दिल्ली में दूसरे शहरों से आता है पीएम-2.5 का 65% हिस्सा, प्रदूषण के लिए पड़ोसी राज्यों के शहर भी जिम्मेदार
दिल्ली में वायु प्रदूषण के लिए स्थानीय कारकों के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के शहर भी जिम्मेदार हैं। पीएम2.5 का 65% हिस्सा एनसीआर और दूर के क्षेत्रों से आ ...और पढ़ें

राज्य ब्यूरो, नई दिल्ली। दिल्ली में प्रदूषण के स्थानीय कारकों के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों के शहर भी जिम्मेदार हैं। पंजाब व हरियाणा के थर्मल पावर प्लांट हों या पड़ोसी राज्यों की औद्योगिक इकाइयां, इनसे भी दिल्ली में प्रदूषण बढ़ रहा है। राजधानी की हवा को सुधारने के लिए इन राज्यों में भी प्रदूषण रोकथाम के प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है।
दिल्ली के 300 किलोमीटर दायरे में स्थित थर्मल पावर प्लांट राजधानी की हवा को प्रदूषित कर रहे हैं, लेकिन उनकी रोकथाम में लापरवाही बरती जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा 2015 में लागू नियमों के अनुसार सभी थर्मल पावर प्लांटों में उत्सर्जन की नियमित जांच और चिमनी उत्सर्जन की निगरानी अनिवार्य है। परंतु, एक आरटीआई के जवाब में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने स्वीकार किया है कि पिछले 10 वर्षों में यह काम नहीं हुआ है।
सेंटर फाॅर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) के नए अध्ययन में भी यह बात सामने आई है कि पराली की जगह अन्य कारणों से दिल्ली सहित एनसीआर के अन्य शहरों में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। यही कारण है कि दिसंबर में भी यहां की हवा गंभीर या बहुत खराब श्रेणी में रही।
आईआईटीएम पुणे स्थित डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली के पीएम2.5 स्तर में लगभग 35 प्रतिशत हिस्सेदारी शहर के स्थानीय स्रोतों की है। शेष 65 प्रतिशत एनसीआर के शहरों तथा दूर के क्षेत्रों की है।
दिसंबर में एनसीआर के शहरों में पीएम2.5 स्तर में अधिक वृद्धि दर्ज की गई। सीएसई के अर्बन लैब की डिप्टी प्रोग्राम मैनेजर शरणजीत कौर का कहना है कि क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण में यह वृद्धि स्थानीय उत्सर्जन स्रोतों के कारण हुई है और स्थिर शीतकालीन मौसम के कारण यह और बढ़ गई है, क्योंकि प्रदूषक बाहर नहीं निकल पाते।
शहरों में पीएम2.5 स्तर में वृद्धि
- नोएडा : 38 प्रतिशत
- बल्लभगढ़ : 32 प्रतिशत
- बागपत : 31 प्रतिशत
- दिल्ली : 29 प्रतिशत
स्थानीय कारकों में वाहनों की हिस्सेदारी सबसे अधिक
डीएसएस के अनुसार, परिवहन से होने वाला उत्सर्जन दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण भार का लगभग आधा (46 प्रतिशत) है और औद्योगिक क्षेत्र का योगदान 22 प्रतिशत रहा है। घरेलू उत्सर्जन का योगदान 11 प्रतिशत था। निर्माण, ऊर्जा उपयोग, अपशिष्ट दहन और सड़क की धूल सहित अन्य क्षेत्रों का योगदान कम लेकिन लगातार बना रहा।
गैसों से बनने वाले द्वितीयक कणों से बढ़ रहा है प्रदूषण
प्रत्यक्ष रूप से उत्सर्जित प्राथमिक कण (वाहनों, उद्योगों और आग से) प्रदूषण का केवल 39 प्रतिशत हिस्सा हैं। शेष 61 प्रतिशत प्रदूषक वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओएक्स), अमोनिया (एनएच₃) और वोलाटाइल आर्गेनिक कंपाउंड्स जैसी पूर्ववर्ती गैसों की प्रतिक्रिया से बनते हैं।
इनमें से एक बड़ा हिस्सा आर्गेनिक एरोसाल हैं, जो अत्यधिक ऑक्सीकृत कण हैं। आर्गेनिक एरोसाल और एसओ₂ के लिए वाहनों से होने वाला उत्सर्जन जिम्मेदार है। इससे पता चलता है कि केवल दिखाई देने वाले धुएं को नियंत्रित करके वायु गुणवत्ता में सुधार नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरे क्षेत्रीय वायुक्षेत्र में वाहनों और उद्योगों द्वारा उत्सर्जित अदृश्य प्रदूषक गैसों को कम करने के लिए समन्वित रणनीति की आवश्यकता है।
12 से 15 दिसंबर के बीच पीएम2.5 की उच्चतम सांद्रता
- नोएडा-352
- दिल्ली-343
- गाजियाबाद-300 से अधिक
- ग्रेटर नोएडा-300 से अधिक
- बागपत-312
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पराली जलाने की घटनाओं के बाद भी दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बढ़ने से स्पष्ट है कि वाहनों, उद्योगों, अपशिष्ट जलाने, घरेलू खाना पकाने और गर्म करने के लिए ठोस ईंधन के उपयोग जैसे क्षेत्रीय व स्थानीय कारक इसके लिए जिम्मेदार हैं। समस्या के समाधान के लिए स्थानीय और क्षेत्रीय उत्सर्जन स्रोतों के विरुद्ध पूरे वर्ष काम करना होगा।
-अनुमिता राय चौधरी (सीएसई की कार्यकारी निदेशक)

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