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    किसका कितना प्रदूषण? दिल्ली आज भी नहीं जानती अपनी हवा की सच्चाई; 7 साल पुरानी Emission लिस्ट से चल रहा काम

    Updated: Fri, 02 Jan 2026 09:22 PM (IST)

    दिल्ली में वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए आईआईटीएम पुणे का डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) 2021 से अपडेट नहीं हुआ है। यह 2016-2018 की पुरानी उत्सर्जन सूच ...और पढ़ें

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    राजेंद्र नगर स्थित आइआइटीएम पुणे के क्षेत्रीय कार्यालय में डीएसएस सिस्टम का जायजा लेते एक विज्ञानी। आर्काइव

    संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। लगातार जहरीली हवा का दंश झेलने पर विवश राष्ट्रीय राजधानी में प्रभावी और स्थायी प्रदूषण की रोकथाम हो भी तो कैसे, आज तक यहां प्रदूषकों की सही स्थिति ही उपलब्ध नहीं है। कितना प्रदूषण दिल्ली का स्थानीय है जबकि कितना पड़ोसी शहरों का.. इसे लेकर भी अपडेट जानकारी नहीं मिलती।

    हालांकि दिल्ली सरकार ने हाल ही में इस पर नए सिरे से पहल करने की घोषणा की है, लेकिन वह पहल भी जब सिरे चढ़ेगी, तब चढ़ेगी। मालूम हो कि डीएसएस केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन काम करता है और इसका संचालन आईआईटीएम पुणे करता है।

    कब तब तैयार हुई Emission लिस्ट

    आईआईटी कानपुर की एक रिपोर्ट लगभग एक दशक से भी पहले की है तो सफर इंडिया की रिपोर्ट सात साल से अधिक पुरानी। पुणे स्थित आईआईटीएम भी अपने डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के लिए सफर द्वारा 2018 में तैयार उत्सर्जन (Emission) सूची का ही उपयोग करता रहा है।

    गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ, रोहतक, सोनीपत और पानीपत सहित अन्य 19 एनसीआर जिलों के लिए, टेरी द्वारा विकसित 2016 की उत्सर्जन सूची का उपयोग किया जाता है। इसी तरह एनसीआर से बाहर के क्षेत्रों के लिए डीएसएस वैश्विक उत्सर्जन डेटाबेस पर निर्भर करता है।

    डीएसएस (डिजिटल सेंसर सिस्टम) कण पदार्थ (पीएम 2.5 और पीएम 10) के स्रोतों की पहचान और उत्सर्जन नियंत्रण उपायों के संभावित प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए एक संख्यात्मक माडल का उपयोग करता है। 2021 में यह उत्सर्जन सूची कुछ अपडेट की गई लेकिन अब वह भी बेमानी हो चुकी है।

    विज्ञानी भी मान रहे डीएसएस की खामियां

    2024 में प्रकाशित एक पीयर-रिव्यू अध्ययन में आईआईटीएम पुणे के वैज्ञानिकों ने भी डीएसएस की सीमाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि 2016 के सर्वेक्षणों पर आधारित उत्सर्जन सूची कई वर्षों बाद 'वास्तविकता को कम आंक रही है'।

    अध्ययन में पाया गया कि पुराने सर्वेक्षण पीएम सांद्रता में योगदान देने वाले कई प्रमुख कारकों, जैसे सर्दियों में हीटिंग के लिए बायोमास का जलना, खुले में कचरा जलाना, ईंट भट्ठों की गतिविधि और सूक्ष्म स्तर पर जलने की घटनाओं को या तो ठीक से नहीं दर्शाते हैं या पूरी तरह से अनदेखा कर देते हैं।

    इसमें ये भी बताया गया कि माडल गंभीर प्रदूषण की घटनाओं को मात्रात्मक रूप से पकड़ने में असमर्थ है। विशेष रूप से जब एक्यूआई 400 से ऊपर होता है। बिगड़ी वायु गुणवत्ता का यह स्तर, जिसे 'गंभीर' के रूप में वर्गीकृत किया गया है, दिल्ली समेत एनसीआर में सर्दियों में काफी आम है।

    सीईईडब्ल्यू ने भी उत्सर्जन सूची अपडेट करने की सिफारिश

    हाल ही के एक अध्ययन में, दिल्ली स्थित थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) ने सिफारिश की कि 'अद्यतन उत्सर्जन सूची' के साथ प्रदूषण की घटनाओं के पूर्वानुमान को बढ़ाया जा सकता है। अध्ययन में कहा गया है, 'पूर्वानुमानों में सुधार के लिए सीएक्यूएम की देखरेख में दिल्ली एवं एनसीआर क्षेत्र के लिए एक्यूआइ को उन्नत करना तत्काल प्राथमिकता होनी चाहिए।'

    सीईईडब्ल्यू के कार्यक्रम प्रमुख मोहम्मद रफीउद्दीन ने कहा, उत्सर्जन सूची के अद्यतन होने से इसकी सटीकता और बेहतर हो सकती है। इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि दिल्ली की हवा में क्या और कितनी मात्रा में प्रदूषण होता है।

    दिल्ली का डीएसएस वर्तमान में सिर्फ सर्दियों में ही काम करती है, इससे इसकी उपयोगिता सीमित हो जाती है। इस प्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए, इसे साल भर चलाना भी जरूरी है।

    इसमें कुछ प्रकार के वाहनों पर प्रतिबंध लगाने या सार्वजनिक परिवहन का विस्तार करने जैसे माडलिंग परिदृश्यों को शामिल किया जाए और डेटा तक सार्वजनिक पहुंच के साथ हर दो से तीन साल में अद्यतन की जाने वाली राष्ट्रीय उत्सर्जन सूची बनाई जाए।

    सीएक्यूएम भी जता चुका आपत्ति

    सीएक्यूएम ने 2024 में डीएसएस सिस्टम को अस्थाई तौर के लिए रोक दिया था और निर्देश दिए थे कि वह अपनी सटीकता सुधारने के लिए कुछ बदलाव करे। इसी वजह से 2024 में डीएसएस के आंकड़े 29 नवंबर तक मिले थे। इसके बाद यह सिस्टम नौ दिसंबर को दोबारा से शुरू किया गया। इसे लेकर सीएक्यूएम द्वारा गठित एक समिति भी काम कर रही है।

    दिल्ली सरकार अपने स्तर पर फिर करेगी पहल

    दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) भी फिर से अपनी सोर्स अपार्शन्मेंट स्टडी शुरू कराएगी। यह स्टडी बताएगी कि दिल्ली में प्रदूषण के मुख्य कारक कौन कौन से हैं। साथ ही यह भी साझा करेगी कि किस कारक की कितनी हिस्सेदारी है। यही रिपोर्ट प्रदूषण से जंग में मददगार बनेगी। डीपीसीसी ने बीते दिनों अपनी बोर्ड बैठक में इस आशय के प्रस्ताव को स्वीकृति भी दे दी है।

    दिल्ली में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारक और उनकी इस प्रदूषण में हिस्सेदारी

    • वाहनों का धुआं- 25 प्रतिशत
    • कचरा जलाना- 20 प्रतिशत
    • सड़क की धूल- 20 प्रतिशत
    • ढांचागत निर्माण व ढहाने के कारण धूल- 15 प्रतिशत
    • फैक्ट्रियों से निकला धुआं- 10 प्रतिशत
    • अन्य स्रोत- 10 प्रतिशत

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