाजपा

2012 - राज्य लक्ष्मी शाह, भाजपा

2014- राज्य लक्ष्मी शाह, भाजपा

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Posted By: Raksha Panthari

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