[रघुवर दास]। मैं अर्थशास्त्री हूं और न ही विज्ञानी। मैं कृषक और शिक्षक भी नहीं हूं। मैं हूं एक मजदूर, लेकिन पिछले 40 वर्षों से भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम करते हुए मैंने देखा और समझा है कि भारत को परम वैभवशाली राष्ट्र बनाने के लिए गांव-गरीब-किसान की जिंदगी में खुशहाली तथा विकास की नई सुबह का प्रस्फुटन आवश्यक है। केंद्र सरकार गांव-देहात, खेत-खलिहान और किसानों-मजदूरों के घरों में विकास की ऐसी रोशनी पहुंचाने के लिए ‘अहर्निशं सेवामहे’ यानी दिन-रात सेवा संकल्प के साथ काम कर रही है। कृषि हमारे देश की आत्मा है। कृषि ही हमारी संस्कृति एवं परंपरा का आधार है। हमारे त्योहार, रीति-रिवाज, खान- पान, रहन-सहन और उपासना पद्धतियों की जड़ें भी गांव-देहात तथा खेतों में ही समाई हुई हैं।

कहने को तो भारत गांवों-किसानों का देश है, लेकिन किसानों और ग्रामीणों की सेहत-सीरत और सूरत बदलने के लिए आजादी के बाद कुछ खास नहीं किया गया। आजादी के समय देश के आर्थिक विकास में कृषि का योगदान लगभग 50 प्रतिशत था जो अब घटकर 20 फीसद से नीचे आ गया है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सत्ताधीश और हुक्मरान कागज के खेतों पर कलम के हल चलाते रहे, स्याही से सिंचाई करते रहे, आश्वासनों के उर्वरक डालते रहे, किसान यूरिया के लिए लाठियां खाते रहे और नेता आंकड़ों की फसलें काटकर किसानों को भरमाते रहे। यदि कृषि क्षेत्र में व्यापक सुधार पहले ही हो गए होते तो आज किसानों की स्थिति कहीं बेहतर होती।

अन्नदाताओं को बिचौलियों के नागपाश से मिल गई मुक्ति

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से गांव-गरीब और किसानों के हालात तेजी से बदल रहे हैं। हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया है कि किसानों के जीवन में बदलाव अब एक सामूहिक दायित्व है। इस दायित्व पूर्ति की बुनियादी शर्त है किसानों की आजादी। नए कृषि कानूनों के बाद हमारे अन्नदाताओं को बिचौलियों के नागपाश से मुक्ति मिल गई है। अब वे अपनी उपज अपनी शर्तों पर मनमाफिक दाम पर कहीं भी बेच सकेंगे। यह युगांतकारी परिवर्तन है। स्थानीय मंडियां दलालों, माफियाओं की गिरफ्त में थीं, लेकिन अब कृषि उपज भी अन्य औद्योगिक उत्पादों की तरह एक देश-एक बाजार की अवधारणा से जुड़ जाएगी। इससे खेती में निजी निवेश बढ़ेगा, बुनियादी ढांचा सुधरेगा, कृषि अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और देश के आर्थिक विकास में कृषि क्षेत्र का योगदान बढ़ेगा। खेती ठीक नहीं हुई तो देश ठीक नहीं होगा, क्योंकि बिन खेती सब सून।

