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    उप्र के युवाओं को लुभाने में होगी राजबब्बर की परीक्षा

    By Ashish MishraEdited By:
    Updated: Wed, 13 Jul 2016 01:30 PM (IST)

    मुश्किल घड़ी में अध्यक्ष बने राजबब्बर के सामने कांग्रेस से दूर हुए युवाओं को लुभाने के साथ गुटबाजी में फंसी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ाने की चुनौती होगी।

    लखनऊ [अवनीश त्यागी] । अध्यक्ष पद पर सांसद राजबब्बर की ताजपोशी कर कांग्रेस हाईकमान ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए प्रदेश में 27 वर्ष से चला आ रहा सियासी वनवास समाप्त करने का प्रयास किया है। मुश्किल घड़ी में अध्यक्ष बने राजबब्बर के सामने कांग्रेस से दूर हुए युवाओं को लुभाने के साथ गुटबाजी में फंसी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ाने की चुनौती होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में गाजियाबाद से चुनाव हार चुके राजबब्बर की राह आसान नहीं है क्योंकि गत दो दशक में कांग्रेस का मूल वोट बैंक ही नहीं छिड़का वरन युवाओं का भी मोहभंग हुआ।

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    युवक कांग्रेस और एनएसयूआइ की निष्कि्रयता के चलते कुल आबादी के तीस फीसद युवा वर्ग की पसंद भी बदल चुकी है। राजबब्बर के ग्लैमर के सहारे युवाओं को आकर्षित करने का कांग्रेस को अवसर मिलेगा परन्तु उसे वोट में तब्दील करना चुनौती होगी। पुराने समाजवादी रहे राजबब्बर ने 2009 के लोकसभा उपचुनाव में फीरोजाबाद सीट से सपा उम्मीदवार व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्‌नी डिंपल यादव को हराकर राजनीतिक पकड़ का अहसास कराया था। राजबब्बर 2009 जैसे तेवर दिखाने में कामयाब रहते तो सपा की मुश्किलें भी बढ़ेगी। टीम में इमरान मसूद जैसे आक्रामक तेवर वाले मुस्लिम नेता को शामिल करके हाईकमान ने सपा का सिरदर्द बढ़ा दिया है। इमरान अपनी ताकत का अहसास इस वर्ष देवबंद विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में करा चुके हैं। मुस्लिम बाहुल्य वाली देवबंद सीट को सपा से छीनकर कांग्रेस को दिलाने का इनाम मसूद को मिला। मोदी की बोटी-बोटी काटने के बयान से चर्चाओं में आए मसूद और राजबब्बर की जोड़ी मुस्लिमों को सपा के मोह से निकाल कर कांग्रेस से जोड़ने में कितना सफल होगी यह वक्त ही बताएगा

    भाजपा के पिछड़ा कार्ड का जवाब

    कांग्रेस ने राजबब्बर के साथ राजाराम पाल को जोड़ भाजपा के पिछड़ा वर्ग कार्ड पर चोट का भी प्रयास किया है। राजबब्बर खुद पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के मुकाबिल कांग्रेस द्वारा राजबब्बर को उतारकर माकूल जवाब देने की कोशिश गयी है। जानकारों का कहना है कि राजनीतिक दांवपेंच और भीड़ जुटाऊ चेहरे के रूप में राजबब्बर निश्चित रूप से मौर्य पर भारी पड़ेंगे।

    नए चेहरों पर दांव

    ब्राह्माण चेहरे के रूप में कांग्रेस ने राजेश मिश्र को आगे कर पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद व प्रमोद तिवारी जैसे पुराने नाम से बचने की कोशिश की है। राजेश मिश्र कांग्रेस में आक्रामक तेवर वाले नेता माने जाते हैं। दलितों को रिझाने के लिए भी नए चेहरे में रूप में भगवती प्रसाद चौधरी को आगे किया गया है। भीम ज्योति यात्रा निकालकर चर्चा में भगवती प्रसाद को पीएल पुनिया और डा. निर्मल खत्री का नजदीकी माना जाता है।

    खत्री की अहमियत बरकरार

    भले ही प्रदेश अध्यक्ष पद से डा. निर्मल खत्री का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया हो परन्तु उनकी अहमियत कम नहीं की गई है। उन्हें स्क्रीनिंग कमेटी की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। टिकटों का निर्धारण करने में अहम भूमिका निभाने वाली स्क्रीनिंग कमेटी की कमान पहली बार प्रदेश के किसी नेता को मिली। प्रदेश में टिकट स्क्रीनिंग करने के बाद ही प्रत्याशियों की सूची अंतिम निर्णय के लिए केंद्रीय समिति को भेजी जाती है।