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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 29, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

क्षमा की क्षमता

By Preeti jhaEdited By:
Published: Tue, 29 Sep 2015 02:39 PM (IST)Updated: Tue, 29 Sep 2015 02:46 PM (IST)

जैन दर्शन में क्रोध को स्वभाव नहीं, विभाव कहा जाता है। जबकि क्षमा को मानव का सहज स्वभाव माना गया ...और पढ़ें

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जैन दर्शन में क्रोध को स्वभाव नहीं, विभाव कहा जाता है। जबकि क्षमा को मानव का सहज स्वभाव माना गया है, तभी तो इस क्षमता को बढ़ाने के लिए क्षमा पर्व मनाया जाता है...

जैन परंपरा में पर्युषण दशलक्षण महापर्व की समाप्ति पर जो महत्वपूर्ण पर्व मनाया जाता है वह है- क्षमा पर्व। इस दिन श्रावक (गृहस्थ)और साधु (संन्यासी) दोनों ही क्षमा याचना करते हैं। पूरे वर्ष उन्होंने जाने-अनजाने में यदि किसी भी जीव को कोई कष्ट पहुंचाया हो तो उसके लिए वे उनसे क्षमा याचना करते हैं। वे अपने दोषों की निंदा करते हैं और कहते हैं- च्मिच्छा मे दुक्कडज् अर्थात मेरे सभी दुष्कृत्य मिथ्या हो जाएं। वे प्रायश्चित भी करते हैं। इस प्रकार वे क्षमा के माध्यम से अपनी आत्मा का प्रक्षालन करके सुख और शांति का अनुभव करते हैं। श्रावक प्रतिक्रमण में प्राकृत भाषा में एक गाथा है : खम्मामि सव्वजीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ती

मे सव्वभूदेसु, वेरं मज्झं ण केण वि। अर्थात मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं और सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा

प्रत्येक के प्रति मैत्री भाव है, किसी के प्रति वैर भाव नहीं है।

वस्तुत: क्षमा आत्मा का स्वभाव है, किंतु हम हमेशा क्रोध को स्वभाव मानकर उसकी स्वीकारोक्ति और अनिवार्यता पर बल देते आए हैं। क्रोध को यदि स्वभाव कहेंगे तो वह आवश्यक हो जाएगा। इसीलिए जैन दर्शन में क्रोध को स्वभाव नहीं, विभाव कहा गया है। क्षमा शब्द च्क्षमज् धातु से बना है, जिससे च्क्षमताज् भी बनता है। क्षमता का मतलब है सामथ्र्य और क्षमा का मतलब है किसी की गलती या अपराध का प्रतिकार नहीं करना। सहन करने की प्रवृत्ति ही माफी है, क्योंकि क्षमा का अर्थ सहनशीलता भी है। क्षमा कर देना बहुत बड़ी क्षमता

का परिचायक है। इसीलिए नीति में कहा गया है च्क्षमावीरस्य भूषणंज् अर्थात क्षमा वीरों का आभूषण है।

लोग सहन करने को कमजोरी समझते हैं, लेकिन आध्यात्मिक अर्थों में सहनशीलता एक विशेष गुण है, जो

कमजोर लोगों में पाया ही नहीं जाता। भौतिक विज्ञान का एक प्रसिद्ध नियमहै कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है।

अध्यात्म विज्ञान में प्रतिक्रिया कुछ है ही नहीं, सिर्फ क्रिया है। क्षमा क्रिया है,क्रोध प्रतिक्रिया है। हम अक्सर प्रतिक्रिया में जीते हैं, क्रिया को भूल जाते हैं। संभवत: हम प्रतिक्रियावादी इसलिए हैं,क्योंकि हम सहनशील नहीं हैं। आमतौर पर लोग रहन-सहन का अर्थ आर्थिक स्तर से लगाते हैं। हम विचार करें कि रहन के साथ सहन क्या है? यह सहन करने की क्षमता है, धैर्य है।यह स्वभावगत विशेषता है। विवाह योग्य लड़की के लिए दोनों चीजें देखना जरूरी हैं कि लड़के वाले कैसे रहते हैं और कैसे सहते हैं। रहन के साथ उनके सहन का स्तर भी नापना जरूरी है। परिवार टूटने का अर्थ है कि किसी सदस्य की सहनशीलता कमजोर हो गई। सहन करनेके पीछे प्रेम का भाव छिपा हुआ है। हम जिससे प्रेम करते हैं, उसकी हर गुस्ताखी को सहन कर लेते हैं। सहनशीलता सहअस्तित्व

की सूचक है जो बिना क्षमा के, क्षमता के कदापि संभव नहीं है।