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इतना बरसा रंग-गुलाल, ब्रज हो गया लाल

Publish Date:Wed, 19 Mar 2014 03:03 PM (IST) | Updated Date:Wed, 19 Mar 2014 04:44 PM (IST)
इतना बरसा रंग-गुलाल, ब्रज हो गया लाल

मथुरा। होली पर्व पर सोमवार को बृज में रंग व अबीर-गुलाल की इस कदर बरसात हुई कि ब्रजवासी ही नहीं सड़कें व गलियां रंगीन हो गईं। सभी रंग-गुलाल की बरसात कर प्रेम रस से सराबोर थे। देर शाम तक ढोल-नगाड़ों की थाप व डीजे पर नर-नारी और बच्चे झूमते रहे।

रंग-बिरंगे लोगों ने राहगीरों को भी अपने जैसा बना लिया। अंजान लोगों को भी रंग-गुलाल लगाकर गले लगा लिया। सड़कों पर लोग अबीर-गुलाल उड़ा रहे थे तो छतों से बच्चे रंग की वर्षा कर रहे थे। रंगों से सराबोर युवाओं ने बाइकों पर भी आनंद लिया।

घरों में महिलाओं ने कामकाज निपटाकर होली खेली। बच्चे सुबह से ही शुरू हो गए थे। गलियों से निकलने वालों की तो समझो खैर ही नहीं थी। बच्चे रंगों की बौछार कर रहे थे तो राहगीर भी हंसी-खुशी रंग डलवाते रहे। दोपहर दो बजे तक किसी भी गली-मुल्ले में हुरियारों से बचकर निकलने की सूरत नहीं रही। 1गले मिले, मिटा ऊंच-नीच का भेद1शाम चार बजे से नगर पालिका द्वारा सजाए गए भगत सिंह पार्क में सार्वजनिक होली मिलन समारोह आयोजित हुआ। विभिन्न समाज के लोग अपने बैनर व स्टॉल आदि लगाकर गले मिल रहे थे। इसमें राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक आदि संगठनों व जाति-वर्गो के लोगों ने शिरकत की और एक-दूसरे के गले मिलकर बधाई दी।

होलिकोत्सव संघ होली दरवाजा के तत्वावधान में होली दरवाजा पर होलिका पूजन किया गया।

बीएसएफ की 165 वीं बाद बटालियन में होली मिलन समारोह का आयोजन किया गया।

निभायी सूखी होली-सांझी होली की परंपरा-

श्रीधाम में इस बार सूखी होली- सांझी होली परंपरा को ब्रजवासियों और बाहर से आये लोगों ने बखूबी निभाया। पर्यावरण रक्षा को होलिका दहन में गाय के गोबर से बने कंडों का प्रयोग किया। जल की फिजूलखर्ची रोकने को टेसू के फूलों से बने गुलाल से सूखी होली खेली।

ब्रज की होली विश्वविख्यात है। यहां केवल टेसू के फूलों से सैकड़ों सालों पहले से गुलाल और रंग बनाया जाता है। यह रंग स्वास्थ्य के लिये हानिकारक नहीं होता। पर्यावरण की रक्षा को हरे पेड़ बचाने और पानी की फिजूलखर्ची रोकने को इस बार गुलाल से ही होली खेली।

दुकानदारों की बात पर विश्वास करें तो बाजारों में रसायनयुक्त रंग और गुलाल की खरीद केवल दस फीसद लोगों ने की। रसायनयुक्त रंगों को केवल बाहरी शहरों से आने वाले लोग ही प्रयोग में लाते हैं। यहां के लोगों ने इस बार पूरी तरह टेसू के फूलों से बने रंग को ही प्रयोग में लिया। हालांकि इस बार ब्रजवासियों ने पानी बचाने को रंग खेलने से परहेज किया। परंपरा न टूटने पाये इसलिये मंदिरों में रंग चला लेकिन सूखी होली के रूप में गुलाल की भरपूर वर्षा हुई।

21 स्थानों पर कंडों से होलिका दहन-शहर में करीब 21 स्थानों पर होलिका दहन हुआ, लेकिन सभी जगहों पर लकड़ी का प्रयोग नहीं किया गया बल्कि गाय के गोबर से बने कंडों का प्रयोग हुआ।

