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    साउथ दिल्ली में कचरों के पहाड़ से भूजल 'दूषित', चार गुना टीडीएस तो कहीं सल्फेट अधिक; पानी में 'धीमा जहर' पी रहे लोग

    Updated: Mon, 05 Jan 2026 02:32 AM (IST)

    दक्षिणी दिल्ली में कूड़े के पहाड़ों के कारण भूजल गंभीर रूप से दूषित हो गया है। ओखला, गाजीपुर, भलस्वा और बवाना लैंडफिल साइट्स के पास के पानी में टीडीएस ...और पढ़ें

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    ओखला लैंडफिल साइट के पास वीपी सिंह कैंप में बोर के पानी से भरी बाल्टी व टब। जागरण

    जागरण संवाददाता, दक्षिणी दिल्ली। कूड़े के पहाड़ न केवल एमसीडी के लिए चुनौती हैं, बल्कि धरती और उसकी कोख में संरक्षित जल को भी जहरीला बना रहे हैं। ओखला, गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल साइट्स एवं बवाना में इंजीनियर सैनिटरी लैंडफिल को आस-पास का भूजल दूषित हो चुका है।

    सीपीसीबी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक कहीं टीडीएस की मात्रा मानक से चार गुना तक अधिक है तो कहीं कैल्शियम, सल्फेट और मैग्नीशियम का स्तर भी मानक से अधिक है। विशेषज्ञों के मुताबिक ज्यादा टीडीएस लेवल वाला पानी लंबे समय तक पीने से स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान हो सकते हैं।

    त्वचा रोग और बालों में खुजली की हो रही समस्या 

    ओखला लैंडफिल साइट के पास आठ हजार की आबादी वाला वीपी सिंह कैंप है। यहां पेयजल आपूर्ति के लिए छह बोर हैं। पिछले लगभग आठ वर्ष से लोगों के इससे हल्का पीला व बदबूदार पानी मिल रहा है। टैंक में जमा इस पानी से जब गंदगी नीचे बैठ जाती है, तब ऊपर से निकाल कर इसका बर्तन-कपड़े धुलने में इसका इस्तेमाल होता है। नहाने पर त्वचा रोग और बालों में खुजली व बाल झड़ने जैसी समस्या भी हो रही है।

    लैंडफिल साइट्स भलस्वा, गाजीपुर और ओखला के साथ ही बवाना में इंजीनियर सैनिटरी लैंडफिल के पास का भूजल दूषित बना हुआ है। दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दिसंबर 2021 में हर लैंडफिल साइट के पास से चार-पांच जगहों से सैंपल लिए थे। रिपोर्ट में टोटल डिसाल्व सालिड्स (टीडीएस), कैल्शियम, सल्फेट और मैग्नीशियम का लेवल तय सीमा से ज्यादा मिला।

    विशेषज्ञों के मुताबिक भू-जल में प्रदूषण का मुख्य कारण लैंडफिल साइट्स पर बिना अलग किया हुआ कचरा है जो मिट्टी में रिसता है। टीडीएस का लेवल तभी ज्यादा होता है जब पोटेशियम, क्लोराइड और सोडियम एवं जहरीले आयनों की मात्रा पानी में अधिक हो जाती है।

    ज्यादा टीडीएस वाला पानी लंबे समय तक पीते रहने से शरीर कई तरह के रसायन और विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आता है, जो कैंसर, लिवर या किडनी फेलियर, नर्वस सिस्टम डिसआर्डर जैसी पुरानी बीमारियों की वजह बनता है। इससे न केवल प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, बल्कि नवजात शिशुओं में जन्मजात बीमारियां भी हो सकती हैं।

