Gaya News: सूख गई गया की पैमार नदी, पहले सालों भर देती थी पानी; भीषण गर्मी में लोगों की बढ़ेंगी मुश्किलें
गया की पैमार नदी जो कभी सालों भर अविरल बहती थी अब पूरी तरह सूख चुकी है। इसके किनारे बसे ग्रामीण और जीव जंतुओं की प्यास बुझाने वाली यह नदी अब खुद पानी के लिए तरस रही है। नदी के सूखने से चापाकल भी प्रभावित हुए हैं और गर्मी में सूख जाते हैं। नदी के किनारे अतिक्रमण भी बढ़ रहा है।

रविभूषण सिन्हा, वजीरगंज(गया)। Gaya News: अपने दोनों किनारो पर बसे ग्रामीणों एवं पशु पक्षियों सहित अन्य जीव जंतुओं का सालों भर प्यास बुझाते हुए अविरल बहते रहने वाली पैमार नदी आज खुद बूंद बूंद पानी के लिए तरस रही है। इसकी धाराएं पूरी तरह सूख चुकी है।
बालू कहीं नहीं दिखते और घास-फुस से भरा हुआ है। यह नदी टनकुपा की ओर से आकर वजीरगंज एवं मानपुर प्रखंड क्षेत्र के सीमाओं के बीच से गुजरती है और आगे अतरी क्षेत्र में प्रवेश कर आगे की ओर निकलती है। अब से एक दशक पहले तक इस नदी में उद्गम से अंत तक सभी जगह सालों भर पानी बहते रहता था।
सैकड़ों लोगों की प्यास बुझाती थी नदी
भीषण गर्मी के मौसम में भी इसके किनारे बसे गांव के महिला पुरुष एवं बच्चे इसी नदी के पानी से तृप्त होते थे। किनारे पर बसे ग्रामीण बताते हैं कि पहले जब हमारे घरों में पानी के संसाधन का अभाव था तो हम सब पूरे परिवार का नहाना धोना तथा मवेशियों को पीने के पानी इसी नदी से सालों भर मिलते रहता था।
अचानक उसकी धाराएं कम होने लगी और धीरे-धीरे पूरी तरह सूख गई। नदी किनारे अब बड़े पैमाने पर अतिक्रमण भी हो रहा है। कहीं घर बनाए जा रहे हैं तो कहीं खेती की जमीन तैयार किए जा रहे हैं। क्षेत्र के लोग नदी के महत्व को अभी भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं और इसके अस्तित्व को मिटाने पर तुले हुए हैं।
हालांकि, इस क्षेत्र के लोगों को यह भी मानना है कि जब नदी में पानी रहता था तब हमारे घरों के चापाकल भी चलते रहते थे। लेकिन अब गर्मी के मौसम आते ही अधिकांश चापाकल सूख जाते हैं।
पहले बहुत कम गहराई में ही बोरिंग करने पर पीने का पर्याप्त पानी मिलने लगता था क्योंकि भूजल स्तर काफी नजदीक बना रहता था जिससे सिंचाई के लिए मोटर एवं डीजल पंप भी आसानी से चलाए जाते थे। लेकिन अब भूजल स्तर काफी नीचे चला गया है।
इस गांव के लोग हुए प्रभावित
वर्तमान में इस नदी को सूख जाने से गया जिले के वजीरगंज के अलावा टनकुपा, मानपुर, अतरी, मोहड़ा, नीमचक नीमचक बथानी तक की बड़ी आबादी प्रभावित हुई है। इसका सुखना मानो गया के पूर्वी भाग का जीवन रेखा ही मिट गया है।
आसपास के पहाड़ी एवं जंगली क्षेत्र के पशु भी गर्मी के दिनों में इसी नदी के पानी से अपनी प्यास बुझाते थे। लेकिन अब वे सब भी पानी के लिए पूरी रात भटकते रहते हैं।
क्षेत्र के जंगली पशु भी पलायन करने लगे हैं
क्षेत्र में देखा जाता है कि नीलगाय, घुड़सावर, हिरण एवं अन्य वन्य प्राणी रात को पानी की तलाश में भटक कर गांव में प्रवेश कर जाते हैं जहां उन्हें अपनी जान भी गवानी पड़ती है। नदी में पानी नहीं होने से क्षेत्र के जंगली पशु भी पलायन करने लगे हैं।
हमें इसे बचाने एवं एक बार फिर से जीवंत करने की जरूरत है। इसके लिए सामाजिक एवं सरकारी स्तर पर पहल किया जाए तो संभवतः इस नदी की धाराएं एक बार फिर से बहाना शुरू हो सकती है।
इसके लिए बूंद बूंद के लिए तरसती सूखी पड़ी कराहती हुई इस नदी को किसी भागीरथ की तलाश है। इस नदी के बालू भी पूरे तरह समाप्त हो गए हैं। जो कुछ भी बचा है वह घास कुस से दबा हुआ है ।
क्षेत्र की नदियों का सूखना पर्यावरण एवं जलवायु के लिए बड़ा खतरा है। मानव जीवन सहित अन्य प्राणियों के सामने भविष्य में भीषण जल संकट उत्पन्न होने की प्रबल संभावना बनती है। हम अपने प्रखंड क्षेत्र में पैमार नदी की दुर्दशा का सर्वेक्षण कराकर जो भी संभव कार्य हो सकेगा करने का प्रयास करेंगे। नदी के उद्गम स्थाल की भी खोज करवाने का प्रयास करेंगे तथा धाराओं को सूखने के कारणों की पड़ताल कर उसे पुनर्जीवित करने का उपाय किया जाएगा। प्रखंड विकास पदाधिकारी, प्रभाकर सिंह
ये भी पढ़ें
Bihar Kisan News: किसानों को अब आसानी से मिलेगा बिजली कनेक्शन, बस इस एप को कर लें मोबाइल में इंस्टॉल
Litchi Farming: उत्तर बिहार के लीची उत्पादकों की बल्ले-बल्ले, रेलवे के इस फैसले से व्यापार होगा आसान
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।