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    वामपंथियों के पुराने गढ़ में TMC ने बनाया दबदबा, अब कमल खिलाने को बेताब भाजपा, इस हाई प्रोफाइल सीट में कौन मारेगा बाजी?

    Updated: Fri, 31 May 2024 05:01 PM (IST)

    Lok Sabha Election 2024 बंगाल की हाई प्रोफाइल सीट पर पिछली बार दूसरे नंबर पर रहने वाली भाजपा इस बार कमल खिलाने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है। इससे तृणमूल को कड़ी चुनौती मिल रही है। कभी वाममोर्चा का गढ़ रही इस सीट को फिर से हासिल करने के लिए माकपा भी पूरा जोर लगा रही है। ऐसे में ये सीट त्रिकोणीय मुकाबले का संकेत दे रही है।

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    Lok Sabha Election 2024: जादवपुर लोकसभा सीट दिग्गज नेताओं के प्रतिनिधित्व के कारण अपनी अलग पहचान रखती है।

    राजीव कुमार झा, कोलकाता। बंगाल की सबसे हाई प्रोफाइल सीटों में शामिल जादवपुर लोकसभा सीट दिग्गज नेताओं के प्रतिनिधित्व के कारण अपनी अलग पहचान रखती है। कोलकाता के दक्षिणी हिस्से में स्थित यह सीट वामपंथियों का सबसे मजबूत गढ़ था। यहां स्थित देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में शामिल जादवपुर विश्वविद्यालय घोर वामपंथी छात्र संघों का भी मजबूत गढ़ और वाम समर्थित छात्रों के आंदोलन के लिए चर्चित रहा है।

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    इस सीट से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और पूर्व गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्त जैसे कद्दावर वामपंथी नेता सांसद रहे हैं। राज्य की वर्तमान मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने भी इसी सीट से अपना संसदीय जीवन शुरू किया था। 1984 के आम चुनाव में ममता ने इस सीट से दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबको चौंका दिया था और पहली बार लोकसभा पहुंची थीं। ममता तब कांग्रेस में थीं।

    अगले चुनाव में मिली हार

    हालांकि, 1989 में अगले चुनाव में इस सीट पर जादवपुर विश्वविद्यालय की ही प्रोफेसर मालिनी भट्टाचार्य ने ममता को हराकर यहां से उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया था। ममता के नेतृत्व में 2011 में राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन और 34 साल लंबे वाममोर्चा शासन के खात्मे से पहले 2009 में वामपंथियों का यह किला ढह गया था। 2009 से इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है।

    ममता की आंधी में 2011 के विधानसभा चुनाव में जादवपुर विस सीट से तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य तक हार गए थे। पिछले तीन लोकसभा चुनावों से तृणमूल यहां जीत का हैट ट्रिक लगा चुकी है। जादवपुर से वर्तमान सांसद अभिनेत्री मिमी चक्रवर्ती हैं। हालांकि, तृणमूल ने इस बार उनका टिकट काटकर अभिनेत्री व पार्टी की युवा इकाई की राष्ट्रीय अध्यक्ष सायोनी घोष को मैदान में उतारा है।

    तृणमूल के लिए आसान नहीं लड़ाई

    भाजपा ने डॉ. अनिर्बान गांगुली को उतारा है, जो पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। वह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के भी अध्यक्ष हैं और उनकी अच्छी छवि है। माकपा की तरफ से सृजन भट्टाचार्य मैदान में हैं। इस बार तृणमूल के लिए यहां लड़ाई आसान नहीं है।

    पिछली बार यहां वामपंथियों को पीछे छोड़ दूसरे नंबर पर रहने वाली भाजपा इस सीट पर कमल खिलाने के लिए जीतोड़ मेहनत कर रही है। वामपंथियों के इस पुराने गढ़ में कभी कमजोर दिखने वाली भाजपा ने पिछले कुछ चुनावों में वोट शेयर बढ़ाकर अपनी स्थिति को मजबूत किया है। इससे तृणमूल को कड़ी चुनौती मिल रही है।

    माकपा भी लगा रही पूरा जोर

    कभी वाममोर्चा के गढ़ के रूप में पहचाने जाने वाली इस सीट को फिर से हासिल करने के लिए माकपा भी पूरा जोर लगा रही है। ऐसे में ये सीट तृणमूल, भाजपा व माकपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबले का संकेत कर रही है। आईएसएफ से भी यहां एडवोकेट नूर आलम मैदान में हैं।

    तृणमूल का बिगड़ सकता है गणित

    इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का वर्चस्व है। हिंदीभाषी मतदाता भी अच्छी तादाद में हैं। आईएसएफ और एसयूसीआई (सी) जैसी पार्टियां यहां मुकाबले को बहुकोणीय बना रहीं हैं। आईएसएफ की एंट्री से तृणमूल के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगने के आसार हैं। नौशाद सिद्दीकी भांगड़ से आइएसएफ विधायक हैं, जो जादवपुर लोस क्षेत्र में आता है।

    माकपा, आईएसएफ और एसयूसीआई की नजर मुस्लिम वोटों पर है। मुस्लिम वोट बंटने पर तृणमूल का गणित बिगड़ सकता है। भाजपा के उम्मीदवार यहां तीन कारकों पर भरोसा कर रहे हैं। पहला हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण, दूसरा सत्ता विरोधी लहर और तीसरा मुस्लिम वोटों में विभाजन।

    जादवपुर का चुनावी इतिहास

    वर्ष 1951 में पहले आम चुनाव में यह सीट कलकत्ता दक्षिण पश्चिम के तौर पर जानी जाती थी। 1951 में कांग्रेस के असीम कृष्ण दत्ता विजयी हुए थे। 1957 में निर्दलीय उम्मीदवार बीरेन राय विजयी हुए थे, लेकिन इसके बाद भाकपा के इंद्रजीत गुप्त ने 1960 और 1962 में जीत दर्ज की। 1967 में इस लोस क्षेत्र का नाम अलीपुर हो गया। 1967 और 1971 में भी इंद्रजीत गुप्त जीते। वे इस सीट से लगातार चार बार सांसद बने।

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    साल 1977 में इस सीट का नाम फिर बदलकर जादवपुर हो गया। 1977 और 1980 में माकपा के सोमनाथ चटर्जी ने जीत दर्ज की। 1984 में बड़ा उलटफेर करते हुए ममता बनर्जी ने सोमनाथ को हराकर यहां से जीत दर्ज की। 1989 में ममता को माकपा की मालिनी भट्टाचार्य के हाथों हार मिली। 1996 में कांग्रेस की कृष्णा बोस विजयी हुईं। फिर 1998 और 1999 में कृष्णा तृणमूल के टिकट चुनी गईं। 2004 में माकपा ने यह सीट फिर से जीत ली। माकपा के सुजन निर्वाचित हुए, लेकिन 2009 में तृणमूल ने फिर से यह सीट जीत ली। तब से उसका कब्जा है।

    सात में से छह विधानसभा सीटों पर TMC का कब्जा

    जादवपुर संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत सात विधानसभा सीटें हैं। इनमें दो (जादवपुर व टालीगंज) कोलकाता में है, जबकि बाकी पांच विधानसभा सीटें बारुईपुर पूर्व और पश्चिम, सोनारपुर उत्तर एवं दक्षिण और भांगड़ दक्षिण 24 परगना जिले में हैं। इसमें भांगड़ में आइएसएफ को छोड़कर बाकी छह विधानसभा सीटों पर तृणमूल का कब्जा है।

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