यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Oct 12, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
बंजर जमीन पर रंग लाई मेहनत, फार्म टूरिज्म का मॉडल बना रैथल
ग्रीन पीपुल संस्था ने उत्तरकाशी के रैथल गांव में फार्म टूरिज्म का एक मॉडल तैयार किया है। इस मॉडल का ...और पढ़ें

उत्तरकाशी, [शैलेंद्र गोदियाल]: गांवों से पलायन कैसे रुके, इसके लिए नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल की प्रेरणा से ग्रीन पीपुल संस्था ने उत्तरकाशी के रैथल गांव में फार्म टूरिज्म का एक मॉडल तैयार किया है। इस मॉडल का संचालन करने वाले में मुख्य भूमिका है स्थानीय युवतियों व महिलाओं की। सुखद यह कि इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आने लगे हैं।
जिला मुख्यालय उत्तरकाशी से करीब 40 किमी की सड़क दूरी पर स्थित रैथल गांव में निम के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल ने स्थानीय लोगों रोजगार से जोड़ने के लिए उन्हें बंजर भूमि आबाद करने की सलाह दी। इसके लिए उन्होंने फार्म टूरिज्म का आइडिया ग्रामीणों को दिया और हमराह बनी ग्रीन पीपुल संस्था।
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संस्था ने रैथल निवासी बलवीर पंवार व हरवीर पंवार की 40 नाली भूमि लीज पर लेकर अप्रैल 2016 से उस पर काम की शुरुआत की। यह भूमि वर्षों से बंजर पड़ी हुई थी।
फार्म के संचालन की जिम्मेदारी उत्तरकाशी के ग्राम भंकोली निवासी ममता, गोरशाली निवासी मीरा पंवार व मनीता, रैथल निवासी प्रियंका राणा, कुंजन निवासी वंदना पंवार और नाल्ड निवासी शोभनी को सौंपी गई। इन सभी युवतियों को फाइव स्टार होटल आनंदा व ताज में तीन-तीन माह का प्रशिक्षण दिया गया।
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अब ये युवतियां इस फार्म टूरिज्म में पयर्टकों को ठहराने से लेकर भोजन बनाने व परोसने, खेतों में काम करने, पशुओं के लिए चारा काटने जैसी जिम्मेदारियां संभाल रही हैं। यहां तक कि पर्यटकों के साथ गाइड की भूमिका भी निभा रही हैं।
ग्रामीणों के लिए पर्यटन महत्वपूर्ण विकल्प
निम के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल के मुताबिक गांवों से पलायन रोकने और ग्रामीणों को रोजगार देने के लिए पर्यटन सबसे महत्वपूर्ण विकल्प है। ग्रीन पीपुल संस्था ने नाग टिब्बा के बाद रैथल गांव में फार्म टूरिज्म का एक अच्छा मॉडल तैयार किया है। इस तरह का टूरिज्म अन्य ग्रामीण भी अपने गांव में संचालित कर सकते हैं।
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फार्म टूरिज्म की तस्वीर
-बंजर भूमि आबाद करके वहां पारंपरिक कॉटेज बनाए गए हैं।
-पर्यटकों के लिए खाने-रहने की व्यवस्था पूरी तरह पारंपरिक है।
-दूध-दही की आपूर्ति के लिए गाय-भैंस पाली गई हैं।
-सब्जी व दाल के लिए कॉटेज के आस-पास खेती की जा रही है।
-पर्यटकों को खेती करने व पशुओं के लिए चारा काटने का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।
-पर्यटकों के लिए गांव के स्थानीय उत्पाद, मसलन दाल, अनाज से बनी वस्तुओं में से किसी एक खरीदना जरूरी होता है।
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