दिल्ली के हर कोने पर AI की नजर! चेहरे, आवाज और हरकत से पकड़े जाएंगे क्रिमिनल; सेफ सिटी प्रोजेक्ट लॉन्च
दिल्ली में 'सेफ सिटी प्रोजेक्ट' के तहत 10,000 एआई-सक्षम कैमरे लगाए जा रहे हैं, जिनमें से 6,000 से अधिक स्थापित हो चुके हैं। दिल्ली पुलिस मुख्यालय में ...और पढ़ें

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राकेश कुमार सिंह, नई दिल्ली। देश की राजधानी अब केवल सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में ही नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की पैनी नजर में होगी। दिल्ली पुलिस अपने महत्वाकांक्षी ''सेफ सिटी प्रोजेक्ट'' को अंतिम रूप देने में जुटी है।
इस प्रोजेक्ट के तहत दिल्ली के सभी 15 जिलों में 10,000 हाई-टेक एआई-सक्षम कैमरे लगाए जा रहे हैं, जो शहर की सुरक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे। अब तक 6,000 से अधिक कैमरे लगाए जा चुके हैं और शेष कार्य युद्ध स्तर पर जारी है।
अत्याधुनिक कमांड रूम: तप4i का कमाल
इस पूरे सिस्टम के सुचारू संचालन के लिए जय सिंह रोड स्थित दिल्ली पुलिस मुख्यालय के टावर नंबर एक की छठी मंजिल पर एक भव्य और अत्याधुनिक कमांड सेंटर बनाया गया है। इसे तप4i (कमांड, कंट्रोल, कम्युनिकेशन, कंप्यूटिंग और इंटेलिजेंस) नाम दिया गया है।
यह कमांड रूम पूरे प्रोजेक्ट का ''मस्तिष्क'' होगा। जैसे-जैसे कैमरे लगाए जा रहे हैं, उन्हें सीधे इस कमांड रूम से जोड़ा जा रहा है। इस सिस्टम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बिना किसी पीसीआर काल के ही पुलिस को सक्रिय कर देगा। यानी घटना होने के बाद सूचना मिलने का इंतजार करने के बजाय, सिस्टम खुद घटना को पहचान कर अलर्ट जारी करेगा।

एआई तकनीक: जो आवाज और हाव-भाव भी पहचानेगी
सेफ सिटी प्रोजेक्ट के तहत लगाए जा रहे कैमरे साधारण रिकाॅर्डिंग डिवाइस नहीं हैं। ये फेस रिकग्निशन सिस्टम और डिस्ट्रेस डिटेक्शन टेक्नोलाजी से भी लैस हैं।
- आपातकालीन पहचान: यदि कोई व्यक्ति मुसीबत में है और चिल्लाता है या उसके चेहरे के हाव-भाव डर या तनाव दिखाते हैं, तो एआई तकनीक इसे तुरंत भांप लेगी।
- संदिग्ध गतिविधियां: कोई लावारिस वस्तु या संदिग्ध गतिविधि कैमरे की जद में आते ही कमांड रूम में अलार्म बज जाएगा।
- नागरिक सुविधाएं: यह सिस्टम इतना बारीक है कि यदि सड़क पर सीवर का ढक्कन भी खुला है, तो कंट्रोल रूम को इसकी जानकारी मिल जाएगी, ताकि दुर्घटना से बचा जा सके।
नौ साल का लंबा इंतजार और चुनौतियां
निर्भया कांड (2012) के बाद केंद्र सरकार ने देश के महानगरों को सुरक्षित बनाने के लिए ''निर्भया फंड'' आवंटित किया था। मुंबई, हैदराबाद और लखनऊ जैसे शहरों ने राज्य और केंद्र के साझा सहयोग से इस प्रोजेक्ट को काफी पहले पूरा कर लिया।
लेकिन दिल्ली में इसके क्रियान्वयन में लंबा समय लगा। 2018 में आधिकारिक रूप से शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की समय सीमा कई बार बढ़ाई गई। जी-20 शिखर सम्मेलन से पहले भी इसे पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन तकनीकी जटिलताओं के कारण ऐसा नहीं हो सका।
करीब 800 करोड़ रुपये के पूर्ण केंद्रीय वित्त पोषण वाले इस प्रोजेक्ट के अब वर्ष 2026 की शुरुआत में लांच होने की प्रबल संभावना है। सूत्रों के अनुसार, अगले दो से तीन महीनों में तकनीकी परीक्षण का काम पूरा कर लिया जाएगा।

डेटा एकीकरण और तकनीकी ढांचा
इस प्रोजेक्ट की सफलता के पीछे एक विशाल डेटा नेटवर्क है। इसमें 32 अलग-अलग डेटा सेट को एकीकृत किया जा रहा है, जिनमें नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो का डाटा, क्रिमिनल डोजियर और जिपनेट आदि शामिल हैं।
रेल टेल कंपनी इस सिस्टम को हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा प्रदान कर रही है। इसके अतिरिक्त, प्रोजेक्ट के तहत दो मोबाइल कमांड और कंट्रोल गाड़ियां और 88 ''प्रखर'' वैन तैनात की जाएंगी। ये वैन मोबाइल डेटा टर्मिनल, बाॅडी-वाॅर्न कैमरे और जीपीएस से लैस होंगी, जिससे पुलिस की प्रतिक्रिया समय में भारी कमी आएगी।

महिला सुरक्षा और मॉनिटरिंग
सुरक्षा को और अधिक संवेदनशील बनाने के लिए कमांड रूम में तकनीकी स्टाफ के साथ-साथ दिल्ली के सभी 15 जिलों से एक-एक महिला पुलिसकर्मी की 24 घंटे तैनाती रहेगी। ये महिला पुलिसकर्मी ''काॅल ट्रैकर'' के रूप में कैमरों और अलर्ट मैसेज पर नजर रखेंगी। जैसे ही उनके संबंधित जिले में कोई संदिग्ध अलर्ट आएगा, वे तुरंत स्थानीय पीसीआर और थाने को सूचित करेंगी।
दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी और गृह मंत्रालय इस प्रोजेक्ट की प्रगति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। हालांकि टेस्टिंग के दौरान कुछ तकनीकी खामियां सामने आई हैं, जिन्हें दूर किया जा रहा है।
एक बार पूरी तरह सक्रिय होने के बाद, यह एआई-आधारित निगरानी तंत्र न केवल अपराधों को रोकने में मदद करेगा, बल्कि अपराधियों को पकड़ने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में दिल्ली पुलिस की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा।
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