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    UP Lok Sabha Election 2024: ‘रक्षा मंत्री’ न ‘जनरल’, अब दांव पर साख, भाजपा लगाएगी चौका या विपक्ष रोक पाएगा विजय रथ?

    Updated: Wed, 24 Apr 2024 12:10 PM (IST)

    Ghaziabad Lok Sabha Election 2024 गाजियाबाद से इस बार मैदान में न तो ‘रक्षा मंत्री’ और न ही ‘जनरल’। सवाल यह है कि यूपी के सियासी द्वार पर भाजपा जीत का चौका लगाएगी या फिर विजय की हैट्रिक थम जाएगी? क्षत्रिय विरोध के सुरों के बीच कांग्रेस और बसपा भी पूरी ताकत झोंके हैं। मुकाबला त्रिकोणीय है और मतदाताओं को साधने के लिए प्रत्याशियों के पास अलग-अलग मुद्दे भी हैं।

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    Lok Sabha Election: 2014 और 2019 के चुनाव में भाजपा के जनरल वीके सिंह गाजियाबाद से जीते थे।

    आदित्य, गाजियाबाद। Ghaziabad Lok Sabha Election 2024:  गाजियाबाद एक तरफ एयरपोर्ट, देश की पहली नमो भारत ट्रेन, मेट्रो और दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर विकास की उड़ान भरता दिखता है तो दूसरी तरफ वायु प्रदूषण, हरनंदी की सफाई और उड़ान सेवा न होने के मुद्दे भी यहां खूब गूंजते हैं।

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    वैसे राजनगर एक्सटेंशन के अंकित गुप्ता का दर्द बहुत कुछ कहता है। वह कहते हैं कि प्रदूषण की समस्या से अब तक कोई भी जनप्रतिनिधि या सरकार हमें निजात नहीं दिला सकी। सर्दियों में तो यहां सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। निस्तारण के नाम पर कूड़े के पहाड़ राजनगर एक्सटेंशन से कुछ दूरी पर बना दिए गए। लाखों और करोड़ों रुपये में फ्लैट खरीदने वाले इनकी बदबू से परेशान हैं।

    अंकित को रोकते हुए वहां मौजूद दीपक कहते हैं- 'आप सही कह रहे हैं, लेकिन जितनी सुविधाएं पिछले 10 साल में गाजियाबाद को मिलीं और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।’ वसुंधरा के विक्रम को यह बात सालती है कि देश के सबसे बड़े विधानसभा क्षेत्र में एक भी सरकारी अस्पताल नहीं है। मजबूरी में इलाज के लिए लोगों को निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है।

    ये हैं प्रत्याशी

    भाजपा ने गाजियाबाद से ही अपने वर्तमान विधायक अतुल गर्ग को मैदान में उतारा है। वहीं, कांग्रेस ने ब्राह्मण चेहरा डॉली शर्मा पर भरोसा जताया है। डॉली 2019 में भी इसी सीट से मैदान में उतरी थीं। वहीं, बसपा ने पहले अंशय कालरा को मौका दिया था, लेकिन बाद में बदलाव करते हुए क्षत्रिय समाज के नंद किशोर पुंडीर को मौका दिया।

    भाजपा की हैट्रिक

    पिछले चुनावों पर नजर डालें तो 2009 में यहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह जीते थे। इसके बाद वर्ष 2014 और 2019 में भाजपा प्रत्याशी जनरल वीके सिंह को जनता ने चुनकर संसद भेजा। राजनाथ व वीके सिंह दोनों को केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पद भी मिले। इस चुनाव में भी सभी को उम्मीद थी कि भाजपा वीके सिंह को जीत की हैट्रिक लगाने का मौका देगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

    अब कुछ संगठन इसे क्षत्रियों को तवज्जो नहीं दिए जाने का मुद्दा भी बना रहे हैं। हालांकि, ऐसे संगठनों का अपना भी कोई खास वजूद नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यहां रोड शो कर चुके हैं तो राजनाथ सिंह चुनावी सभा। पीएम के रोड शो में वीके सिंह और अतुल गर्ग एक साथ जनता के बीच आए और एकजुटता का संदेश दिया।

    विश्वविद्यालय की दरकार

    विकास की दृष्टि से गाजियाबाद को बहुत कुछ हासिल है फिर यहां के लोगों को अभी बहुत कुछ की दरकार है। जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर से शहर विधानसभा क्षेत्र के विजय नगर में रहने वाले राजकुमार आर्य कहते हैं- 'गाजियाबाद को शिक्षा की नगरी निजी स्कूलों और कालेजों के कारण कहा जाता है, लेकिन विश्वविद्यालय की कमी आज भी यहां महसूस की जाती है। विजयनगर में तो एक भी सरकारी कालेज नहीं है।’