ई-ट्रेडिंग मंच उपलब्ध कराएगी सरकार

नए कृषि कानूनों में किसानों को अपनी उपज देश में कहीं भी बेचने के लिए निर्बाध अवसर और पर्याप्त इंतजाम मिलेंगे। किसानों को न तो कोई उपकर देना होगा, न ही माल ढुलाई का खर्च। सरकार किसानों को सुगम व्यापार के लिए ई-ट्रेडिंग मंच उपलब्ध कराएगी। किसान खरीदारों से सीधे जुड़ जाएंगे। फलस्वरूप दलाल और बिचौलिये बाहर हो जाएंगे और उन्हें मिलने वाला कमीशन किसानों को मिलने वाली कीमत से जुड़ जाएगा। कोई भी विवाद 30 दिन में स्थानीय स्तर पर सुलझाया जाएगा। इसके साथ ही किसानों को तीन दिन में भुगतान की व्यवस्था भी की गई है। इसके साथ ही किसानों के हितों के संरक्षण की भी पूरी व्यवस्था इन कानूनों में की गई है। बावजूद इसके कुछ किसान संगठन, विघ्नसंतोषी विपक्षी दलों तथा किसानों को बरसों से लूट रहे दलालों के बहकावे में आकर दिल्ली के इर्दगिर्द कथित आंदोलन कर रहे हैं। कोई आंदोलनकारी किसान नेता या विपक्ष का कोई ंनेता बदुवार यह नहीं कह पा रहा है कि कानूनों के किस प्रावधान से किसानों का नुकसान होगा।

किसानों के बीच विपक्षी पार्टियां फैला रहीं हैं झूठ

वहीं इन किसानों को उकसाने वाले विपक्षी दलों के झूठ और दुष्प्रचार पर भी गौर किया जाए। विपक्ष कह रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर अनाज की खरीद बंद हो जाएगी। यह बात कानून में कहां लिखी है? फिर जब तक देश में खाद्य सुरक्षा कानून लागू है और जन वितरण प्रणाली यानी पीडीएस की दुकानें चल रही हैं तब तक एमएसपी पर सरकारी खरीद बंद कैसे हो जाएगी? दूसरा झूठ यह है कि किसान बाहर उपज बेचेंगे तो मंडियां खत्म हो जाएंगी। सरकार कह रही है कि मंडियां रहेंगी। किसान को जहां उपयुक्त कीमत मिले वह वहां अपनी उपज बेचने के लिए स्वतंत्र हैं।

मोदी सरकार के खिलाफ चलाया जा रहा है अभियान

पूर्व प्रधानमंत्री और किसानों के बड़े नेता चौधरी चरण सिंह के अलावा आंदोलनरत किसान नेता राकेश टिकैत के पिता महेंद्र सिंह टिकैत जीवन भर किसानों को मंडियों की घेराबंदी से मुक्त कराने की मांग करते रहे, पर उनकी बात सुनी नहीं गई। अब मोदी जी ने इसे स्वीकार किया है तो उनके खिलाफ अभियान चलाया जा रहा है। खालिस्तानी झंडे भी लहराए जा रहे हैं। देश विरोधी कार्यों में संलिप्त रहे तत्वों और दिल्ली दंगों के अभियुक्तों की रिहाई की मांग की जा रही है। इसका किसानों और कृषि कानूनों से क्या लेना देना है?

आठ करोड़ किसानों को मिला पीएम फसल का लाभ

एक झूठ यह भी फैलाया जा रहा है कि अनुबंध खेती के चलते किसानों की जमीन चली जाएगी, लेकिन कानून में तो जमीन का उल्लेख ही नहीं है। अनुबंध तो सिर्फ उपज का होगा। जो सरकार साल दर साल कृषि उपज का समर्थन मूल्य बढ़ाकर उसे डेढ़ गुना कर चुकी है। जो सरकार साढ़े बाईस करोड़ किसानों को सॉइल हेल्थ कार्ड दे चुकी है। जो सरकार आठ करोड़ किसानों को पीएम फसल बीमा का लाभ दे चुकी है। पौने ग्यारह करोड़ किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि से लाभान्वित कर चुकी है, वह कैसे किसान विरोधी हो सकती है। इसके उलट जो राजनीतिक दल किसानों को केवल लॉलीपॉप दिखाते रहे और उन्होंने खेती-किसानी की बेहतरी के लिए जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया, वे किसान हितैषी कैसे हो सकते हैं? ऐसे में किसान स्वयं कृषि कानूनों को तार्किक रूप से समझने का प्रयास करें। केवल विरोध के लिए विरोध करना सही नहीं।

(लेखक भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हैं)

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