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विकास गुसाईं, देहरादून। उत्तराखंड में आने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो चुकी है। प्रदेश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बसपा इस बार सपा के साथ मिलकर चुनावी मोर्चे पर है। उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद अभी तक तीन लोकसभा चुनावों में बसपा को ठीकठाक वोट मिला है। हालांकि, नैनीताल व हरिद्वार सीटों पर पार्टी का प्रदर्शन खासा बेहतर रहा है। राजनीतिक विश्लेषक भले ही मुख्य मुकाबला भाजपा व कांग्रेस के बीच मानकर चल रहे हैं, लेकिन वे यह भी मान रहे हैं कि अगर बसपा के हाथी की चाल थोड़ी भी बदली तो यह किसी भी सियासी दल के वोट की फसलों को आसानी से रौंद सकता है। हालांकि इसका नुकसान भाजपा से ज्यादा कांग्रेस को होने की संभावना है क्योंकि राज्य में बसपा और कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक लगभग एक ही है। 

उत्तराखंड राज्य गठन के बाद 2019 में चौथी बार लोकसभा के चुनाव होंगे। लोकसभा चुनावों में उत्तराखंड में अभी तक कांग्रेस व भाजपा के बीच ही सीधी टक्कर रही है। केवल वर्ष 2004 में हुए लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ने हरिद्वार लोकसभा सीट पर जीत दर्ज की थी। यह समाजवादी पार्टी की प्रदेश में अभी तक चुनावों में एकमात्र जीत भी है। 

देखा जाए तो बसपा उत्तराखंड में पिछले दो दशक से सक्रिय है। राज्य गठन के बाद बसपा ने जिस तरह से अपनी पैठ बनाई, उससे वह निर्विवाद रूप से प्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनने में सफल रही है। लोकसभा व विधानसभा चुनावों में पार्टी ने दमदार प्रदर्शन किया है। भले ही वह प्रदेश में कोई भी लोकसभा चुनाव न जीत पाई हो लेकिन हर बार हरिद्वार व नैनीताल लोकसभा सीटों पर मुकाबले में तीसरे स्थान पर रही है। अन्य सीटों पर भी बसपा का प्रदर्शन अन्य के मुकाबले बेहतर रहा है। 

इस बार बसपा व सपा ने प्रदेश में चुनाव एक साथ लडऩे का निर्णय लिया है। बसपा हरिद्वार, नैनीताल, टिहरी व अल्मोड़ा सीट पर चुनाव लड़ेगी तो पौड़ी सीट पर सपा अपना प्रत्याशी उतारेगी। सपा की कम सीटों पर लडऩे के लिए हामी भरने की वजह उत्तराखंड आंदोलन के दौरान बनी उसकी नकारात्मक छवि है, जिससे वह अभी तक उबर नहीं पाई है। इसके अलावा सांगठनिक ढांचे के लिहाज से भी सपा की स्थिति बसपा के मुकाबले खासी कमजोर है। यही कारण है कि वह प्रदेश में अभी बसपा के पीछे खड़ी है। बसपा ने फिलहाल हरिद्वार, नैनीताल व अल्मोड़ा से अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं जबकि टिहरी से घोषित करना शेष है। 

कांग्रेस भी बसपा के इस वोट बैंक की ताकत को समझती है और यही कारण भी है कि वह लगातार इस पर सेंध मारने का प्रयास कर रही है। हाल ही में कांग्रेस बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व प्रदेश प्रभारी को अपने पाले में लाने में सफल हो चुकी है। दरअसल, हरिद्वार व नैनीताल, मैदानी भूगोल वाली इन सीटों पर अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक वोटर खासी संख्या में हैं। इस वोटर समूह को सपा, बसपा के साथ ही कांग्रेस का भी समर्थक माना जाता है। अब अगर मतदाताओं का यह तबका बंटता है तो इसका लाभ सपा-बसपा गठबंधन को होना तय है, जबकि नुकसान में कांग्रेस रहेगी। 

पिछले तीन लोकसभा चुनावों में बसपा को मिले मत प्रतिशत पर नजर डालें तो वर्ष 2004 में पार्टी को कुल 6.75 फीसद वोट मिले थे। इनमें हरिद्वार संसदीय सीट पर 13 प्रतिशत वोट लेकर बसपा दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि नैनीताल में पार्टी को 8.24 फीसद वोट मिला। वर्ष 2009 के चुनावों में बसपा को 15.24 फीसद वोट मिले। इन चुनावों में बसपा को हरिद्वार सीट पर 14 फीसद और नैनीताल में 19.04 फीसद वोट मिला। वर्ष 2014 के चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन में जरूर थोड़ी गिरावट आई। मोदी लहर में बसपा को प्रदेश में कुल 4.75 फीसद वोट मिले। इसमें भी हरिद्वार सीट में पार्टी को छह प्रतिशत और नैनीताल में तीन फीसद वोट मिला। 

बसपा का लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन 

वर्ष 2004 - 6.75 प्रतिशत 

वर्ष 2009 - 15.24 प्रतिशत 

वर्ष 2014 - 4.75 प्रतिशत 

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Posted By: Raksha Panthari

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