    खोड़ा के अनुपम भी यह कहने से नहीं चूकते कि 'दिल्ली से खोड़ा की सीमा के बीच में महज एक सड़क का फासला है, लेकिन सुविधाओं के मामले में जमीन और आसमान जैसा अंतर है। यहां पर पीने के लिए पानी तक उपलब्ध नहीं है। हर चुनाव में यहां पर गंगाजल की आपूर्ति करने का दावा कर वोट ले लिया जाता है, लेकिन मतदान के बाद जनप्रतिनिधि अपने वादे भूल जाते हैं।'

    जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर घोषित किया गया था जिला

    गाजियाबाद पहले मेरठ की तहसील हुआ करता था। 1976 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने पं. जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर इसे जिला घोषित किया था। देश की आजादी के बाद से वर्ष 2004 तक गाजियाबाद के लोग हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट पर अपना मतदान करते थे। वर्ष 2009 में गाजियाबाद लोकसभा सीट बना दी गई।

    इस संसदीय सीट में गाजियाबाद जिले की लोनी, साहिबाबाद, मुरादनगर, गाजियाबाद शहर के अलावा हापुड़ की धौलाना विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। औद्योगिक नगरी होने के कारण प्रदेश के अन्य जिलों की अपेक्षा यहां पर बसावट तेजी से हुई। गाजियाबाद में बाहर से आकर बसने वाले ज्यादातर लोग पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल, उत्तराखंड और बिहार के हैं।

    विधायकों के विरोध के बाद बदला गया टिकट

    वर्ष 2009 में अस्तित्व में आई गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा ने राजनाथ सिंह को प्रत्याशी बनाया। उन्होंने हारी हुई सीट पर भाजपा को जीत दिलाई। 2014 और 2019 के चुनाव में जनरल वीके सिंह को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया और उन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की, लेकिन पिछले दो वर्ष से वीके सिंह के विरोध में विधायक उतर गए थे।

    भाजपा में दो फाड़ हुई तो संगठन को एकजुट करने के लिए भाजपा ने 2024 के चुनाव में वीके सिंह का टिकट काटकर विधायक अतुल गर्ग को लोकसभा प्रत्याशी बना दिया। इसको लेकर क्षत्रिय समाज के कुछ लोगों में नाराजगी भी है। इसका असर चुनाव में दिख सकता है।

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    हापुड़-गाजियाबाद सीट पर रहा इन दलों का रहा दबदबा

    गाजियाबाद लोकसभा सीट अस्तित्व में आने से पहले यह हापुड़-गाजियाबाद संसदीय सीट थी। वर्ष 1957 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कृष्ण चंद शर्मा ने जीत हासिल की थी। इसके बाद कांग्रेस की ही कमला चौधरी ने जीत हासिल की थी। इसके बाद निर्दल प्रत्याशी प्रकाशवीर शास्त्री ने जीत हासिल की थी। इसके बाद कांग्रेस के ही बीपी मौर्य ने 1971 में जीत हासिल की थी।

    इसके बाद 1984 में कांग्रेस ने जीत का स्वाद चखा और केदारनाथ ने जीत हासिल की। 1989 में यह सीट फिर से कांग्रेस के हाथों से फिसल गई और जनता दल के केसी त्यागी ने जीत दर्ज की। इसके बाद लगातार चार बार भाजपा के रमेश चंद तोमर ने भाजपा का परचम लहराया। वर्ष 2004 में कांग्रेस ने बाजी मारी और सुरेंद्र प्रकाश गोयल चुनाव जीते। वर्ष 2009 में गाजियाबाद लोकसभा सीट अस्तित्व में आई और तब से भाजपा ने किसी और पार्टी के सिर पर जीत का सेहरा नहीं बंधने दिया है।

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    जातीय समीकरण

    गाजियाबाद में जातियां बहुत बड़ा मुद्दा नहीं लेकिन चुनाव में कुछ तो असर डालती ही हैं। यहां 18 प्रतिशत ब्राह्मण, 16 प्रतिशत वंचित वर्ग, 15 प्रतिशत ठाकुर व मुस्लिम, 12 प्रतिशत गुर्जर व 10 प्रतिशत वैश्य मतदाता हैं। इसके अलावा 15 प्रतिशत अन्य जातियों के वोटर हैं। इन्हीं जातीय समीकरणों को ध्यान में रखकर प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशी उतारे हैं। बसपा प्रमुख ने यहां अपनी जनसभा में इसी उद्देश्य से क्षत्रियों के असंतोष का मुद्दा उछाला और गुर्जर व मुस्लिमों को साधने का प्रयास किया। तीनों ही उम्मीदवारों के लिए जाति-समुदाय के आधार पर ही प्रचारक बुलाए जा रहे हैं।

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