आइए जानें, क्यों और किसलिए शिवभक्त उठाते हैं कांवड़
शिवभक्त चल पड़े हैं कांवड़ लेकर गंगाजल भरने गोमुख व हरिद्वार। चंद दिन शेष रह गए हैं कांवड़ मेला शुरू होने में पर धर्मनगरी शिवभक्तों के स्वागत को तैयार है। पहले शारदीय कांवड़ का महत्व ज्यादा था पर अब धीरे धीरे श्रावण मास की कांवड़ का चलन अधिक बढ़ गया
हरिद्वार । शिवभक्त चल पड़े हैं कांवड़ लेकर गंगाजल भरने गोमुख व हरिद्वार। चंद दिन शेष रह गए हैं कांवड़ मेला शुरू होने में पर धर्मनगरी शिवभक्तों के स्वागत को तैयार है। पहले शारदीय कांवड़ का महत्व ज्यादा था पर अब धीरे धीरे श्रावण मास की कांवड़ का चलन अधिक बढ़ गया है।
ऐसी मान्यता है कि सावन मास से चार माह के लिए सत्ता शिव के हाथ आ जाती है। शिवभक्त अपने आराध्य से मनौतियां मांगते हैं और पूरी होने पर हरिद्वार से जल लेकर कांवड़िये स्थानीय शिवालयों में चढ़ाते हैं। इस दौरान पंद्रह दिन तक धर्मनगरी पूरी तरह केसरिया रंग में रंगी रहती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम ने भी हरिद्वार से गंगाजल भरकर मेरठ स्थित पुरा महादेव मंदिर पर चढ़ाया था। उन्होंने कई माह तक भगवान शिव की आराधना भी की थी और इसके बाद से ही सावन माह का महत्व बढ़ा था। श्रावन माह में भगवान शंकर की आराधना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है, क्योंकि सभी महीनों में श्रावण मास शिव को सबसे अधिक प्रिय है। पंडित नितिन शुक्ला ने बताया कि शिवभक्त अपनी
मनोकामना पूरी करने के लिए लेट कर, दौड़ कर, बैठ कर व डाक कांवड़ के रूप में हरिद्वार से जल लेकर जाते हैं और श्रावण मास की शिवरात्रि को स्थानीय शिवालयों में भोले का जलाभिषेक करते हैं। गूलर के पेड़ से करते हैं परहेज
कांवड़ मेले में हरिद्वार से जल भरकर जाने वाले कांवड़िये गूलर के पेड़ के नीचे से जाने में भी संकोच करते है। मान्यता है कि यदि गूलर के पेड़ के नीचे से शिवभक्त कांवड़ लेकर जाते हैं तो उनकी यात्रा सफल नहीं होती। बताया कि हरकी पैड़ी से जल भरकर एक बार कांवड़ उठाने के बाद शिवभक्त कांवड़ को जमीन पर नहीं रखते। यात्रा चाहे कितने भी दिन में तय हो लेकिन शिवभक्त कांवड़ को अपने घर की जमीन पर ही रखते हैं। जगह-जगह बनाए गए शिविरों में स्टैंड बनाये जाते हैं, इन्हीं पर कांवड़िये कांवड़ रखते हैं।
पंचक में नहीं उठायी जाती कांवड़
मान्यता के अनुसार सावन माह में पड़ने वाले पंचकों में शिवभक्त कांवड़ उठाने से परहेज करते हैं। पंचक के दौरान लकड़ी से बने कोई भी सामान नहीं खरीदा जाता, जबकि कांवड़ पूरी तरह लकड़ी व बांस से तैयार होती है। जो शिवभक्त पंचक शुरू होने से पहले कांवड़ खरीद लेते हैं, वह पंचक में कांवड़ उठा सकते हैं लेकिन जिन शिवभक्तों को नई कांवड़ खरीदनी होती है, वह पंचक पंचक समाप्त होने के बाद कांवड़ खरीदते हैं।
पांच प्रकार की होती है कांवड़
बैठी कांवड़, खड़ी कांवड़, दंडौती कांवड़, मन्नौती कांवड़, डाक कांवड़
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