    लैंडफिस साइट के पास पानी की स्थिति

    स्थान टीडीएस सल्फेट मैंगनीज
    ओखला लैंडफिल साइट 894 471 524
    ईएसआइसी हास्पिटल ओखला 1060 602 2795
    सेक्टर-5 बवाना 852 639 35
    सनोथ गांव बवाना 551 884 22.4
    गाजीपुर एंट्री गेट 1860 385 104.3
    मछली बाजार (गाजीपुर लैंडफिल) 2170 333 153.2
    भलस्वा डेरी (भलस्वा लैंडफिल) 2160 785 185
    भलस्वा लैंडफिल साइट 287 606 337.7

    (स्रोत-डीपीसीसी)
    (नोट- मात्रा एमजी/ली. और टीडीएस का मानक 500, सल्फेट का 200 एवं मैंगनीज का 30)

    भलस्वा लैंडफिल साइट के बगल में बसी श्रद्धानंद कॉलोनी और भलस्वा डेरी क्षेत्र की आबादी का बड़ा हिस्सा पानी खरीद कर पी रहा है। यहां के नल दूषित व दुर्गंध युक्त पानी उगल रहे हैं। नल से दूषित पानी आने की वजह घरों को जाने वाली जलापूर्ति लाइन गंदे पानी से लबालब नालियों से होकर गुजर रही हैं। जहां-जहां जलापूर्ति पाइप लाइन क्षतिग्रस्त हैं, वहां से नालियों का गंदा पानी पेयजल आपूर्ति में मिक्स हो जाता है।

    ऐसे में इंदौर जैसी घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। बोर से मिलने वाला भूजल भी पीने लायक नहीं है। पिछले 12-15 साल से लोग पानी खरीदकर पी रहे हैं, या फिर जल बोर्ड के टैंकर से प्यास बुझा रहे हैं।

    मजबूरन नल व भूमिगत पानी पीने वालों की अक्सर सेहत बिगड़ जाती है। किसी का पेट खराब होता है तो कइयों को त्वचा संबंधी परेशानी झेलनी पड़ती है। लोगों का कहना है कि उन्हें पता है कि कूड़े के पहाड़ के कारण यहां की हवा और पानी खराब हो चुकी है, इसलिए जितना संभव है, भूमिगत व नल के पानी के सेवन से बचते हैं।

    वीपी सिंह कैंप में आठ वर्ष से दुर्गंधयुक्त पीला पानी

    ओखला लैंडफिल साइट के सबसे नजदीक बसा है वीपी सिंह कैंप। करीब चार दशक पुराने इस कैंप की आबादी लगभग सात हजार है। पानी की आपूर्ति के लिए छह बोर हैं। पुल प्रह्लादपुर की ओर ए व डी ब्लाक में चार बोर हैं, वहां पीने के लिए गंगाजल की आपूर्ति भी है। वहीं बी और सी ब्लाक के लोग दो बोर पर निर्भर हैं।

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    सुबह-शाम बोर चलने पर पीला और मछली तरह दुर्गंध वाला पानी आता है। यह स्थिति पिछले लगभग आठ वर्षों से बनी हुई है। इसका इस्तेमाल बर्तन व कपड़े धोने में ही किया जाता है। इससे नहाने पर त्वचा पर चकत्ते उभरने, खुजली होने और बाल झड़ने जैसी समस्या होने लगती है। पीने के लिए लोगों को या तो दूर से पानी लाना पड़ता है या खरीदकर पीना पड़ता है।

    स्थानीय निवासियों के मुताबिक शिकायत पर कई बार जल बोर्ड ने यहां के पानी का सैंपल लिया, पर रिपोर्ट में क्या आया, आज तक पता ही नहीं चला। जनप्रतिनिधियों से शिकायतों के बाद पिछले एक वर्ष से जल बोर्ड के टैंकर यहां आने लगे हैं। वह भी कभी दो दिन तो कभी तीन दिन के अंतराल पर आते हैं। बीच में जरूरत पड़े तो खरीदना ही विकल्प रहता है।