हुरंगा में चंदन लगा निभाई परंपरा- दुसायत क्षेत्र के लोगों ने तो कमाल कर दिया। पानी की फिजूलखर्ची रोकने को नया तरीका ईजाद कर लिया। पीले चंदन में इत्र डाला और मामूली पानी से उसे गाढ़ा कर सबके माथे और किसी -किसी के चेहरे पर पोतकर हुरंगा खेला। हालांकि वहां मौजूद महिलाएं हाथों में लाठी लिये रंगों की बौछार का इंतजार करतीं रहीं। पानी की फिजूलखर्ची रोकने की अपील

प्रेम मंदिर में नहीं उड़ा अबीर-गुलाल-

दुल्हैंडी के दिन सोमवार सुबह प्रेममंदिर नहीं खुला। पर्यटक, श्रद्धालु और हुरियारों को मायूस होकर लौटना पड़ा। श्रद्धालुओं को बताया गया कि गुलाल-अबीर से परिसर गंदा होने की आशंका है। शाम को निर्धारित समय पर मंदिर खुला। श्रीबांकेबिहारी मंदिर, इस्कॉन, निधिवन परिसर, रंगजी मंदिर, सप्त देवालय व अन्य मंदिरों में ठाकुरजी के भव्य दर्शन हुये। मंदिर और आश्रमों में एक-दूसरे पर खूब रंग-गुलाल और अबीर उड़ा।

हुरियारों पर हुई प्रेम पगी लाठियों की वर्षा- नंदगांव- दाऊ के अनूठे हुरंगा का आनंद देश-विदेश से आए श्रद्धालुओं ने लिया। सोलह श्रंगार किए हुरियारिनों ने गिडोह के हुरियारों पर प्रेम पगी लाठियों की वर्षा की तो आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। मंगलवार को गिडोह के सजे-धजे हुरियारे छाजू मौहगा से होते हुए ढप, झांझ, मजीरा और नगाड़े के साथ गाते बजाते करीब चार बजे नंदभवन पहुंचे। अबीर-गुलाल की वर्षा के मध्य हो रहे रसियों पर लोग झूम रहे थे। नंदभवन से निकलकर हुरियारे दाऊ दादा के प्रतीक ध्वज के साथ ज्ञान मौहगा से होकर निकले। हुक्कों की गुड़गुड़ाहट के साथ सरदारी गाते बजाते राम राम सा कहते हुए निकली।

सरदारी व हुरियारों का लोगों ने दिल खोलकर स्वागत किया। हुरियारों को ठंडाई, शर्बत पिलाया गया। हंसी-ठिठौली करते हुए हुरियारे हुरंगा चौक पर एकत्रित होने लगे।

हुरियारे रणक्षेत्र में जाने वाले योद्धा की भांति बचाव के लिए लाए लकड़ी के हत्थों के साथ दाऊजी स्वरूप पताका की परिक्रमा करते हैं। हुरियारों ने सजी धजी -हुरयारिनों से हंसी ठिठोली कर लठामार के लिए उकसाया। समाज का इशारा मिलते ही नंदगांव की हुरियारिनें हुरियारों पर टूट पड़ीं। लाठियों के प्रहार से हुरियारिन हुरियारों को पीछे हटने पर मजबूर कर देती हैं। इसी प्रक्त्रिया की तीन बार पुनरावृत्ति होती है। इसी के साथ सूर्यदेव भी छिपकर विराम का संकेत देते हैं। दाऊ महाराज के जयघोषों से हुरंगा चौक गूंज उठा। हुरियारे, हुरियारिन और श्रद्धालु ब्रज रज को माथे से लगा ब्रज राज को नमन करते हैं। घरों की छतों से भी लोग हुरंगा का आनंद लेते रहे। हुरियारों द्वारा जगह-जगह चौपाई निकाली गईं। हुरियारिनों ने होली के रसियाओं पर जमकर नृत्य किया।

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Web Title:So drop colors - Holi, Brij Lal was(Hindi news from Dainik Jagran, newsnational Desk)
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