RJD-कांग्रेस के लिए साथ बने रहना क्यों है मजबूरी? तनातनी से छूटेगा साथ या संवाद से बनेगी बात; यहां पढ़ें
Bihar News: बिहार में राजद और कांग्रेस के रिश्ते तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं, लेकिन चुनावी मजबूरियों के चलते दोनों दल एक-दूसरे के बिना प्रभावी नहीं ...और पढ़ें

कौन पाटेगा राजद-कांग्रेस की दूरी।
सुनील राज, पटना। Bihar Politics: बिहार की राजनीति में राजद और कांग्रेस का रिश्ता (RJD-Congress Relation in Bihar) एक बार फिर तनाव के दौर से गुजर रहा है।
चुनावी मजबूरियों के बावजूद दोनों दलों के बीच अविश्वास खुलकर सामने आने लगा है। यह तल्खी हाल के दिनों में उस वक्त बढ़ी जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान ने दो टूक कहा कि, बिहार में महागठबंधन अब केवल औपचारिक रह गया है।
उनके बयान के बाद राजद की ओर से भी पटलवार किया गया। राजद-कांग्रेस के नेता भले जो दावे करें हकीकत यह है कि लोकसभा चुनाव में राजद, कांग्रेस के बिना प्रभावी मुकाबला नहीं कर सकता, वहीं विधानसभा चुनाव में कांग्रेस राजद के बगैर।
लेकिन हालिया विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद दोनों दलों के रिश्तों में जो खटास उभरी है, उसने महागठबंधन की मजबूती पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
RJD के 118 और कांग्रेस के 54 उम्मीदवार हारे
विधानसभा चुनाव में राजद 143 सीटों पर लड़ा परंतु उसके 118 उम्मीदवार पराजित रहे। कांग्रेस का भी हाल कुछ ऐसा ही रहा। कांग्रेस ने 60 सीटों पर चुनाव लड़ी और उसे जीत मिली महज छह सीटों पर।
विश्लेषक मानते हैं कि बिहार की राजनीति में दोनों दलों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए संयम बरतना होगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का राष्ट्रीय चेहरा, उसका सीमित लेकिन निर्णायक वोट बैंक और केंद्र की राजनीति में उसकी भूमिका राजद के लिए उपयोगी साबित होती है।
वहीं विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार उसे राजद के सामाजिक समीकरणों पर निर्भर बना देते हैं। यादव-मुस्लिम आधार के साथ राजद की मजबूत पकड़ के बिना कांग्रेस बिहार की सत्ता राजनीति में हाशिये पर चली जाती है।
बावजूद विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद गठबंधन के दो प्रमुख दल आत्ममंथन की बजाय एक दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं।
पहले सीट बंटवारे इसके बाद चुनाव में बड़ी पराजय के बाद से इन दोनों दलों के बीच असंतोष बढ़ा है।
एक-दूसरे से अलग होना नुकसानदेह
जिसने अब राजनीतिक बयानबाजी का रूप ले लिया है। जो जमीनी राजनीति में नुकसानदेह साबित हो सकता है। फिर भी राजनीतिक यथार्थ यही है कि दोनों दलों के पास एक-दूसरे से अलग होकर कोई बड़ा विकल्प नहीं है।
अकेले लड़ने की स्थिति में न तो राजद लोकसभा में प्रभावी भूमिका निभा सकता है और न कांग्रेस विधानसभा में सत्ता की दौड़ में टिक सकती है। ऐसे में मौजूदा तनातनी को स्थायी दरार में बदलने के बजाय दोनों दलों को नए सिरे से संवाद और भूमिका स्पष्ट करने की जरूरत है।

कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।