COP28 में ग्लोबल स्टॉकटेक पर नया दस्तावेज जारी, कोयले पर कठोर वहीं तेल और गैस पर अपनाया गया नरम रवैया
COP28 प्रेसीडेंसी ने सोमवार शाम ग्लोबल स्टॉकटेक (जीएसटी) पर एक नया दस्तावेज जारी किया है। इस दस्तावेज में जहां कोयले पर कड़ा रवैया अपनाया गया है वहीं तेल और गैस पर तुलनात्मक रूप से कुछ नरम रुख दिखाया गया है। साथ ही इस दस्तावेज में फोस्सिल फ्यूल के लिए फेज आउट या फेज डाउन दोनों ही शब्दों से परहेज किया गया है।

राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। COP28 प्रेसीडेंसी ने सोमवार शाम ग्लोबल स्टॉकटेक (जीएसटी) पर एक नया दस्तावेज जारी किया है। इस दस्तावेज में जहां कोयले पर कड़ा रवैया अपनाया गया है, वहीं तेल और गैस पर तुलनात्मक रूप से कुछ नरम रुख दिखाया गया है। साथ ही इस दस्तावेज में फोस्सिल फ्यूल के लिए 'फेज आउट' या 'फेज डाउन दोनों ही शब्दों से परहेज किया गया है, जिसे लेकर दुनिया के अनेक देशों ने नाराजगी जताई जा रही है।
आगे बढ़ने से पहले पहले समझ लेना चाहिए कि ग्लोबल स्टॉकटेक होता क्या है? दरअसल यह 2015 के पेरिस समझौते में स्थापित एक 5 वर्षीय समीक्षा है, जिसमें जलवायु कार्रवाई पर मिटिगेशन (शमन), एडेप्टेशन (अनुकूलन) और फाइनेंस (वित्त) के संदर्भ में प्रगति की निगरानी और आकलन, बिना देशों की व्यक्तिगत प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है।
नवीन जीएसटी दस्तावेज में साफ तौर से पांच समस्याएं हैं-
- एनर्जी सेक्शन में फोस्सिल फ्यूल के लिए 'फेज आउट' या 'फेज डाउन, दोनों ही बातें नहीं हैं।
- नेट जीरो को लेकर मध्य सदी के अस्पष्ट दावों से परे कार्रवाई के लिए कोई समयसीमा नहीं है।
- विकासशील देशों के ऊर्जा परिवर्तन या एनर्जी ट्रांजीशन का समर्थन करने वाली कुछ फाइनेंस सहायता की प्रतिबद्धताएं नहीं हैं।
- एडेप्टेशन फाइनेंस यानी अनुकूलन वित्त के लिए आगे बढ़ने के रास्ते का कोई स्पष्ट मार्गदर्शक नहीं है ।
- एनडीसी को लेकर कोई मांग नहीं है। बस सभी को उत्सर्जन कम करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
इसका उनतीसवां पैराग्राफ ग्रीनहाउस गैस एमिशन में पर्याप्त, तेज और निरंतर कटौती की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए सभी पक्षों से कार्रवाई करने का आग्रह करता है। दस्तावेज में कहा गया है कि कोयले के प्रयोग को तेजी और चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की और साथ ही कोयला बिजली उत्पादन पर तमाम प्रतिबंध लगाने की जरूरत है।
बात जब दूसरे फोस्सिल फ्यूल की होती है, तब यहां देशों से विज्ञान को ध्यान में रखते हुए, साल 2050 या उसेक आस पास नेट जीरो हासिल करने के लिए उचित, व्यवस्थित और न्यायसंगत तरीके से खपत और उत्पादन दोनों को कम करने का आग्रह किया गया है। इस दस्तावेज में तेल, गैस जैसे दूसरे फोस्सिल फ्यूल को बस कम करने की आवश्यकता बताई है, वहीं कोयले के प्रयोग को तेजी से और चरणबद्ध तरीके से कम किया करने की बात कही गई है।
विकासशील देश दस्तावेज का कर सकते हैं विरोध
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क इंटरनेशनल में वैश्विक राजनीतिक रणनीति के प्रमुख हरजीत सिंह कहते हैं कि इसमें हैरानी कि बात नहीं अगर विकासशील देश इस दस्तावेज का आगे विरोध करते हैं तो वह दस्तावेज के पिछले संस्करणों से पीछे हटने के लिए उसकी आलोचना करते हैं, विशेष रूप से फोस्सिल फ्यूल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर स्पष्ट भाषा की अनुपस्थिति के मामले में।
भारतीय हितों को ध्यान में रखते हुए एमिशन कम हो
वहीं क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला ने बताया कि कोयले की तुलना में तेल और गैस के प्रयोग में कमी की तात्कालिकता पर जोर देते हुए इस दस्तावेज को सभी पक्षों के लिए सुविधाजनक मानती है। आरती इस दस्तावेज को विज्ञान-सम्मत कम और कूटनीति से प्रेरित ज्यादा मानती हैं। साथ ही वो इसमें निर्णायकता की कमी भी महसूस करती हैं। भारतीय COP28 प्रतिनिधिमंडल के सूत्रों की मानें तो भारत के लिए अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना सर्वोपरि है और इसके साथ भारत राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए एमिशन को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
अमीर देशों को करना होगा नेतृत्व
गतिरोध के मूल में एनर्जी ट्रांजिशन के प्रबंधन की चुनौती है। पावर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद एडो इस ट्रांजिशन में निष्पक्षता के महत्व पर जोर देते हैं। वह ऐतिहासिक जिम्मेदारी के आधार पर चरणबद्ध दृष्टिकोण का आह्वान करते हैं। वो कहते हैं कि इस मामले में नेतृत्व अमीर देशों को करना होगा। उनके बाद मध्यम आय वाले देश और फिर गरीब देश आते हैं। कांगो और कनाडा जैसे देशों की अलग अलग परिस्थितियों पर जोर देते हुए एडो कहते हैं कि दोनों देशों से फोस्सिल फ्यूल को एक जैसी दर से चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की अपेक्षा करना तार्किक नहीं। यह बात इस ट्रांजिशन के निष्पक्ष और तार्किक होने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
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