    गाजीपुर लैंडफिल साइट के पास मिली ये स्थिति

    मुल्ला कॉलोनी, राजवीर कॉलोनी, कोंडली, गाजीपुर मुर्गा मंडी व मछली मंडी व गाजीपुर डेरी फार्म में दिल्ली जल बोर्ड बोरवेल से पानी की सप्लाई करता है। कई क्षेत्रों में लोगों ने सबमर्सिबल पंप भी लगाए हैं।

    इन क्षेत्रों में दूषित पानी की समस्या है। दूषित पानी पीकर लोगों के पेट में संक्रमण होना यहां आम बात है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पानी में दुर्गंध अधिक रहती है। इस पानी को पीना तो दूर घर के काम में भी इस्तेमाल में नहीं लिया जाता है।

    दूषित पानी को लेकर बोले लोग?

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    हम लोगों की शिकायत पर अब तक आठ बार जल बोर्ड की टीम सैंपल लेकर जा चुकी है। पानी में क्या है, क्या नहीं, कभी कुछ बताया ही नहीं गया। इस पानी को बर्तन में रख दिया जाता है। जब गंदगी तली में बैठ जाती है, तब ऊपर से पानी निकालकर उससे कपड़े और बर्तन धोते हैं।


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    -भगवान देवी, वीपी सिंह कैंप

    लैंडफिल के चलते भूजल दूषित हो चुका है। बहुत से लोगों ने अपने घरों में सबमर्सिबल लगाया हुआ है। वह उसी दूषित भू-जल को पीकर बीमार पड़ रहे हैं। दांतों में व पेट में दिक्कत होती है। मैं भी इन दोनों बीमारी से पीड़ित हूंं। आस-पास के क्षेत्र में दिल्ली जल बोर्ड के प्लांट की बजाय बोरवेल से ही आपूर्ति होती है।


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    -अब्दुल रहमान, मुल्ला कॉलोनी

    शायद ही कोई दिन जाता हो जब क्षेत्र में दूषित पानी न आता हो। दिल्ली जल बोर्ड के पानी में कई बार सीवर का पानी मिलकर आता है। इसके चलते पेट में संक्रमण, पेट दर्द व उल्टी की समस्या होती है। ठीक होने में पांच से छह दिन लग जाते हैं। सभी ने अपने घर में वाटर प्यूरीफायर लगाया है।


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    -शमशाद, मुल्ला कॉलोनी

    करीब आठ वर्ष पहले तक पानी ठीक था। उसके बाद से दुर्गंध के साथ पीला पानी आने लगा। वाटर प्यूरीफायर भी इसे साफ नहीं कर पाता। इससे नहाने पर खुजली और बाल झड़ने जैसी समस्या होने लगती है। इसलिए इस पानी का इस्तेमाल केवल बर्तन व कपड़े धुलने में करते हैं। पीने के लिए हमें बाहर से पानी खरीदना पड़ता है।


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    -अमर झा, वीपी सिंह कैंप

    जल बोर्ड की लाइन से आने वाला पानी भी पीने लायक नहीं है, अक्सर काले-पीले रंग का दूषित व बदबूदार पानी आता है। जमीनी पानी के लिए सबमर्सिबल लगाया है, लेकिन यह पानी भी पीने लायक नहीं है। इसलिए 50 रुपये में 40 लीटर पानी की कैन खरीदकर प्यास बुझाते हैं। भूमिगत जल का इस्तेमाल नहाने, बर्तन-कपड़े धोने में इस्तेमाल करते हैं।


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    -सुनील कुमार, श्रद्धानंद कालोनी, भलस्वा

    संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर की ओर से आने वाली जल बोर्ड की जलापूर्ति लाइन अक्सर क्षतिग्रस्त हो जाती है, इस कारण पूरे क्षेत्र में गंदे पानी की आपूर्ति होती है। क्षेत्र में घरेलू जरूरत में भूमिगत पानी का ज्यादा इस्तेमाल होता है। पीने के लिए पानी खरीदना पड़ता है।


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    -इरफान, दुर्गा चौक, भलस्वा डेरी