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    मंत्रालय बदलने से लटकी नमामि गंगे की 2200 करोड़ की डीपीआर

    By BhanuEdited By:
    Updated: Thu, 05 Oct 2017 08:49 PM (IST)

    जल संसाधन मंत्रालय की जिम्मेदारी उमा भारती से नितिन गडकरी को मिलने के बाद से नमामि गंगे के तहत एफआरआइ से तैयार 2200 करोड़ रुपये की डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) अधर में लटक गई।

    मंत्रालय बदलने से लटकी नमामि गंगे की 2200 करोड़ की डीपीआर

    देहरादून, [सुमन सेमवाल]: जिस जल संसाधन मंत्रालय के लिए वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) ने नमामि गंगे के तहत 2200 करोड़ रुपये की डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) तैयार की, उससे अब जल संसाधन मंत्रालय ने हाथ खड़े कर लिए हैं। 

    एफआरआइ के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन काम करने के चलते यह जिम्मेदारी अब इस मंत्रालय के सिर आ पड़ी है। देहरादून में एफआरआइ डीम्ड यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में शरीक होने आए देश के महानिदेशक (वन) सिद्धांत दास ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इतनी भारी-भरकम राशि जुटाने को लेकर मंथन चल रहा है, लेकिन अभी कोई ठोस राह नजर नहीं आ रही है। 

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    वर्ष 2014 में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने अपने देहरादून भ्रमण के दौरान वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ) को नमामि गंगे के तहत डीपीआर बनाने और गंगा संरक्षण के कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी थी।

    इसके तहत उत्तराखंड समेत, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड व पश्चिम बंगाल में गंगा किनारे वनीकरण व गंगा स्वच्छता की दिशा में तमाम कार्य किए जाने हैं। तब यह कहा गया था कि इसका खर्च जल संसाधन मंत्रालय वहन करेगा। हालांकि इस अवधि में मंत्रालय बदल जाने पर जल संसाधन मंत्रालय की जिम्मेदारी नितिन गडकरी को मिलने के बाद जल संसाधन मंत्रालय ने इस जिम्मेदारी से हाथ खींच लिए। 

    महानिदेशक वन सिद्धांत दास ने कहा कि 2200 करोड़ रुपये की डीपीआर में गंगा स्वच्छता की दिशा में अभूतपूर्व कार्य प्रस्तावित किए गए हैं। ऐसे में डीपीआर को डंप करना उचित नहीं और एफआरआइ के वन मंत्रालय के अधीन होने के चलते नैतिक रूप से इसकी जिम्मेदारी ली गई है। 

    एक विकल्प यह भी समाने है कि कैंपा (कंपनसेंटरी एफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी) के माध्यम से यह राशि जुटाई जाए, लेकिन पश्चिम बंगाल के पास कैंपा में कोई फंड शेष नहीं है। लिहाजा अन्य विकल्पों पर भी विचार चल रहा है। जल्द तस्वीर स्पष्ट कर दी जाएगी।

    कैंपा को कैग की हरी झंडी का इंतजार

    प्रतिपूरक वनीकरण निधि अधिनियम  (कैंपा) में वनीकरण के करीब 42 हजार करोड़ रुपये 35 साल बाद जारी करने को लेकर केंद्र सरकार की कवायद आखिरी पायदान पर है। एफआरआइ में जागरण से बातचीत में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन सचिव अजय नारायण ने बताया कि कैंपा एक्ट बन जाने के बाद इसके रूल्स की फाइनल कर दिए हैं। 

    वित्तीय प्रावधानों को स्पष्ट करने के लिए फाइल कैग को बेजी गई है। हरीश झंडी मिलते ही राज्यों को राशि का आवंटन शुरू कर दिया जाएगा। उत्तराखंड के हिस्से करीब 1500 करोड़ रुपये आएंगे।

    10 फीसद बजट नियंत्रण-निगरानी को

    केंद्रीय सचिव अजय नारायण झा के मुताबिक कैंपा में 10 फीसद बजट का प्रावधान वनीकरण के नियंत्रण, निगरानी व क्षमता विकास जैसे कार्यों के लिए किया गया है। यह इसलिए भी जरूरी है कि वर्ष 2030 तक देश के वनों के कार्बन स्टॉक में 2.5 से 03 बिलियन टन तक इजाफा किया जाना है। 

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