चोटी रखना ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं
वैदिक काल में यदि किसी को मृत्युदंड देना हो तो उसकी शिखा काट दी जाती थी। शिखा यानी चोटी सनातन धर्म की पहचान है। शिखा यूं ही नहीं रखी जाती है। यह धर्म और संस्कृति की रक्षक है।
वैदिक काल में यदि किसी को मृत्युदंड देना हो तो उसकी शिखा काट दी जाती थी। शिखा यानी चोटी सनातन धर्म की पहचान है। शिखा यूं ही नहीं रखी जाती है। यह धर्म और संस्कृति की रक्षक है। शिखा के विशेष महत्व को इसी बात से जाना जा सकता है कि हिन्दुओं ने यवन शासन के दौरान अपनी शिखा की रक्षा के लिए सिर कटवा दिये पर शिखा नहीं कटवाई।
हिंदू धार्मिक ग्रंथों में शिखा रखने के कई लाभ बताए गए हैं जैसे कि यदि शिखा रखते हैं तो आत्मशक्ति प्रबल होती है। लौकिक-परलौकिक कार्यों में सफलता मिलती है। सुषुम्ना रक्षा से मनुष्य स्वस्थ्य, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्धायु बनती है। और सबसे जरूरी बात ये कि आपकी आंखों की रोशनी सुरक्षित और बेहतर रहती है। यह एक अचूक उपाय की तरह ही है।
पाश्चात्य वैज्ञानिक भी शिखा की महत्ता को जानते थे इस बारे में प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. आई. ई. क्लार्क एम.डी. ने कहा था, 'मैंने जबसे इस विज्ञान की खोज की हैं, तब से मुझे विश्वास हो गया हैं कि हिन्दुओं का हर एक नियम विज्ञान से परिपूर्ण हैं। चोटी रखना हिन्दू धर्म ही नहीं, सुषुम्ना के केद्रों की रक्षा के लिये ऋषि-मुनियों की खोज का विलक्षण चमत्कार हैं।'
एक और पाश्चात्य विद्वान मि. अर्ल थामस लिखते हैं, 'सुषुम्ना की रक्षा हिन्दु लोग चोटी रखकर करते हैं जबकि अन्य देशों में लोग सिर पर लम्बे बाल रखकर या हैट पहनकर करते हैं। इन सब में चोटी रखना सबसे लाभकारी हैं। किसी भी प्रकार से सुषुम्ना की रक्षा करना जरुरी हैं।'
हिन्दू धर्म का छोटे से छोटा सिध्दांत,छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूर्ण और कल्याणकारी हैं। शिखा का महत्व संस्कृति में अंकुश के समान है। यह हमारे ऊपर आदर्श और सिद्धांतों का अंकुश है। इससे मस्तिक में पवित्र भाव उत्पन्न होते हैं। प्रचीन समय में विद्या अध्ययन के समय निद्रा न आये इसलिए उसे दीवाल में गढ़ी खूंटी में बांध देते थे नीद के झोंके में वह खीच जाती और विद्यार्थी जाग जाता था।। जैसे घङी के छोटे पुर्जे की जगह बडा पुर्जा काम नहीं कर सकता क्योंकि भले वह छोटा हैं परन्तु उसकी अपनी महत्ता हैं, ऐसे ही शिखा की भी अपनी महत्ता हैं। शिखा न रखने से हम जिस लाभ से वंचित रह जाते हैं, उसकी पूर्ति अन्यकिसी साधन से नहीं हो सकती।
पूजा-पाठ के समय शिखा में गाँठ लगाकर रखने से मस्तिक में संकलित ऊर्जा तरंगें बाहर नहीं निकल पाती हैं। इनके अंतर्मुख हो जाने से मानसिक शक्तियों का पोषण, सद्बुद्धि, सद्विचार आदि की प्राप्ति, वासना की कमी, आत्मशक्ति में बढ़ोत्तरी, शारीरिक शक्ति का संचार, अवसाद से बचाव, अनिष्टकर प्रभावों से रक्षा, सुरक्षित नेत्र ज्योति, कार्यों में सफलता तथा सद्गति जैसे लाभ भी मिलते हैं।
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